कतर फंड विवाद से भड़का तनाव, अमेरिका की नीति पर उठे गंभीर सवाल
कूटनीति के मैदान में ईरान ने वो तेवर दिखाए हैं जिसकी कल्पना भी ट्रंप के रणनीतिकारों ने नहीं की थी। इस्लामाबाद में ईरान के 71 सदस्यीय डेलिगेशन ने मेज़ पर बैठते ही 4 ऐसी शर्तें रख दी हैं,

4pm न्यूज नेटवर्क: पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद पर टिकी हैं, जहाँ से एक ऐसी खबर आ रही है जिसने वॉशिंगटन से लेकर तेल अवीव तक हड़कंप मचा दिया है। जो ट्रंप कल तक दहाड़ रहे थे कि वे ईरान को ‘इकोनॉमिक टेररिज्म’ से कुचल देंगे, आज उन्हें उसी ईरान के सामने सरेंडर करना पड़ा है। बड़ी खबर ये है कि कतर और अन्य देशों में जो ईरान का अरबों डॉलर का फंड अमेरिका ने ‘फ्रीज’ कर रखा था, उसे रिलीज़ करने पर ट्रंप प्रशासन के दोहरे रुख ने वार्ता में भयंकर पेंच फंसा दिया है। हालांकि, व्हाइट हाउस ऊपर से भले ही कह रहा हो कि उसने कोई छूट नहीं दी, लेकिन हकीकत ये है कि ईरान ने ट्रंप को उनकी औकात दिखा दी है।
हम खुलासा करेंगे कि कैसे एक तरफ इस्लामाबाद में शांति की बात हो रही है, और दूसरी तरफ ‘विलेन’ नेतन्याहू लेबनान में धड़ाधड़ धमाके करके इस पूरी वार्ता का गला घोंटने की कोशिश कर रहे हैं। क्या ट्रंप वाकई शांति चाहते हैं या ये सब महज़ एक ड्रामा है?
कूटनीति के मैदान में ईरान ने वो तेवर दिखाए हैं जिसकी कल्पना भी ट्रंप के रणनीतिकारों ने नहीं की थी। इस्लामाबाद में ईरान के 71 सदस्यीय डेलिगेशन ने मेज़ पर बैठते ही 4 ऐसी शर्तें रख दी हैं, जो अमेरिका के लिए किसी कड़वी दवा से कम नहीं हैं। ईरानी मीडिया के मुताबिक, ये शर्तें ‘नॉन-नेगोशिएबल’ हैं, यानी इन पर कोई मोलभाव नहीं होगा।
पहली शर्त यह है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर ईरान का मुकम्मल कंट्रोल बना रहेगा। इसका मतलब है कि दुनिया की ‘आर्थिक रग’ ईरान के हाथ में ही रहेगी। दूसरी शर्त यह है कि इस जंग में ईरान का जो भी माली नुकसान हुआ है, उसका पूरा मुआवजा अमेरिका को देना होगा। तीसरी शर्त यह है कि दुनिया भर में ईरान की जितनी भी संपत्तियां फ्रीज की गई हैं, उन्हें बिना किसी शर्त के तुरंत वापस किया जाए। और चौथी शर्त यह कि पूरे मिडिल ईस्ट में स्थायी और मुकम्मल युद्धविराम लागू किया जाए। ईरान ने साफ कर दिया है कि जब तक ये 4 बातें नहीं मानी जाएंगी, तब तक समझौते की किसी फाइल पर दस्तखत नहीं होंगे। यह ट्रंप की ‘डीलममेकिंग’ की हवा निकालने के लिए काफी है।
