मोह बरकरार , मोक्ष तैयार नहीं पलटे नीतीश कुमार

- नये सीएम के ऐलान के बाद शपथ ग्रहण समारोह कल
- विरोधाभासों से भरा रहा नीतीश का कार्यकाल
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
पटना। बिहार की सियासत आज एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी है। 15 वर्षों से ज्यादा समय तक सत्ता की धुरी रहे नीतीश कुमार इस्तीफा देने जा रहे हैं और इसके साथ ही शुरू होने जा रही है एक नई राजनीतिक कहानी। एक नए मुख्यमंत्री के नाम के साथ बिहार के एक नए दौर की शुरुआत। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि नया सीएम कौन होगा? सवाल यह भी है कि बिहार अब किस दिशा में जाएगा? क्योंकि प्रकृति का अटल नियम है जो आया है वह जाएगा सूरज उगता है तो ढलता भी है। लेकिन यक्ष प्रश्न वही है कि जब सूरज ढलता है तो वह अपने पीछे कैसी रोशनी छोड़कर जाता है? बात यदि बिहार में नीतीश कुमार के शासन की करें तो उनका कार्यकाल विरोधाभासों से भरा रहा है। एक तरफ उन्होंने महिलाओं के सशक्तिकरण पंचायतों में आरक्षण और सामाजिक योजनाओं के जरिए अपनी एक अलग पहचान बनाई तो दूसरी तरफ कानून व्यवस्था जातीय समीकरण और जमीनी बदलाव के मुद्दों पर उन्हें लगातार आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ा। शराबबंदी जैसा फैसला जिसे उन्होंने सामाजिक क्रांति का चेहरा बताया आज भी बहस के केंद्र में है। क्या यह फैसला वास्तव में समाज को बदल पाया? या फिर इसने नई समस्याओं को जन्म दिया? और फिर आता है उनका सबसे बड़ा राजनीतिक हुनर सबको साथ लेकर चलने की कला। नीतीश कुमार को उस नेता के रूप में देखा गया जिसने बकरी और शेर को एक ही घाट पर पानी पिलाने की राजनीति की। गठबंधन बदले समीकरण बदले लेकिन सत्ता पर उनकी पकड़ बनी रही।
नीतीश नहीं तो कौन, और क्यों?
बिहार की सत्ता की कुर्सी आज खाली नहीं बल्कि सवालों से भरी हुई है। नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद अब नजरें टिकी हैं। दोपहर 2 बजे होने वाली बीजेपी विधायक दल की बैठक पर जहां तय होगा बिहार का अगला चेहरा कौन होगा। सियासत के गलियारों में नामों की गूंज तेज है लेकिन तस्वीर अभी भी धुंधली है। सबसे आगे चल रहा नाम है डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी का है। जिन्हें भाजपा का मजबूत चेहरा और संगठन का भरोसेमंद खिलाड़ी माना जा रहा है। अगर यह दांव खेला गया तो बिहार में पहली बार भाजपा पूरी ताकत के साथ मुख्यमंत्री पद पर काबिज होती दिखेगी। दूसरा नाम नित्यानंद राय का भी हवा में है। संगठन और केंद्र से मजबूत कनेक्शन उन्हें रेस में बनाए हुए है। वहीं रेनू देवी का नाम सामने आना यह संकेत देता है कि पार्टी महिला और पिछड़े वर्ग के समीकरण को भी साधने की कोशिश कर सकती है। लेकिन असली खेल नामों से ज्यादा समीकरणों का है।
सत्ता नहीं उम्मीदों का बोझ भी होगा नये सीएम पर
लेकिन अब जब यह अध्याय खत्म होने जा रहा है तो नजरें टिक गई हैं नए मुख्यमंत्री पर। क्या वह इस विरासत को आगे बढ़ाएंगे? या फिर बिहार के लिए एक नई परिभाषा गढ़ेंगे? क्योंकि हर नया नेता सिर्फ कुर्सी नहीं संभालता वह उम्मीदों का बोझ भी उठाता है। उसे यह तय करना होता है कि वह पुराने पदचिन्हों पर चलेगा या फिर अपनी एक नई राह बनाएगा। आज बिहार सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं देख रहा। बल्कि यह तय होते देख रहा है कि आने वाले वर्षों में उसकी राजनीति का चेहरा कैसा होगा। आज का यह बदलाव सिर्फ चेहरे का है या फिर सिस्टम में भी कोई बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा? यही वो सवाल है जिसका जवाब अब नया मुख्यमंत्री अपने फैसलों से देगा।
भाजपा पूरा नियंत्रण अपने हाथ में लेगी?
क्या भाजपा पूरा नियंत्रण अपने हाथ में लेगी? या फिर सहयोगी दलों को संतुलित रखने के लिए कोई सहमति वाला चेहरा सामने आएगा? यही वो बिंदु है जहां सियासत शतरंज बन जाती है। हर चाल के पीछे कई परतें छिपी होती हैं। नीतीश कुमार भले ही कुर्सी छोड़ रहे हों लेकिन उनके प्रभाव से इनकार नहीं किया जा सकता। सवाल यह भी है कि क्या नया चेहरा पूरी तरह स्वतंत्र होगा या फिर रिमोट कंट्रोल की चर्चा फिर जोर पकड़ेगी? दोपहर 2 बजे की बैठक सिर्फ नेता नहीं चुनेगी बल्कि यह तय करेगी बिहार की राजनीति आने वाले वर्षों में किस दिशा में जाएगी।
नई सरकार बनने से पहले बड़ा प्रशासनिक फेरबदल नीतीश के सबसे करीबी अफसर केंद्र में भेजे गए
नई सरकार बनने से पहले बड़ा प्रशासनिक फेरबदल हुआ है। सीएम नीतीश कुमार के करीबी अफसरों को केंद्रीय प्रतिनियुक्ति मिली है, यानी कि नई सरकार बनने के साथ ही नीतीश के करीबी भी राज्य से केंद्र में चले जाएंगे, सीएम नीतीश कुमार ने अब तक इस्तीफा दिया नहीं है,उनके इस्तीफे से पहले ही ब्यूरोक्रेसी में फेरबदल देखने को मिला है। केंद्र सरकार ने अधिसूचना जारी कर बिहार कैडर के कई आईएएस और आईपीएसअधिकारियों को केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर बुला लिया है। केंद्र की पहली लिस्ट में सीएम नीतीश के सबसे भरोसेमंद अधिकारियों के नाम भी शामिल हैं।




