नाटो ने ट्रंप को दिया बड़ा झटका, 32 देशों ने हॉर्मुज नाकाबंदी पर साथ देने से किया इनकार

नाटो के 32 देशों ने ट्रंप के खिलाफ सरेआम बगावत करते हुए साफ़ कह दिया है कि "हम तुम्हारी इस जहाज़ी डकैती में साथ नहीं देंगे।"

4pm न्यूज नेटवर्क: ईरान की इंटेलिजेंस ने इज़राइल के पाप के घड़े को फोड़ते हुए मोसाद के 35 जासूसों को धर दबोचा है। ये वो मुकबिर थे जो इज़राइल की शह पर ईरान की पीठ में छुरा घोंप रहे थे। और दूसरी दहला देने वाली खबर यह कि ट्रंप की उस ‘हॉर्मुज नाकेबंदी’ की हवा निकल गई है, जिसका दम वे पूरी दुनिया के सामने भर रहे थे।

नाटो के 32 देशों ने ट्रंप के खिलाफ सरेआम बगावत करते हुए साफ़ कह दिया है कि “हम तुम्हारी इस जहाज़ी डकैती में साथ नहीं देंगे।” इस बीच, ट्रंप आनन-फानन में एक ‘ग्रैंड डील’ का नया शिगूफ़ा ले आए हैं। क्या यह ट्रंप का सरेंडर है? क्या नेतन्याहू का जासूसी नेटवर्क पूरी तरह तबाह हो चुका है? और क्यों ईरान के राष्ट्रपति मसूद पजशकियान ने 6 खास मुल्कों का शुक्रिया अदा किया है? चलिए, बेनकाब करते हैं इन तमाम साज़िशों को।

जासूसी की दुनिया में इज़राइल की मोसाद खुद को बहुत बड़ा सूरमा समझती है, लेकिन ईरान ने साबित कर दिया है कि उसकी ज़मीन पर यह गंदा खेल नहीं चलेगा। ईरान की खुफिया एजेंसी ने एक बहुत बड़ा ऑपरेशन चलाकर इज़राइल के 35 खूंखार जासूसों को गिरफ्तार किया है। ये एजेंट ईरान के अंदरूनी ठिकानों की जानकारी, मिलिट्री मूवमेंट और वैज्ञानिकों की लोकेशन इज़राइल को मुहैया करा रहे थे।

नेतन्याहू जो यह दावा कर रहे थे कि ईरान के अंदर उनका नेटवर्क इतना मज़बूत है कि वे जब चाहें तबाही मचा सकते हैं, आज उसी नेटवर्क को ईरान ने ‘मटियामेट’ कर दिया है। ये गिरफ्तारियां ज़ाहिर करती हैं कि ईरान की नकेल अब इज़राइल के गले में कस चुकी है। नेतन्याहू के पास अब इसका कोई जवाब नहीं है कि उनके पालतू जासूस अब ईरानी जेलों में चक्की पीस रहे हैं।

इधर इज़राइल का जासूसी तंत्र ढहा, तो उधर ट्रंप को उनके अपने दोस्तों ने दगा दे दिया। ट्रंप ने हॉर्मुज की नाकेबंदी करके ईरान को घुटनों पर लाने का जो ख्वाब देखा था, उस पर नाटो के 32 देशों ने पानी फेर दिया है। फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों और ब्रिटेन के पीएम कीर स्टारमर ने दो-टूक लफ़्ज़ों में कह दिया है— “ट्रंप साहब, आपकी इस ज़िद में हम अपने मुल्क को जंग की आग में नहीं झोंकेंगे।”

नाटो का यह इनकार ट्रंप के लिए किसी ज़ोरदार तमाचे से कम नहीं है। जो ट्रंप समझते थे कि वे अपनी उंगलियों पर दुनिया को नचाएंगे, आज वे अंतरराष्ट्रीय मंच पर बिल्कुल तन्हा खड़े हैं। 32 मुल्कों का यह फैसला बताता है कि अब दुनिया ट्रंप की दादागिरी और नेतन्याहू की ज़हनी बीमारी का बोझ उठाने को तैयार नहीं है।

