बांदा में मीडिया बनाम प्रशासन: विज्ञापन, आरोप और सच्चाई का बड़ा खेल क्या है?

बांदा में पेजा के ज्ञापन पर विवाद गहराया। सूचना विभाग पर भेदभाव के आरोप, जबकि विज्ञापन लाभ लेने के दावे भी सामने आए। फर्जी विज्ञापनों के आरोपों ने बढ़ाई चर्चा। प्रशासन जांच के संकेत दे चुका है।

4पीएम न्यूज नेटवर्कः कभी पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, सत्ता से सवाल करने वाला, जनता की आवाज़ को मंच देने वाला। लेकिन जब सवाल खुद पत्रकार संगठनों की कार्यशैली पर उठने लगें, तो बहस का दायरा और भी व्यापक हो जाता है। बांदा में हाल ही में ऐसा ही एक मामला सामने आया है, जहां प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक जर्नलिस्ट एसोसिएशन (पेजा) द्वारा जिलाधिकारी को सौंपे गए ज्ञापन ने नया विवाद खड़ा कर दिया है।

ज्ञापन में लगाए गए गंभीर आरोप

पेजा की ओर से दिए गए ज्ञापन में सूचना विभाग और प्रशासन पर भेदभाव, दुर्व्यवहार और उत्पीड़न जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। संगठन का कहना है कि पत्रकारों के साथ समान व्यवहार नहीं किया जा रहा और उन्हें अनदेखा किया जा रहा है।

दावों की साख पर सवाल

हालांकि, इस ज्ञापन के सामने आते ही कई जानकारों और विभागीय सूत्रों ने इन आरोपों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सूत्रों के अनुसार, जनपद में सूचना विभाग के माध्यम से जारी होने वाले सरकारी विज्ञापनों का बड़ा हिस्सा अब तक पेजा से जुड़े पत्रकारों को ही मिलता रहा है। ऐसे में अचानक उसी विभाग पर भेदभाव के आरोप लगाना कई लोगों को विरोधाभासी प्रतीत हो रहा है। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा तेज है कि यदि पहले लाभ मिल रहा था, तो अब शिकायत क्यों?

फर्जी विज्ञापनों के आरोप भी चर्चा में

मामले को और जटिल बनाते हुए कुछ सदस्यों पर यह आरोप भी सामने आए हैं कि उन्होंने कथित रूप से फर्जी या संदिग्ध विज्ञापन प्रकाशित कर आर्थिक लाभ उठाया। हालांकि, इन आरोपों की अभी तक आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन यदि इनमें सच्चाई पाई जाती है, तो यह मामला और गंभीर हो सकता है।

“हितों का टकराव” या “हक की लड़ाई”?

सूत्रों का कहना है कि इस पूरे घटनाक्रम में व्यक्तिगत हित और दबाव की राजनीति की झलक दिखाई देती है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह वास्तव में पत्रकारों के अधिकारों की लड़ाई है या फिर बदलते लाभ के समीकरणों का परिणाम?

रिपोर्ट – इक़बाल खान

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