राहुल गांधी ने भिजवा दिया सिद्धारमैया को त्यागपत्र संदेश

- सीएम को मिलेगा सम्मानजनक एग्जिट पैकेज
- बेटा डिप्टी सीएम और समर्थक विधायकों को मंत्रीपद
- दिल्ली दरबार में झुके सिद्धा, बेंगलुरु में बजेगा डीके राज का बिगुल
- इस्तीफे की पटकथा तैयार?
- राज्यपाल भवन तक पहुंच चुका सत्ता परिवर्तन का संदेश
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
बेंगलुरु। कर्नाटक की सत्ता में आखिर वह विस्फोट हो गया जिसकी आहट पिछले कई महीनों से सुनाई दे रही थी। कांग्रेस के भीतर चल रहा ढाई साल बनाम पूरा कार्यकाल का युद्ध अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है। सूत्रों के मुताबिक मुख्यमंत्री सिद्धारमैया कल राज्यपाल से मुलाकात कर अपना इस्तीफा सौंप सकते हैं और इसके साथ ही डीके शिवकुमार के मुख्यमंत्री बनने का रास्ता लगभग साफ माना जा रहा है। सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश यह निकल रहा है कि आखिरकार सिद्धारमैया ने राहुल गांधी और कांग्रेस हाईकमान के सामने सरेण्डर कर दिया है। दिल्ली में हुई हाई वोल्टेज बैठकों के बाद अचानक घटनाक्रम जिस तेजी से बदला उसने साफ कर दिया कि कांग्रेस अब कर्नाटक में सत्ता संघर्ष को और लंबा खींचने के मूड में नहीं है। पार्टी को डर था कि अगर अंदरूनी लड़ाई खुलकर सामने आ गई तो दक्षिण भारत में उसका सबसे मजबूत किला दरक सकता है। यही वजह है कि राहुल गांधी ने सीधे हस्तक्षेप किया और सत्ता परिवर्तन का फॉर्मूला आगे बढ़ाया गया। अब चर्चा यह है कि सिद्धारमैया को सम्मानजनक एग्जिट पैकेज दिया गया है, राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका बेटे यतींद्र के लिए बड़ी जिम्मेदारी और समर्थकों को मंत्रालयों में हिस्सेदारी।
झुक गये सिद्धारमैया
लेकिन असली कहानी सिर्फ इस्तीफे की नहीं, बल्कि उस राजनीतिक दबाव की है जिसने सिद्धारमैया जैसे मजबूत नेता को झुकने पर मजबूर कर दिया। चुनाव जीतने के बाद सिद्धारमैया खेमा लगातार दावा करता रहा कि सरकार उनकी लोकप्रियता के दम पर बनी। पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक और ग्रामीण वोट बैंक पर उनकी पकड़ कांग्रेस की ताकत मानी जाती रही। ऐसे में उनका हटना सिर्फ नेतृत्व परिवर्तन नहीं बल्कि कांग्रेस के भीतर शक्ति संतुलन बदलने का संकेत भी माना जा रहा है। उधर डीके शिवकुमार के समर्थकों में माहौल पूरी तरह जश्न वाला हो चुका है। बेंगलुरु में पोस्टर लगने शुरू हो गए हैं सोशल मीडिया पर नेक्स्ट सीएम डीके ट्रेंड हो रहा है और पार्टी के भीतर यह संदेश देने की कोशिश हो रही है कि आखिरकार संगठन के असली रणनीतिकार को उसका इनाम मिल गया। शिवकुमार खेमा इसे कमिटमेंट की जीत बता रहा है। दावा किया जा रहा है कि सत्ता साझा करने का वादा पहले दिन से था और अब हाईकमान सिर्फ उसी समझौते को लागू कर रहा है।
क्या चुप बैठेगा सिद्धारमैया खेमा
