क्या ईरान को फिर मिलेगा धोखा? बातचीत के बीच अमेरिका का बड़ा कदम
ईरान को चीन बड़े पैमाने पर 'एयर डिफेंस सिस्टम' देने जा रहा है। आपको बता दें कि सोशल मीडिया (X) पर कई ऐसे वीडियो मौजूद हैं, जिनमें तेहरान में उतरते कुछ चीनी कार्गो विमान दिखाई दिए हैं।

4pm न्यूज नेटवर्क: इस वक्त पूरी दुनिया की नज़रें पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद पर टिकी हैं, जहाँ शांति की मेज़ सजी है और कूटनीति का सबसे बड़ा खेल खेला जा रहा है। लेकिन क्या डोनाल्ड ट्रंप वाकई अमन चाहते हैं? या फिर यह महज़ एक ‘छलावा’ है? एक तरफ ट्रंप के दूत इस्लामाबाद में समझौते की फाइलें पलट रहे हैं, तो दूसरी तरफ ट्रंप ने चुपके से मिडिल ईस्ट में अपनी फौज और जंगी साजो-सामान बढ़ाना शुरू कर दिया है। सवाल ये है कि क्या ईरान को एक बार फिर अमेरिका से ‘धोखा’ मिलने वाला है?
सियासत के माहिर खिलाड़ी जानते हैं कि अमेरिका की फितरत हमेशा से ‘दोगली’ रही है। एक तरफ अमेरिकी उप-राष्ट्रपति जेडी वांस पाकिस्तान में ईरान के 71 सदस्यीय डेलिगेशन से बात करने का नाटक कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ पेंटागन से खबर आ रही है कि ट्रंप ने खाड़ी क्षेत्र में चुपके से सैन्य मूवमेंट (हलचल) बढ़ा दी है। यह सीधा-सीधा ईरान की पीठ में छुरा घोंपने की तैयारी नज़र आती है। शायद ट्रंप चाहते हैं कि बातचीत के बहाने ईरान को उलझाए रखें और ज़मीन पर अपनी सैन्य स्थिति को और मज़बूत कर लें।
‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका ने पहले ही घातक लड़ाकू विमान और अटैक एयरक्राफ्ट इस क्षेत्र में तैनात कर दिए हैं। इसके अलावा ’82वीं एयरबोर्न डिवीजन’ के 1500 से 2000 अतिरिक्त सैनिकों को भी भेजा जा रहा है। कुल मिलाकर अब इस क्षेत्र में अमेरिकी सैनिकों की संख्या 50,000 के पार पहुँच चुकी है। सिर्फ ज़मीन ही नहीं, समंदर में भी हलचल तेज़ है। यूएसएस जॉर्ज एच.डब्ल्यू. बुश कैरियर स्ट्राइक ग्रुप अटलांटिक पार कर रहा है, जबकि यूएसएस बॉक्सर एम्फीबियस ग्रुप भी खाड़ी की ओर तेज़ी से बढ़ रहा है। इन दोनों के साथ हज़ारों मरीन कमांडो भी तैनात किए जा रहे हैं।
हालांकि, इसी बीच यह भी खबर आई है कि ईरान को चीन बड़े पैमाने पर ‘एयर डिफेंस सिस्टम’ देने जा रहा है। आपको बता दें कि सोशल मीडिया (X) पर कई ऐसे वीडियो मौजूद हैं, जिनमें तेहरान में उतरते कुछ चीनी कार्गो विमान दिखाई दिए हैं। कहा जा रहा है कि जंग में मिले इस ‘ब्रेक’ के बीच ईरान अपने हथियारों का ज़खीरा फिर से भरने में लग गया है। सीएनएन (CNN) ने तो बाकायदा एक रिपोर्ट छापी है, जिसमें दावा किया गया है कि चीन ईरान को नया और आधुनिक डिफेंस सिस्टम देने जा रहा है। ये पूरी कहानी ऐसे समय में सामने आ रही है, जब अमेरिका और ईरान दोनों के बीच हाई-लेवल मीटिंग चल रही है।
