आप साफ… ऑपरेशन लोटस की जद में सपा ?
शिवसेना यूबीटी का दावा सपा पर बीजेपी की टेढ़ी नजर

- सात सांसदों ने बदले पाले लोकतंत्र फिर सवालों के हवाले?
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। दिल्ली, पंजाब, महाराष्ट्र और बिहार के बाद क्या ऑपरेशन लोटस का अगला पड़ाव उत्तर प्रदेश है। चर्चाओं का बाजार गर्म है। शिवसेना यूबीटी जैसे राजनीतिक दल खुले मंच से कह रहे हैं कि ऑपरेशन लोटस का अगला टारगेट उत्तर प्रदेश है और निशाने पर समाजवादी पार्टी है। दावा किया जा रहा है कि जल्द ही इस बाबत बड़ी खबरें सुनाई देगी। इस बात में दम इसलिए नजर आ रहा है कि यूपी बीजेपी के लिए सबसे खास है और समाजवादी पार्टी इसलिए निशाने पर है क्योंकि उसने ही बीजेपी के विजयी रथ को लोकसभा चुनाव में 35 सांसद जीतकर रोक दिया था। यदि सपा ने इतनी बड़ी जीत यहां से दर्ज नहीं की होती तो यकीन जानिये मोदी सरकार में पहली बार जो बिल गिरा है वह न गिरा होता। बीजेपी को इस बात का मलाल है और शायद वह पहले से ज्यादा टफ या यूं कहें कि खतरनाक बन कर बैक करने की कोशिशों में लग चुकी है। राजनीतिक विशलेषकों की माने तो सरकार के प्रति लोगों में नाराजगी है। सत्ता के भीतर कई पावर सेंटर और जातिये गणित का ताना बना एटम बम का रूप ले चुका है। इसलिए इस बात की आशंकाएं बलवती हो रही है कि यूपी सपा में एक बड़ी घटना देखने को मिल सकती है। ऐसा इसलिए भी कहा जा रहा है क्योंकि बीजेपी को सीधी चुनौती देने के मामले में यूपी में सिर्फ सपा ही सामने हैं। बाकी राजनीतिक दल परास्त हो चुके हैं या फिर हथियार डाल चुके हैं।
जो आज आप में हुआ, वही कल सपा और कांग्रेस में होगा : आनंद दुबे
इस पूरे डरावने राजनीतिक वातावरण में शिवसेना (यूबीटी) प्रवक्ता आनंद दुबे ने आने वाले कल की तस्वीर को रेखांकित करते हुए कहा है कि जिस प्रकार के ऑपरेशन लोटस के बारे में हमने सुना था 2022 में हमारी शिवसेना को तोड़कर कैसे दो शिवसेना बनाई गयी? कैसे कई सारे सांसद और विधायक चले गए? वही आज आम आदमी पार्टी में हो रहा है और कल समाजवादी पार्टी और कांग्रेस में होगा। भाजपा को विपक्ष मुक्त भारत चाहिए। उन्होंने कहा कि भाजपा ने देश में ऐसा माहौल बना दिया है कि उन्हें विपक्ष चाहिए ही नहीं। अगर 10 में से सात राज्यसभा सांसद आप में से भाजपा में शामिल हो गए तो उनके पास बचा क्या? उनकी पार्टी आम आदमी के लिए बनी थी लेकिन अगर उनके सदस्य ही राज्यसभा सांसद ही खास आदमी हो गए और सभी भाजपा में चले गए तो सवाल हमसे नहीं भाजपा से बनता है।
दीवार की तरह डंटे हैं अखिलेश यादव