लेकिन राजनीति में हर सत्ता परिवर्तन अपने पीछे बारूद भी छोड़ता है। सबसे बड़ा सवाल अब यही है कि क्या सिद्धारमैया का खेमा चुप बैठेगा? क्या मंत्री और विधायक खुलकर नाराजगी दिखाएंगे? क्या कांग्रेस के भीतर सॉफ्ट रेबेलियन शुरू होगा? और सबसे अहम क्या बीजेपी इस पूरे घटनाक्रम को ऑपरेशन लोटस के मौके में बदलने की कोशिश करेगी? फिलहाल कर्नाटक में सिर्फ मुख्यमंत्री नहीं बदल रहा बल्कि कांग्रेस के भीतर ताकत का पूरा नक्शा बदलता दिखाई दे रहा है। और इस पूरे घटनाक्रम ने एक बात साफ कर दी है कि दिल्ली दरबार में आखिरी मुहर राहुल गांधी की ही चलती है।
पूरे संकट को कंट्रोल्ड ट्रांजिशन बनाना चाहते है राहुल
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी इस पूरे संकट को कंट्रोल्ड ट्रांजिशन बनाना चाहते हैं। वह नहीं चाहते कि पंजाब या राजस्थान जैसी स्थिति दोहराई जाए जहां अंदरूनी संघर्ष ने पार्टी को कमजोर कर दिया था। लेकिन कर्नाटक का मामला ज्यादा संवेदनशील है क्योंकि दक्षिण भारत में कांग्रेस के पास यही सबसे बड़ा राज्य है। अगर यहां अस्थिरता बढ़ती है तो उसका असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ेगा। कर्नाटक में फिलहाल जनता से ज्यादा नेता बेचैन हैं। सत्ता के गलियारों में हर कोई एक-दूसरे की बॉडी लैंग्वेज पढ़ रहा है। कोई दिल्ली के संकेत देख रहा है कोई पोस्टर की भाषा समझ रहा है तो कोई सुबह के नाश्ते में परोसी जाने वाली मुस्कान के पीछे छिपे राजनीतिक दर्द को। लेकिन एक बात तय है कि ब्रेकफास्ट सिर्फ कॉफी और इडली का कार्यक्रम नहीं यह तय करेगा कि कांग्रेस एकजुट पार्टी की तस्वीर पेश करेगी या फिर कर्नाटक से राष्ट्रीय स्तर तक फैलने वाला नया सत्ता संग्राम शुरू हो जाएगा।
कांग्रेस की राजनीति थाली में बहुत कुछ
सबसे दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस नेतृत्व सिर्फ सीएम बदलने की मशक्कत नहीं कर रहा बल्कि बगावत रोकने का गणित भी तैयार कर रहा है। सिद्धारमैया को राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका उनके बेटे यतींद्र को डिप्टी सीएम पद, तीन-चार नए उपमुख्यमंत्री जातीय संतुलन मंत्रालयों की नई डील यानी कुर्सी बचाने के लिए पूरी राजनीतिक थाली सजाई जा रही है। लेकिन सवाल वही है क्या इतने रायते के बाद भी पार्टी एकजुट दिख पाएगी? और यहीं से कहानी में सबसे विस्फोटक एंगल एंट्री मारता है अगर सिद्धारमैया हटते हैं और उनके समर्थक खुलकर नाराज हो जाते हैं तो क्या कांग्रेस के भीतर सॉफ्ट विद्रोह शुरू हो सकता है? क्या बीजेपी इसी मौके का इंतजार कर रही है? क्या कांग्रेस का दक्षिणी किला अंदरूनी लड़ाई में ही कमजोर हो जाएगा? या फिर राहुल गांधी आखिरी वक्त पर ऐसा फॉर्मूला निकालेंगे कि दोनों नेताओं को लगे कि जीत उसी की हुई है। कर्नाटक में फिलहाल राजनीति नहीं चल रही बल्कि सत्ता का हाई-वोल्टेज रियलिटी शो चल रहा है। जहां एक तरफ कॉफी के कप हैं दूसरी तरफ कुर्सी का करंट।




