सीजफायर के बाद घिरी कुर्सी! बेंजामिन नेतन्याहू पर बढ़ा दबाव

नेतन्याहू का 'क्रिमिनल ट्रायल' यानी आपराधिक मुकदमा इसी रविवार को फिर से शुरू होने वाला है। कई हफ्तों तक ईरान के साथ युद्ध के चलते इज़राइल का कोर्ट सिस्टम 'इमरजेंसी पाबंदियों' के तहत काम कर रहा था।

4pm न्यूज नेटवर्क: दुनिया सोच रही है कि आखिर सीज़फायर मुकम्मल क्यों नहीं हो पा रहा, लेकिन आज हम उस ‘गंदे राज’ से पर्दा उठाएंगे जिसने पूरी इंसानियत को बंधक बना रखा है। खबर ये है कि इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की कुर्सी अब उनके लिए ‘फांसी का फंदा’ बन चुकी है। जैसे ही जंग रुकी है, नेतन्याहू पर भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी के मुकदमों की सुनवाई दोबारा शुरू होने जा रही है। माना जा रहा है कि लाखों बेगुनाहों की मौत के ज़िम्मेदार नेतन्याहू का अगला ठिकाना ‘जेल’ होगा। यही वजह है कि वे अपनी खाल बचाने के लिए लेबनान और गाज़ा में मासूमों का बेतहाशा खून बहा रहे हैं।

दूसरी तरफ, सात समंदर पार अमेरिका में भी भयंकर भूचाल आया हुआ है। डोनाल्ड ट्रंप ने ‘एपस्टीन फाइल्स’ पर ऐसी सच्चाई उगलवाई है कि वॉशिंगटन के रसूखदार गलियारे कांप रहे हैं। हालात यहाँ तक पहुँच गए हैं कि मेलानिया ट्रंप को खुद मीडिया के सामने आकर सफाई देनी पड़ी है। और इससे भी बड़ी खबर यह है कि अमेरिकी सैनिकों ने खुद कबूल कर लिया है कि इस तथाकथित सीज़फायर का असली सच क्या है और अमेरिका को अब तक कितने अरबों का नुकसान हो चुका है।

इज़राइल के अंदर से बहुत बड़ी खबर आ रही है। नेतन्याहू को आखिर शांति से इतनी नफरत क्यों है? इसका जवाब किसी कूटनीति (Diplomacy) में नहीं, बल्कि इज़राइल की अदालतों में छिपा है। जैसे ही सीज़फायर की सुगबुगाहट हुई है, तुरंत ही इज़राइल की अदालत ने नेतन्याहू के खिलाफ मुकदमों की सुनवाई शुरू कराने का आदेश दे दिया है। नेतन्याहू बखूबी जानते हैं कि जिस दिन जंग पूरी तरह खत्म होगी, उसी दिन इज़राइली आवाम उनसे पाई-पाई का हिसाब मांगेगी। उन पर रिश्वतखोरी, धोखाधड़ी और पद के दुरुपयोग के तीन बड़े और गंभीर मुकदमे चल रहे हैं।

नेतन्याहू का ‘क्रिमिनल ट्रायल’ यानी आपराधिक मुकदमा इसी रविवार को फिर से शुरू होने वाला है। कई हफ्तों तक ईरान के साथ युद्ध के चलते इज़राइल का कोर्ट सिस्टम ‘इमरजेंसी पाबंदियों’ के तहत काम कर रहा था। कोर्ट के नोटिस के मुताबिक, अगली सुनवाई रविवार सुबह साढ़े नौ बजे जेरूसलम डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में बचाव पक्ष के गवाह की गवाही के लिए तय की गई है। नोटिस में यह भी साफ़ कहा गया है कि इमरजेंसी हटने और ‘जस्टिस सिस्टम’ के रेगुलर काम पर लौटने के साथ, अब सुनवाई अपने सामान्य तरीके से ही होगी।

प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पर भ्रष्टाचार के जो मुकदमे चल रहे हैं, उनमें तीन अलग-अलग केस शामिल हैं। यह कानूनी लड़ाई साल 2020 में शुरू हुई थी जो आज भी जारी है। हालांकि, नेतन्याहू सभी आरोपों से इनकार करते हैं और इसे एक ‘राजनीतिक साज़िश’ बताते हैं, लेकिन अक्सर युद्ध का हवाला देकर वे इन मुकदमों को रुकवाने में कामयाब हो जाते थे। गाज़ा, लेबनान और ईरान के साथ जारी तनाव के कारण कई बार सुनवाई में देरी हुई, लेकिन अप्रैल 2026 में अब यह सुनवाई फिर से नियमित रूप से शुरू हो रही है। अब यह माना जा रहा है कि लेबनान के साथ सीज़फायर को टालने की नेतन्याहू की एकमात्र वजह यही है कि वे एक बार फिर मुकदमों से बच सकें।