2 हफ्तों के सीज़फायर के बाद अफगानिस्तान में अमेरिका और ईरान के बीच बैठक हुई थी। दोनों के अपनी-अपनी शर्तों पर अड़े रहने के चलते बातचीत फेल हो गई। इसके बाद ट्रंप ने ईरान पर दबाव बनाने के लिए ‘हॉर्मुज स्ट्रेट’ की नाकाबंदी कर दी।

इस नाकाबंदी में साथ देने के लिए ट्रंप ने अन्य देशों का समर्थन माँगा था। काफी दबाव के बाद भी अन्य देशों ने ट्रंप के मिशन में शामिल होने से इनकार कर दिया है। अब नाटो ने भी ट्रंप को झटका देते हुए नाकाबंदी में शामिल होने से मना कर दिया है।

रॉयटर्स के मुताबिक, नाटो सहयोगी देशों ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ईरानी बंदरगाहों की नाकाबंदी वाले प्लान में शामिल होने से इनकार कर दिया है। उनका कहना है कि वे लड़ाई खत्म होने के बाद ही कोई कदम उठाएंगे। इससे पहले डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर पोस्ट कर दावा किया था कि दूसरे देश भी जल्द ही होर्मुज नाकाबंदी में शामिल होंगे।

इसके बावजूद, ब्रिटेन और फ्रांस सहित नाटो के सदस्यों ने इसमें शामिल होने में रुचि नहीं दिखाई है, बल्कि वे होर्मुज को फिर से खोलने के प्रयासों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, जिससे होकर वैश्विक तेल शिपमेंट का लगभग पाँचवाँ हिस्सा गुजरता है। ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने एक साक्षात्कार में कहा कि भारी दबाव के बावजूद, ब्रिटेन नाकाबंदी का समर्थन नहीं करेगा और युद्ध में उलझने से बचने के अपने निर्णय पर ज़ोर दिया।

इसके अलावा, फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने होर्मुज़ से यातायात बहाल करने के लिए एक बहुराष्ट्रीय मिशन स्थापित करने हेतु ब्रिटेन और अन्य देशों के साथ एक सम्मेलन आयोजित करने की योजना बनाई है। स्टारमर ने यह भी कहा कि इस पहल का उद्देश्य तेल और गैस टैंकरों के सुरक्षित आवागमन के लिए नियम स्थापित करना है।

ऐसे में जब हर तरफ से रास्ते बंद होने लगे, तो ट्रंप ने अपना पुराना पैंतरा चला है। ट्रंप ने अब अचानक से एक ‘ग्रैंड डील’ का ऐलान कर दिया है। ट्रंप का दावा है कि ईरान के साथ न्यूक्लियर डील पर एक बड़ा समझौता हो गया है और जंग बस कुछ घंटों में खत्म हो सकती है।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि ईरान के साथ जारी भीषण युद्ध अब अपने अंतिम चरण में है और अगले कुछ घंटों में एक ऐतिहासिक समझौता हो सकता है। दावा किया जा रहा है कि ईरान-अमेरिका कल यानी 16 अप्रैल को एक बार फिर से पाकिस्तान में बातचीत की मेज पर लौट रहे हैं और इस दौरान कुछ बड़ा ऐलान हो सकता है। फॉक्स बिजनेस को दिए एक इंटरव्यू में ट्रंप ने दावा किया कि उनकी सैन्य कार्रवाई ने ईरान की कमर तोड़ दी है और अब तेहरान ‘बहुत बुरी तरह’ समझौता करना चाहता है।

इंटरव्यू के दौरान जब ट्रंप से ईरान युद्ध के भविष्य पर सवाल पूछा गया तो उन्होंने साफ कहा, ‘मुझे लगता है कि यह युद्ध खत्म होने वाला है। मैं इसे खत्म होने के बेहद करीब देख रहा हूँ’। ट्रंप ने विश्वास जताया कि ईरान अब समझौते के लिए पूरी तरह तैयार है क्योंकि अमेरिकी नाकेबंदी और हमलों ने उसकी ताकत को पस्त कर दिया है।