हालांकि, सुबह खबर आई थी कि अमेरिका कतर में रखे ईरानी फंड को रिलीज़ करने पर राज़ी हो गया है, लेकिन थोड़ी ही देर में ट्रंप प्रशासन ने अपनी पुरानी आदत के अनुसार पलटी मार ली। व्हाइट हाउस प्रशासन ने इस खबर का खंडन किया है कि ईरान की ऐसी कोई बात मानी गई है। न्यूज़ एजेंसी ‘रॉयटर्स’ की ओर से खबरें आ रही थीं कि अमेरिका ने ईरान की फ्रीज यानी जमी हुई संपत्तियों को बहाल करने की मंजूरी दे दी है। ईरान के एक वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से खबर आई कि अमेरिका कतर और दूसरे विदेशी बैंकों से ईरान की ‘फ्रीज एसेट’ जारी करने पर सहमत हुआ है, लेकिन अब अमेरिका ने इससे साफ इनकार कर दिया है। अमेरिका की ओर से कहा गया है कि उसने कोई शर्त नहीं मानी है और न ही ईरान की संपत्तियों को ‘अनफ्रीज’ किया है।
कुछ खबरें इस तरह की भी हैं कि अभी इस विषय पर कोई औपचारिक बातचीत ही नहीं हुई है। लेकिन सवाल ये है कि अगर रियायत नहीं दी, तो ईरान की इतनी बड़ी टीम इस्लामाबाद में क्या कर रही है? हकीकत ये है कि ट्रंप की अर्थव्यवस्था इस जंग के बोझ तले दब रही है। होर्मुज बंद होने से तेल की कीमतें जो आग लगा रही हैं, उसने ट्रंप के पसीने छुड़ा दिए हैं। इसीलिए मजबूरी में ही सही, ट्रंप को ईरान की झोली में अरबों डॉलर डालने ही पड़ेंगे। यह ईरान की बहुत बड़ी कूटनीतिक जीत है और ट्रंप की पहली बड़ी शिकस्त।
हालांकि, इस बीच एक बड़ा डेवलपमेंट हुआ है। सुबह जो बड़ी खबर आई थी कि लेबनान और इज़राइल में सुलह समझौता होगा और इसके लिए 14 अप्रैल को न सिर्फ अमेरिका में लेबनान और इज़राइल को बुलाया गया था, बल्कि लेबनान के राजदूत से बातचीत होने तक की बातें सामने आई थीं, लेकिन अचानक बीच में ही इज़राइल ने ‘गेम’ कर दिया है। एक तरफ इस्लामाबाद में चाय और फाइलों के साथ शांति की बातें हो रही हैं, तो दूसरी तरफ इज़राइल का प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू इस पूरे खेल को बिगाड़ने पर तुला हुआ है। इज़राइल ने आधिकारिक तौर पर सीज़फायर वार्ता को ठुकरा दिया है। जब दुनिया शांति की उम्मीद कर रही थी, तब नेतन्याहू की वायुसेना लेबनान पर ताबड़तोड़ हमले कर रही थी।
बेरुत और उसके रिहायशी इलाकों में हो रहे ये धमाके इस बात का सबूत हैं कि नेतन्याहू को अमन से सख्त नफरत है। वे जानते हैं कि जिस दिन जंग रुकी, उनके लिए जेल के दरवाज़े खुल जाएंगे। इसीलिए वे चाहते हैं कि लेबनान में इतना खून बहे कि ईरान मजबूर होकर बातचीत की मेज़ से उठ जाए और जंग का सिलसिला जारी रहे। नेतन्याहू का ये रवैया न सिर्फ इंसानियत के खिलाफ है, बल्कि ये ट्रंप की शांति वार्ता के गाल पर एक ज़ोरदार तमाचा भी है।
इसी बीच इज़रायली सेना ने दक्षिण लेबनान के कई इलाकों में ताज़ा हवाई हमले किए। ये हमले इज़रायल-लेबनान सीमा पर बढ़ते तनाव के बीच हो रहे हैं, जहाँ पिछले कई महीनों से खूनी संघर्ष जारी है। मार्काबा-बानी हय्यान इलाके में बड़ा धमाका हुआ, जबकि शेबा कस्बे के बाहरी हिस्से में एक घर को निशाना बनाया गया। इसके अलावा बिंत जुबैल और शकरा कस्बों पर भी भीषण एयरस्ट्राइक की गई। जफ्ता शहर में हुए हमलों के बाद वहाँ से इमारतों पर बमबारी और आसमान में उठते घने धुएं के वीडियो सामने आए हैं। इज़रायल अपने इन हमलों के ज़रिए ये साफ करना चाहता है कि वह किसी भी तरह से अपने लक्ष्यों से पीछे नहीं हटना चाहता।
