पश्चिम बंगाल में टीएमसी नेताओं के लिए लॉकडाउन
अभिषेक बनर्जी के बाद कल्याण बनर्जी पर अटैक

- राहुल-अखिलेश समेत तमाम नेताओं ने जाहिर की चिंता
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। सत्ता बदली, सिस्टम नहीं? सड़क पर सियासत और लोकतंत्र के बीच छिड़ी नई जंग। चुनाव से पहले तक पश्चिम बंगाल में जो लोकतंत्र की हत्या का आरोप लगाते थे आज उन पर लोकतंत्र की पोस्टमार्टम रिपोर्ट लिखने का आरोप लग रहा है। सवाल उठ रहे है कि क्या पश्चिम बंगाल में इतिहास एक बार फिर दोहराया जा रहा है? चाल चरित्र और चेहरा का दावा करने वाली बीजेपी सरकार भी उसी रूट पर चल रही है जिस पर वहां की पूर्ववर्ती सरकारों को चलने का आरोप लगता आ रहा है। कांग्रेस को लेफ्ट ने, लेफ्ट को टीएमसी ने और टीएमसी को बीजेपी ने टेकओवर किया है और जो आरोप पहले कभी लेफ्ट पर कांग्रेस लगाती थी आज वैसा ही सबकुछ आन कैमरा दिखाई दे रहा है। सरकार इसे जनआक्रोश का नाम दे रही है तो विपक्ष इसे लोकतंत्र की हत्या करार दे रहा है। टीएमसी में सेकेंड लीड पोजिशन पर काम कर रहे अभिषेक बनर्जी को सरेराह दौड़ा-दौड़ा कर पीटा गया। उसके बाद कल्याण बनर्जी को पत्थर से मारा गया? यही नहीं टीएमसी कांग्रेस के दफ्तरों को आग के हवाले कर देना और आम कार्यकर्ताओं के बीच दो-दो हाथ की अनगित घटनाएं सरकार गठन के बाद से आ रही है। ऐसे में पश्चिम बंगाल को लेकर राजीनतिक गलियारों में तरह-तरह की बातें की जा रही है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव समेत विपक्षी नेता इसे लोकतंत्र की हत्या करार दे रहे हैं।
बंगाल के सामने भी खड़ी है चुनौती
आने वाले वर्षों में जनता सिर्फ यह नहीं देखेगी कि सरकार ने कितनी सड़कें बनाईं, कितने उद्योग लगाए या कितनी योजनाएं शुरू कीं। जनता यह भी देखेगी कि क्या राजनीतिक असहमति को सम्मान मिला, क्या विपक्ष को बोलने का अधिकार मिला और क्या लोकतंत्र की वह आत्मा बची रही जिसके दम पर सत्ता परिवर्तन संभव हुआ।
अगर जनता ने नकार दिया है तो फिर ममता से इतना डर क्यों?
यही वह सवाल है जो आज पश्चिम बंगाल की राजनीति की छाती पर हथौड़े की तरह बज रहा है। भाजपा कह रही है कि जनता ने टीएमसी को सत्ता से बेदखल कर दिया। जनता ने परिवर्तन के नाम पर नया जनादेश दिया है जनता ने ममता युग का अंत कर दिया। ठीक है अगर ऐसा ही है तो फिर हर दूसरे दिन ममता बनर्जी भाजपा के निशाने पर क्यों दिखाई देती हैं? अगर टीएमसी खत्म हो चुकी है तो उसके हर बयान से सत्ता के गलियारों में हलचल क्यों मच जाती है? अगर जनता ने विपक्ष को नकार दिया है तो फिर विपक्ष की हर रैली हर प्रदर्शन और हर प्रेस कॉन्फ्रेंस को इतनी गंभीरता से क्यों लिया जा रहा है? राजनीति का सबसे बड़ा सच यह है सरकार उसी से डरती है जिसमें अभी भी जनता के बीच लौटने की ताकत बची हो। यही वजह है कि सत्ता गंवाने के बाद भी ममता बनर्जी बंगाल की राजनीति के केंद्र में बनी हुई हैं। क्योंकि न उनके तेवर बदले हैं। न उनकी भाषा बदली है और न ही उनका संघर्ष खत्म हुआ है। कल तक जिन सरकारी फाइलों पर उनके दस्तखत चलते थे आज वह सड़कों पर खड़ी होकर उसी सरकार से सवाल पूछ रही हैं जो कभी विपक्ष में बैठकर उनसे सवाल पूछती थी। और शायद यही भाजपा की सबसे बड़ी राजनीतिक परेशानी है। क्योंकि चुनाव में किसी दल को हराना आसान होता है लेकिन उसकी राजनीतिक प्रासंगिकता खत्म करना सबसे मुश्किल काम होता है। पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार बन चुकी है लेकिन ममता अभी भी मुद्दा बनी हुई हैं। भाजपा सत्ता में है लेकिन ममता अभी भी सुर्खियों में हैं। भाजपा के पास प्रशासन है लेकिन ममता के पास अभी भी आंदोलन की राजनीति का अनुभव है। यही वजह है कि बंगाल की लड़ाई अब सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं रह गई है। यह उस राजनीतिक विरासत की लड़ाई बन गई है जिसमें एक पक्ष कहना चाहता है कि युग बदल चुका है जबकि दूसरा पक्ष हर दिन यह साबित करने की कोशिश कर रहा है कि कहानी अभी खत्म नहीं हुई। और यहीं सबसे बड़ा सवाल जन्म लेता है कि अगर टीएमसी वाकई खत्म हो चुकी है तो फिर उसके नेताओं पर गुस्सा इतना ज्यादा क्यों दिखाई दे रहा है? अगर ममता का अध्याय बंद हो चुका है तो फिर उनका नाम आज भी बंगाल की राजनीति में सबसे ज्यादा चर्चा क्यों पैदा करता है? क्योंकि राजनीति में सबसे खतरनाक नेता वह नहीं होता जो सत्ता में बैठा हो सबसे खतरनाक वह होता है जो सत्ता से बाहर होकर भी सत्ता को बेचैन कर रहा हो।