ट्रंप ने एक बेहद चौंकाने वाला दावा करते हुए कहा कि उनके हमलों ने ईरान के परमाणु ठिकानों को इतना नुकसान पहुँचाया है कि अब ईरान को परमाणु हथियार बनाने की स्थिति में दोबारा पहुँचने में कम से कम 20 साल लगेंगे। ट्रंप ने कहा, ‘अगर मैं अभी पीछे हट जाऊँ तब भी उन्हें उस देश को दोबारा खड़ा करने में 20 साल लगेंगे। हमने उन्हें न्यूक्लियर वेपन हासिल करने से पूरी तरह रोक दिया है’।

ट्रंप ने साफ किया कि जब तक समझौता फाइनल नहीं हो जाता, होर्मुज की खाड़ी पर अमेरिकी नौसेना की नाकेबंदी जारी रहेगी। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर कोई ईरानी जहाज नाकेबंदी तोड़ने की कोशिश करेगा, तो उसे तुरंत ‘खत्म’ कर दिया जाएगा। इसी भारी दबाव के बीच ईरान अब समझौते के लिए उत्सुक दिख रहा है।

हालांकि ईरान की ओर से जो खबरें आई हैं उसमें ईरान ने यह बात पूरी तरह साफ कर दी है कि किसी दबाव में कोई फैसला नहीं लिया जाएगा, बल्कि अगर ज़रूरत पड़ी तो होर्मुज में भी अमेरिका को तगड़ा जवाब दिया जाएगा। ऐसे में साफ है कि ट्रंप भले ही इंटरव्यू और सोशल मीडिया पर ‘अपने मुँह मियाँ मिट्ठू’ बन रहे हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि समझौते की मेज पर वह ईरान को पूरा सम्मान देने को मजबूर होंगे; और अगर ऐसा नहीं होता है, तो यह बात भी पूरी तरह तय है कि इस बार संग्राम बहुत भीषण होगा।

लेकिन ज़रा गौर कीजिए कि ये वही ट्रंप हैं जो कुछ दिन पहले ईरान को ‘स्टोन एज’ में भेजने की धमकी दे रहे थे। लेकिन हकीकत यह है कि बिना नाटो के समर्थन के और ग्लोबल इकोनॉमी के डूबते जहाज़ को देखकर ट्रंप को अब अपनी कुर्सी खिसकती नज़र आ रही है। वे समझौते का नाम लेकर असल में अपनी हार को छिपाने की कोशिश कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि कैसे भी करके इज़राइल और अमेरिका की साख बच जाए, क्योंकि वे जानते हैं कि अगर जंग लंबी खिंची, तो तेल की कीमतें अमेरिका की बर्बादी का सबब बनेंगी।

इस पूरे संकट के बीच, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पजशकियान ने एक निहायत ही संजीदा और सुलझा हुआ स्टैंड लिया है। उन्होंने 6 खास मुल्कों का शुक्रिया अदा किया है जिन्होंने ट्रंप की दादागिरी के आगे झुकने से इनकार कर दिया। इसमें रूस और चीन के साथ-साथ उन मुल्कों के नाम भी शामिल हैं जिन्होंने हॉर्मुज में शांति की वकालत की।

पजशकियान ने साफ़ कह दिया है कि ईरान जंग नहीं चाहता, लेकिन अगर उसे छेड़ा गया, तो वह इज़राइल के लिए ‘कब्रिस्तान’ बना देगा। उन्होंने यह भी साबित कर दिया कि ईरान का कूटनीतिक कद आज ट्रंप से कहीं बड़ा हो गया है। पजशकियान की यह खामोश जीत बताती है कि हक और सच की जंग में अब ईरान के साथ पूरी दुनिया खड़ी हो रही है।

साफ है कि आज का दिन ईरान जंग के बाद भले ही बड़े नुकसान में है, लेकिन एक मजबूत राष्ट्र बनकर उभरा है, जिसकी हिम्मत और कारनामों की पूरी दुनिया दाद दे रही है। मोसाद के जासूस धरे गए, ट्रंप की नाकेबंदी नाकाम हुई और नाटो ने अमेरिका का साथ छोड़ दिया। ट्रंप और नेतन्याहू ने जो आग लगाई थी, आज उसी की लपटें उनके अपने घर तक पहुँच रही हैं। इज़राइल के मासूमों का खून बहाने वाले नेतन्याहू और दुनिया को डराने वाले ट्रंप आज बेनकाब हो चुके हैं।

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