इस बीच अमेरिका-इज़रायल और ईरान के बीच घोषित युद्धविराम के कुछ घंटों बाद ही, बुधवार को मध्य बेरुत के भीड़भाड़ वाले कारोबारी और रिहायशी इलाकों पर भी इज़रायल ने अचानक हमले किए। लेबनान के मुताबिक, इन हमलों में कम से कम 182 लोगों की मौत हुई और सैकड़ों घायल हो गए। यह मौजूदा इज़रायल-हिज़बुल्लाह संघर्ष का सबसे घातक दिन बताया जा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि लेबनान इस सीज़फायर समझौते का हिस्सा नहीं है क्योंकि वहाँ ईरान समर्थित हिज़बुल्लाह मौजूद है। उन्होंने लेबनान में जारी हमलों को एक ‘अलग संघर्ष’ करार दिया। हालांकि, ईरान और मध्यस्थ पाकिस्तान का कहना है कि युद्धविराम लेबनान पर भी लागू होना चाहिए।
यहाँ ट्रंप का ‘दोगलापन’ भी गौर करने लायक है। ट्रंप एक तरफ जेडी वांस को पाकिस्तान भेजकर ‘पीस मेकर’ बनने की कोशिश कर रहे हैं, और दूसरी तरफ उनके चहेते नेतन्याहू को लेबनान में कत्लेआम करने के लिए बारूद सप्लाई कर रहे हैं। अगर ट्रंप वाकई शांति चाहते, तो क्या वे नेतन्याहू को एक फोन कॉल पर नहीं रोक सकते थे? हकीकत ये है कि ट्रंप और नेतन्याहू मिलकर दुनिया को गुमराह कर रहे हैं। ट्रंप चाहते हैं कि वे ईरान का फंड रिलीज़ करके उसे शांत कर दें ताकि तेल का व्यापार शुरू हो सके, लेकिन नेतन्याहू को खुली छूट दे रखी है कि वे अपनी निजी सियासत के लिए लेबनान को कब्रिस्तान बना दें। ये कैसी शांति वार्ता है जहाँ मेज़ पर तो हाथ मिलाया जा रहा है, लेकिन पीठ पीछे खंजर घोपा जा रहा है?
ईरान ने साफ कर दिया है कि वह अमेरिका के किसी भी धोखे का जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार है। ईरान की शर्तें बहुत साफ हैं—अगर अमेरिका ने फंड रिलीज़ करने में देरी की या लेबनान पर हमले नहीं रुके, तो होर्मुज की घेराबंदी और कड़ी कर दी जाएगी। इस्लामाबाद की ये वार्ता अब निर्णायक मोड़ पर है। या तो ट्रंप को झुककर ईरान की चारों शर्तें माननी होंगी, या फिर दुनिया एक ऐसे महायुद्ध की तरफ बढ़ेगी जिसे कोई नहीं रोक पाएगा। नेतन्याहू की खूनी ज़िद और ट्रंप का डगमगाता भरोसा मिडिल ईस्ट को राख के ढेर में बदल सकता है।
हालांकि, ये बात बहुत साफ है कि ईरान ने इस कूटनीतिक जंग में बढ़त बना ली है। ट्रंप, जो कल तक ‘सुपरपावर’ की धौंस दिखाते थे, आज ईरान की शर्तों के बीच बुरी तरह फंसे हुए हैं। नेतन्याहू की कोशिशें आग लगाने की हैं, लेकिन ईरान का हौसला और अमेरिका की मजबूरी कुछ और ही कहानी बयां कर रही है।