बाहर निकलने से बचें टीएमसी नेता : दिलीप घोष
पश्चिम बंगाल में टीएमसी नेताओं पर हुए कथित हमलों को लेकर सियासत गरमा गई है। राज्य सरकार में मंत्री दिलीप घोष ने टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी और अभिषेक बनर्जी पर हुए हमलों को लेकर विपक्ष के आरोपों पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि टीएमसी नेताओं के प्रति जनता में नाराजगी है और पार्टी के नेताओं को कुछ दिन बाहर नहीं निकलना चाहिए। कल्याण बनर्जी पर हुए हमले को लेकर दिलीप घोष ने कहा कि वह हमेशा ड्रामा करते रहते हैं। संसद में भी वे ड्रामा करते हैं। इतने वरिष्ठ नेता, वकील और सांसद हैं, लेकिन उनके व्यवहार को लेकर हमेशा शिकायतें प्राप्त होती रही हैं। उनकी ही पार्टी की महिला नेता उन पर आरोप लगा रही हैं। उनकी शिकायत लोकसभा स्पीकर से भी की जा चुकी है। उन्होंने कहा कि उनके प्रति जनता में आक्रोश है। इसका ध्यान रखते हुए उन्हें फिलहाल बाहर नहीं जाना चाहिए। यह उनकी सुरक्षा के लिए है। इस तरह का ड्रामा उन्हें शोभा नहीं देता। वह अपने सिर को रगड़ रहे थे, लेकिन इसके बाद भी खून नहीं निकाल पाए।
सिब्बल पर भी भड़के बीजेपी नेता
सांसदों पर हुए हमले पर कपिल सिब्बल की प्रतिक्रिया पर उन्होंने कहा कि मैं कपिल सिब्बल से कहता हूं कि आइए, पश्चिम बंगाल। रास्ते के किनारे कहीं बैठकर चाय पीजिए। देखिए, बंगाल के लोग किस तरह आपका स्वागत करते हैं। इन लोगों का समर्थन मत कीजिए। उन्होंने कहा कि क्या वह कभी चाय की दुकान पर बैठे हैं? या गांधी परिवार के पीछे घूमते-घूमते ही जिंदगी बिता देंगे। सांसदों पर हुए हमले पर मदन मित्रा ने कहा कि इसको लेकर पूरे देश में प्रदर्शन होना चाहिए। इस पर दिलीप घोष ने कहा कि मैं मदन मित्रा से कहना चाहता हूं कि अपना भविष्य देखिए। कल्याण बनर्जी की तरफदारी मत करिए। आप वरिष्ठ नेता हैं। जिस तरीके से आप बात कर रहे हैं, कहीं इससे खराब स्थिति आपके साथ न हो जाए। जनता बहुत गुस्से में है, सावधानी से बातचीत कीजिए। हमने आपकी सुरक्षा का ठेका नहीं ले रखा है। टीएमसी के प्रदर्शन पर उन्होंने कहा कि टीएमसी वालों को मान लेना चाहिए कि उनके लिए अभी लॉकडाउन चल रहा है। अभी बाहर निकलना मतलब संघर्ष को बुलावा देना है। घर से बाहर न निकलें, इसी में हित है।
बंगाल फिर उसी चौराहे पर खड़ा है
बंगाल की राजनीति एक बार फिर उसी मोड़ पर आकर खड़ी दिखाई दे रही है जहां इतिहास अक्सर खुद को दोहराता रहा है। चेहरे बदलते हैं, नारे बदलते हैं, झंडों के रंग बदलते हैं, लेकिन सत्ता और विपक्ष के बीच संघर्ष की कहानी लगभग वैसी ही बनी रहती है। कभी कांग्रेस ने लेफ्ट पर लोकतंत्र को कुचलने का आरोप लगाया था। फिर लेफ्ट ने टीएमसी पर वही सवाल उठाए। बाद में भाजपा ने ममता सरकार को कठघरे में खड़ा किया। और अब टीएमसी भाजपा सरकार पर लगभग वही आरोप लगा रही है। यही वजह है कि बंगाल की राजनीति को लेकर सबसे बड़ा सवाल किसी एक दल की जीत या हार का नहीं बल्कि राजनीतिक संस्कृति के भविष्य का बन गया है। क्या बंगाल आखिरकार उस दौर से बाहर निकल पाएगा जहां राजनीतिक विरोध को राजनीतिक दुश्मनी समझ लिया जाता है? क्या नई सरकार यह साबित कर पाएगी कि सत्ता परिवर्तन सिर्फ कुर्सी बदलने का नाम नहीं, बल्कि व्यवस्था और राजनीतिक व्यवहार बदलने का भी नाम होता है? क्योंकि लोकतंत्र की असली परीक्षा चुनाव जीतने में नहीं होती। चुनाव तो हर पांच साल में होते हैं। असली परीक्षा उसके बाद शुरू होती है जब यह तय होता है कि सत्ता विपक्ष को प्रतिद्वंद्वी मानती है या दुश्मन। जब यह तय होता है कि आलोचना को अधिकार माना जाएगा या अपराध।