उत्तर प्रदेश की राजनीति में जब भी ऑपरेशन लोटस जैसे शब्द गूंजते हैं तो उनके पीछे सिर्फ आरोप नहीं होते एक डर भी होता है और एक रणनीति भी। सवाल यह है कि क्या हर राजनीतिक हलचल को इसी चश्मे से देखना चाहिए या फिर यह उस नेता की मजबूती का संकेत है जिसे रोकना आसान नहीं? यूपी में यदि विपक्षी मजबूत नेता को देखे तो अखिलेश यादव पर ही आकर नाम ठहरता है। उत्तर प्रदेश की सियासत में वह चेहरा जिसने पिछले वर्षों में खुद को एक मजबूत विपक्षी धुरी के रूप में स्थापित किया है। अखिलेश यादव के इर्द गिर्द सियासी हलचल। उनकी पार्टी को लेर इतनी ज्यादा चर्चा? यह बताने के लिए काफी है कि यूपी राजनीति में बीजेपी को यदि किसी राजनीतिक दल से खौफ है तो वह अखिलेश यादव की पार्टी है। पिछले चुनावी नतीजों ने भी यह साफ कर दिया है कि समाजवादी पार्टी ने जमीन पर अपनी पकड़ को फिर से जीवित किया है। सामाजिक गठजोड़ को नए सिरे से जोड़ा है। युवाओं को अपने साथ मिलाने का काम किया है और एक ऐसा नैरेटिव खड़ा किया गया जिसमें क्षेत्रीय पहचान और स्थानीय मुद्दे दोनों शामिल है। यह सच है कि उत्तर प्रदेश में मुकाबला अब एकतरफा नहीं दिखता। और यही बात किसी भी विपक्षी नेता की ताकत मानी जाती है कि वह मुकाबला पैदा कर दे। अखिलेश यादव की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत उनका युवा चेहरा और डिजिटल कनेक्ट है। उनका सामाजिक समीकरणों पर मजबूत पकड़ और सबसे अहम सीधी लड़ाई लडऩे की क्षमता।
दो ध्रुव एक रण : यूपी में क्यों जरूरी है बीजेपी के लिए ऑपरेशन लोटस?
उत्तर प्रदेश की राजनीति अब धुंध से निकलकर साफ रेखाओं में दिखने लगी है। एक ओर भारतीय जनता पार्टी जिसके पास मजबूत संगठन व्यापक संसाधन और राष्ट्रीय स्तर का स्थापित नैरेटिव है। दूसरी ओर समाजवादी पार्टी जो सामाजिक गठजोड़ क्षेत्रीय पकड़ और हालिया चुनावी प्रदर्शन से मिली ऊर्जा के साथ मैदान में है। यह सिर्फ दो दलों की लड़ाई नहीं बल्कि दो माडल, दो दृष्टिकोण और दो संदेशों की भिड़ंत है। बीजेपी अपने ट्रैक रिकॉर्ड कानून-व्यवस्था इंफ्रास्ट्रक्चर और केंद्र राज्य समन्वय को सामने रखकर स्थिरता का संदेश देती है। वहीं सपा सामाजिक समीकरणों की बारीक समझ स्थानीय मुद्दों की पकड़ और एंटी-इंकम्बेंसी के पॉकेट्स को साधकर संतुलन और बदलाव का नैरेटिव गढ़ती है।
बड़े नारों में नहीं छोटे-छोटे प्रबंधन में छिपा है राज
लेकिन इस बार असली खेल बड़े नारों में नहीं छोटे छोटे प्रबंधन में छिपा है। बूथ स्तर पर किसकी पकड़ मजबूत है? किसका कैडर आखिरी दिन तक सक्रिय रहता है? किसका उम्मीदवार स्थानीय समीकरणों में फिट बैठता है? यह सवाल कागज पर छोटे लगते हैं लेकिन चुनावी नतीजों में यही निर्णायक बनते हैं। और फिर आता है जनता का मूड जो हर इलाके में अलग है। पश्चिमी यूपी का समीकरण पूर्वांचल से अलग है बुंदेलखंड की प्राथमिकताएं अलग है और शहरी बनाम ग्रामीण मतदाताओं का झुकाव भी अलग अलग दिशा में चलता है। यही विविधता इस मुकाबले को और जटिल बनाती है। स्पष्ट है कि यूपी में अब बहुकोणीय लड़ाई नहीं रही। यह सीधी भिड़ंत है जहां हर कदम तौलकर उठाया जाएगा और हर चूक की कीमत चुकानी पड़ेगी।