नेतन्याहू के इस क्रिमिनल ट्रायल के शुरू होने पर ईरान के विदेश मंत्री ने तीखा प्रहार किया है। उन्होंने कहा, “नेतन्याहू के आपराधिक मुकदमे की घड़ी अब नज़दीक आ गई है। लेबनान समेत पूरे इलाके में सीज़फ़ायर होने का मतलब होगा उनका जल्दी जेल जाना। अगर अमेरिका नेतन्याहू की खातिर अपनी डिप्लोमेसी और इकॉनमी को बर्बाद करना चाहता है, तो यह आखिर में उसकी अपनी मर्ज़ी होगी। हमें लगता है कि यह बेवकूफी होगी, लेकिन हम हर स्थिति के लिए तैयार हैं।” जैसा कि अब्बास अराघची का यह बयान है, जो कहीं न कहीं यह बताने की पूरी कोशिश है कि नेतन्याहू सिर्फ जेल जाने के डर से हर दिन मासूमों का खून बहा रहे हैं।

एक तरफ जहाँ ईरान के साथ सीज़फायर की चर्चा होते ही नेतन्याहू की फाइल खुल गई है, तो वहीं दूसरी ओर ‘एपस्टीन फाइल्स’ खुद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए जी का जंजाल बन गई है। ट्रंप का नाम भी एपस्टीन फाइल के विवादों से जुड़ा माना जाता है। इन फाइलों में उन तमाम रसूखदार लोगों के नाम दर्ज हैं जो उस बदनाम आइलैंड पर जाते थे। इस लिस्ट के बाहर आने से जो हड़कंप मचा, उसे संभालने के लिए खुद मेलानिया ट्रंप को मोर्चा संभालना पड़ा। दरअसल, अमेरिका में मेलानिया को लेकर ही तरह-तरह के दावे और चर्चाएं चल रही हैं। कई लोग तो सरेआम ये आरोप तक लगा रहे हैं कि मेलानिया को ट्रंप के साथ मिलवाने वाला खुद जेफरी एपस्टीन ही था।

इन गंभीर आरोपों के बीच मेलानिया ट्रंप ने मीडिया के सामने आकर सफाई दी है। अमेरिका की फर्स्ट लेडी मेलानिया ट्रंप ने व्हाइट हाउस में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की, जिसमें उन्होंने सेक्स अपराधी जेफरी एपस्टीन से किसी भी तरह के संबंध या उसके अपराधों की जानकारी होने से साफ़ इनकार कर दिया। उन्होंने इसे पूरी तरह झूठा और बेबुनियाद बताया और कहा कि उनके खिलाफ लगाए जा रहे आरोप उनकी छवि को धूमिल करने की एक साज़िश हैं। यह बयान ऐसे समय में आया है जब डोनाल्ड ट्रंप और उनकी सरकार एपस्टीन मामले के साये से बाहर निकलने की पुरज़ोर कोशिश कर रही है। मेलानिया ने कांग्रेस से एपस्टीन के पीड़ितों के लिए सार्वजनिक सुनवाई कराने की भी मांग की है।

मेलानिया ट्रंप ने कहा, “मुझे बदनाम करने वाले लोगों में कोई नैतिकता नहीं बची है। जो झूठे आरोप मुझे एपस्टीन से जोड़ते हैं, उन्हें आज ही खत्म होना चाहिए।” उन्होंने साफ कहा कि न तो उनकी एपस्टीन से कोई दोस्ती थी और न ही उसकी पूर्व गर्लफ्रेंड गिस्लेन मैक्सवेल से उनका कोई वास्ता था। हालांकि, उन्होंने यह स्वीकार किया कि न्यूयॉर्क और फ्लोरिडा के सामाजिक दायरे कभी-कभी ‘ओवरलैप’ ज़रूर होते थे। उन्होंने मैक्सवेल को भेजे गए एक ईमेल को महज़ एक साधारण मैसेज बताया है। न्याय विभाग द्वारा जारी दस्तावेजों में साल 2002 का एक ईमेल शामिल है, जिसमें लिखा था, “प्यारे जी, मुझे पता है तुम दुनिया भर में बहुत उड़ान भर रही हो। पाम बीच कैसा रहा? मैं वहाँ जाने के लिए इंतज़ार नहीं कर सकती।” ईमेल के अंत में लिखा था—‘प्यार से, मेलानिया’।

इसके अलावा एपस्टीन के घर से मिली एक तस्वीर में ट्रंप, मेलानिया और मैक्सवेल एक साथ नज़र आ रहे हैं। हालांकि मेलानिया ने यह भी साफ किया कि उनकी मुलाकात डोनाल्ड ट्रंप से एपस्टीन के ज़रिए नहीं, बल्कि 1998 में न्यूयॉर्क की एक पार्टी में हुई थी। लेकिन अब दुनिया ये पूछ रही है कि अगर सब कुछ इतना साफ़ है, तो व्हाइट हाउस में इतनी घबराहट क्यों है? ऐसे में न सिर्फ ट्रंप बल्कि मेलानिया पर जिस तरह के आरोप हैं, वे सीधे तौर पर ट्रंप को कटघरे में खड़ा करते हैं। जैसे ही जंग की खबरें धीमी हुईं, एपस्टीन फाइल के जिन्न ने अमेरिका में फिर से रफ्तार पकड़ ली है, जिससे व्हाइट हाउस के हाथ-पाँव फूल गए हैं।