लेकिन ईरान ने साफ कर दिया है कि उसे अमेरिका पर कतई भरोसा नहीं है। ईरान की संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने कहा है कि अगर यह बातचीत सिर्फ दिखावा निकली, तो ईरान इसका मुंहतोड़ जवाब देगा। उन्होंने लेबनान में सीज़फायर को बातचीत की पहली शर्त बताया है। वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी साफ संकेत दे दिए हैं कि अगर बातचीत नाकाम रही, तो सैन्य कार्रवाई का विकल्प खुला है। उन्होंने कहा कि अमेरिकी सेना पूरी तरह तैयार है और ज़रूरत पड़ी तो तुरंत कार्रवाई हो सकती है। ऐसे में अमेरिका से अमन की उम्मीद करना वैसा ही है, जैसे किसी शिकारी से रहम की भीख मांगना। ईरान के सुप्रीम लीडर ने साफ कह दिया है कि “हमारी उंगली अभी भी ट्रिगर पर है।”
वैसे ट्रंप भले ही अपनी जीत का ढोल पीट रहे हों, लेकिन सच्चाई ये है कि ईरान से पंगा लेकर ट्रंप बहुत बुरी तरह फंस चुके हैं। 40 दिन की इस ज़बरदस्त जंग में अमेरिका को वो ज़ख्म मिले हैं, जिन्हें भरने में दशकों लग जाएंगे। खुफिया रिपोर्ट्स और ज़मीनी हकीकत जो अब सामने आई है, वह दहला देने वाली है। जंग के दौरान अमेरिका के 39 लड़ाकू विमान और हेलिकॉप्टर पूरी तरह तबाह हो चुके हैं, जबकि 10 अन्य विमान अलग-अलग स्तर पर क्षतिग्रस्त हुए हैं। यह भारी नुकसान उस दौरान हुआ जब अमेरिकी सेना ने 13,000 से ज्यादा ‘शॉर्टीज’ यानी जंगी मिशन के लिए उड़ानें भरीं।
इस पूरे ऑपरेशन में सबसे ज्यादा नुकसान अमेरिकी ‘ड्रोन फ्लीट’ को हुआ है। कुल नुकसान का 60 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा सिर्फ ड्रोन्स का रहा। रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी वायुसेना के करीब 24 MQ-9A Reaper ड्रोन नष्ट हो गए। यह दिखाता है कि ईरान ने ड्रोन्स के खिलाफ कितनी प्रभावी जवाबी रणनीति अपनाई, जिससे अमेरिका की निगरानी और हमले की क्षमता को गहरा झटका लगा। सीज़फायर के बाद शुक्रवार को भी अमेरिका को एक बड़ा झटका लगा, जब उसका 200 मिलियन डॉलर का MQ-4C Triton ड्रोन होर्मुज के ऊपर रडार से गायब हो गया।
ड्रोन के अलावा अमेरिका के पाँच लड़ाकू विमान भी मार गिराए गए, जिनमें चार F-15E Strike Eagle और एक A-10 Warthog शामिल है। इतना ही नहीं, एक अत्याधुनिक F-35A फाइटर जेट को भी ईरानी हवाई क्षेत्र में भारी नुकसान पहुँचा, हालांकि पायलट सुरक्षित इमरजेंसी लैंडिंग कराने में सफल रहा। पेंटागन के अंदर इस वक्त सन्नाटा पसरा है, क्योंकि करोड़ों डॉलर की मशीनें कबाड़ बन चुकी हैं। ट्रंप अपनी अवाम को ये नहीं बता रहे कि इस बेनतीजा जंग की कीमत अमेरिकी सैनिकों की लाशों और अरबों डॉलर के नुकसान से चुकाई जा रही है। यह सिर्फ ट्रंप की ‘ईगो’ (अहंकार) की जंग है, जिसमें अमेरिका का गुरूर जलकर राख हो रहा है।