हालांकि, एक तरफ जहाँ अमेरिका में एपस्टीन फाइल की चर्चाएं तेज़ हैं, तो वहीं व्हाइट हाउस के प्रोपेगेंडा की पोल अब खुद अमेरिकी सेना के जवान खोल रहे हैं। सैनिकों के मुताबिक, ईरान ने अमेरिकी सेना को युद्ध के दौरान बहुत भारी नुकसान पहुँचाया है। जंग के दौरान कुवैत बेस पर तैनात रहे सैनिकों ने अमेरिकी मीडिया ‘सीबीएस’ (CBS) को एक इंटरव्यू दिया है। इंटरव्यू देने वाले ये वही सैनिक हैं जो कुवैत बेस पर हुए भीषण हमले में बाल-बाल बच गए थे। मार्च 2026 में कुवैत बेस पर ईरान ने हमला करके अमेरिका के 6 सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया था। इस हमले को अमेरिका ने कभी भी अपनी ‘हार’ के तौर पर स्वीकार नहीं किया।

सैनिकों ने इंटरव्यू में खुलासा किया है कि कुवैत के इस बेस पर अमेरिकी सेना की ‘103वीं सस्टेनमेंट कमांड’ को तैनात किया गया था। एक जवान ने सीबीएस न्यूज़ को बताया— “हम लोगों को इस हमले की जानकारी काफी पहले से थी। खुफिया रिपोर्टों में साफ़ कहा गया था कि ईरान इसे निशाना बना सकता है, लेकिन इसे गंभीरता से नहीं लिया गया।” उस जवान के मुताबिक, “सुबह उठकर जब हम गोला-बारूद के बारे में डेटा इकट्ठा कर रहे थे, तभी वहाँ ‘शाहेद ड्रोन’ से ताबड़तोड़ हमला शुरू हो गया। हमला इतना भयानक था कि हमारे 6 जवान मौके पर ही शहीद हो गए और 20 बुरी तरह घायल हुए। चारों तरफ आग की ऊँची लपटें उठी थीं।” यह हमला 1 मार्च को तब हुआ था जब अमेरिका ने इज़राइल के साथ मिलकर ईरान के एक वरिष्ठ नेतृत्व को निशाना बनाया था।

एक अन्य सैनिक ने अखबार को बताया— “रक्षा मंत्री ने किलेबंदी (Fortification) की जो बात कही है, वह सरासर झूठ है। वहाँ सिर्फ एक साधारण दीवार थी, जो आमने-सामने की गोलीबारी में तो काम आ सकती थी, लेकिन हवाई हमले की स्थिति में छिपने के लिए वहाँ कुछ भी नहीं था। हम 60 सैनिक वहाँ खुले मैदान में थे।” ऐसे में अमेरिकी रक्षा मंत्री का दावा न सिर्फ पूरी तरह झूठ साबित हुआ है, बल्कि अमेरिकी सेना का जंग के दौरान क्या हाल था, यह हकीकत भी सबके सामने आ गई है।

अमेरिकी सैनिकों ने बेबाकी से बताया है कि इस जंग की वजह से अमेरिका को अब तक अरबों डॉलर का सैन्य और आर्थिक नुकसान हो चुका है। ऐसे में सैनिकों का यह इकरारनामा ट्रंप की उस ‘मजबूत विदेश नीति’ के खोखले दावों पर एक करारा तमाचा है। पूरे मामले में यह साफ़ है कि ट्रंप को अपनी इमेज बचानी है और नेतन्याहू को अपनी खिसकती हुई कुर्सी। ट्रंप नेतन्याहू को इसलिए छूट दे रहे हैं ताकि वे ‘इज़राइल लॉबी’ को खुश रख सकें, और नेतन्याहू ट्रंप का इस्तेमाल इसलिए कर रहे हैं ताकि उनकी साज़िशों को कोई रोकने वाला न हो। ये दोनों नेता मिलकर पूरी दुनिया को गुमराह कर रहे हैं।

लेबनान में जो मिसाइलें बेगुनाहों पर गिर रही हैं, उन पर इज़राइल का नाम लिखा है, लेकिन उनकी पीठ पर हाथ ट्रंप प्रशासन का है। यही वजह है कि ऑस्ट्रेलिया से लेकर यूके तक, अब सहयोगी देश भी खुलकर कहने लगे हैं कि यह सीज़फायर सिर्फ एक ‘डिप्लोमैटिक फ्रॉड’ है। एक मुल्क को बचाने के नाम पर दूसरे मुल्क को नक्शे से मिटाया जा रहा है, और यह सब सिर्फ दो लोगों की निजी महत्वाकांक्षाओं और अपनी खाल बचाने के लिए किया जा रहा है।

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