एक महीना बीत जाने के बाद भी ट्रंप और उनके विलेन साथी नेतन्याहू ईरान का बाल भी बांका नहीं कर पाए हैं। खुद अमेरिकी खुफिया एजेंसियों का मानना है कि तमाम पाबंदियों और भीषण हमलों के बावजूद ईरान की मिसाइल ताकत रत्ती भर भी कम नहीं हुई है। ईरान के पास आज भी हज़ारों की तादाद में ऐसी हाइपरसोनिक और बैलिस्टिक मिसाइलें मौजूद हैं, जो इज़राइल के ‘आयरन डोम’ को मिनटों में धुआं-धुआं कर सकती हैं। अमेरिका की खुफिया विभाग की रिपोर्ट्स के अनुसार, अभी भी ज़मीन के नीचे कई ‘मिसाइल सिटी’ सक्रिय हैं, जहाँ तक अमेरिका और इज़राइल की पहुँच नहीं हो पाई है।
जहाँ तक हथियारों का सवाल है, तो अभी भी ईरान के पास हज़ारों की संख्या में मिसाइल और ड्रोन सलामत हैं। हालांकि ट्रंप ने सोचा था कि वे कुछ दिनों की बमबारी से ईरान को घुटनों पर ले आएंगे, लेकिन उन्हें क्या पता था कि वे एक शेर की मांद में हाथ डाल रहे हैं। ईरान की ‘अंडरग्राउंड मिसाइल सिटीज़’ आज भी पूरी तरह महफूज़ हैं। यही वजह है कि ट्रंप अब बातचीत की मेज़ पर आने को मजबूर हुए हैं। उनकी गीदड़भभकियों का असर अब खत्म हो चुका है, क्योंकि दुनिया ने देख लिया है कि ईरान के पास सिर्फ जज़्बा ही नहीं, बल्कि अमेरिका को नहले पर दहला देने वाली सैन्य टेक्नोलॉजी भी है।
इस पूरी आग में घी डालने का काम बेंजामिन नेतन्याहू कर रहे हैं। नेतन्याहू बखूबी जानते हैं कि अगर आज शांति हो गई, तो कल उनकी कुर्सी चली जाएगी और उन्हें भ्रष्टाचार के मुकदमों में जेल की सलाखों के पीछे होना होगा। इसीलिए वे ट्रंप पर मुसलसल (लगातार) दबाव बना रहे हैं कि वे ईरान को कोई बड़ी रियायत न दें और हमले जारी रखें। हालांकि, ट्रंप एक तरफ दुनिया को दिखाना चाहते हैं कि वे ‘ग्रेट डीलममेकर’ हैं, और दूसरी तरफ वे इज़राइल की खूनी लॉबी को नाराज़ नहीं करना चाहते। इसी दोगलेपन की वजह से लेबनान में आज भी मासूमों पर बारूद बरस रहा है। ट्रंप की विदेश नीति इस वक्त ‘आईसीयू’ में है, जहाँ हर कदम पर उन्हें कूटनीतिक शिकस्त का मुँह देखना पड़ रहा है।
इस्लामाबाद में हो रही बातचीत के बीच एक अजीब सा तनाव है। ईरान ने साफ कर दिया है कि वह सिर्फ अमेरिका के ‘शब्ज़बाग’ यानी खोखले वादों पर नहीं, बल्कि ‘अमल’ पर यकीन करेगा। अगर ट्रंप एक तरफ फौज बढ़ाएंगे और दूसरी तरफ सुलह की बात करेंगे, तो ईरान मेज़ छोड़कर उठने में रत्ती भर भी देर नहीं लगाएगा।
ईरान की 71 सदस्यीय टीम यहाँ महज़ कागज़ साइन करने नहीं आई है, वे दुनिया को ये बताने आए हैं कि अब ‘धौंस की कूटनीति’ का दौर हमेशा के लिए खत्म हो चुका है। अगर अमेरिका ने फिर से धोखा देने की ज़रा भी कोशिश की, तो होर्मुज की लहरें और ईरान की मिसाइलें वो कहर बरपाएंगी जिसे संभालना व्हाइट हाउस के बस की बात नहीं होगी। साफ है कि ट्रंप की धौंस और नेतन्याहू की ज़िद अब हार रही है। अमेरिका का भारी सैन्य नुकसान और ईरान की अडिग ताकत ने जंग के पूरे समीकरण बदल दिए हैं। ट्रंप को अब चुनना होगा कि या तो वे ईमानदारी से सुलह करें और अपनी बची-कुची साख बचाएं, या फिर अमेरिकी फौज की मुकम्मल बर्बादी के लिए तैयार रहें।



