धरती तप रही है, लेकिन इंसान नहीं सुधर रहा; उत्सर्जन ने बनाया नया रिकॉर्ड

नई स्टडी में यह बात कही गई है कि 2025 में औसत वैश्विक तापमान 1850-1900 के बेसलाइन औसत से करीब 1.39 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज की गई है.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: नई स्टडी में यह बात कही गई है कि 2025 में औसत वैश्विक तापमान 1850-1900 के बेसलाइन औसत से करीब 1.39 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज की गई है.

इस कुल बढ़ोतरी में से अकेले 1.37 डिग्री सेल्सियस इंसानी गतिविधियों का योगदान रहा था, जबकि शेष हिस्सा प्राकृतिक बदलावों का नतीजा हो सकता है.

जलवायु परिवर्तन दुनिया की सबसे बड़ी समस्या बनती जा रही है. लेकिन कई देशों के बीच जंग और संघर्ष की वजह से इस समस्या पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जा रहा है. खासतौर से राजनीतिक ध्यान कम होता दिख रहा है. धरती लगातार गर्म होती जा रही है. एक आकलन के यह बात सामने आई है कि रिकॉर्ड पर साल 2025 तीसरा सबसे गर्म साल था.

खास बात यह है कि ‘इंडिकेटर्स ऑफ ग्लोबल क्लाइमेट चेंज’ (IGCC) नाम की इस सालाना अध्ययन में यह बात सामने आई है कि 2025 में पड़ी गर्मी में इंसानी गतिविधियों का योगदान शायद अब तक का सबसे अधिक था.

IGCC स्टडी, जो पहली बार 2023 में प्रकाशित हुई थी, इस पर जलवायु वैज्ञानिकों का एक स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय समूह का काम करता है. इस समूह में ‘इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज’ (IPCC) में योगदान देने वाले कई वैज्ञानिक शामिल हैं. IPCC जलवायु परिवर्तन के हालात को लेकर समय-समय पर रिपोर्ट तैयार करता है, और इसकी रिपोर्ट सबसे अधिक विश्वसनीय मानी जाती है.

साल 2025 तीसरा सबसे गर्म साल

लेटेस्ट IGCC की स्टडी में यह बात कही गई है 2025 में औसत वैश्विक तापमान 1850-1900 के बेसलाइन औसत से करीब 1.39 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज की गई है. इस कुल बढ़ोतरी में से, 1.37 डिग्री सेल्सियस इंसानी गतिविधियों (खासतौर से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन) का योगदान रहा था, जबकि शेष हिस्सा जलवायु प्रणालियों में प्राकृतिक बदलावों का नतीजा हो सकता है.

अर्थ सिस्टम साइंस डेटा’ नाम के पीयर-रिव्यू वाले ओपन एक्सेस जर्नल में प्रकाशित IGCC स्टडी, वर्ल्ड मेट्रोलॉजिकल ऑर्गेनाइजेशन (WMO) के पहले के अनुमानों की ही पुष्टि करती है. WMO ने इस साल जनवरी में कहा था कि 2024 और 2023 के बाद 2025 के तीसरा सबसे गर्म साल बनने की संभावना है. साथ ही 2025 में औसत वैश्विक तापमान के 1850-1900 के बेसलाइन से 1.44 डिग्री सेल्सियस ऊपर तक जाने की संभावना है.

सबसे अधिक गर्म साल रहा 2024

साल 2024 अब तक का सबसे गर्म साल साबित हुआ. यह साल 1850-1900 के बेसलाइन से करीब 1.55 डिग्री सेल्सियस अधिक गर्म था. 2024 में आई IGCC स्टडी के अनुसार, उस साल इंसानी गतिविधियों का योगदान करीब 1.36 डिग्री सेल्सियस था, जबकि शेष बदलाव प्राकृतिक वजहों से हुआ. इसी तरह साल 2023, करीब 1.45 डिग्री सेल्सियस अधिक गर्म हुआ था. तब इंसानी योगदान करीब 1.31 डिग्री सेल्सियस आंका गया था.

अब 2025 की ग्लोबल वार्मिंग में इंसानी गतिविधियों का योगदान शायद अब तक का सबसे ज्यादा आंका गया है, लेकिन मौसम में प्राकृतिक बदलाव हर साल अलग-अलग होते रहे हैं. पिछला साल ‘ला नीना’ (La Nina) वाला साल रहा था, और दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट के पास इक्वेटोरियल पैसिफिक ओशन सामान्य से कहीं ज्यादा ठंडा था.

‘ला नीना’ से धरती रही थोड़ी ठंडी

माना जाता है कि ‘ला नीना’ का धरती पर आम तौर पर ठंडा करने वाला असर होता है. शायद यही वजह हो सकती है कि इंसानों की वजह से होने वाली वार्मिंग का योगदान रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने के बावजूद, यह साल 2024 और 2023 के मुकाबले थोड़ा ठंडा ही रहा.

IGCC की लेटेस्ट स्टडी में कहा गया कि ग्रीनहाउस गैसों के रिकॉर्ड उत्सर्जन के कारण इंसानों की वजह से होने वाली गर्मी हर दशक में करीब 0.27 डिग्री सेल्सियस की दर से बढ़ रही है. साल 2025 में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन 56.8 बिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर पहुंच गया, जो अब तक का सबसे ज्यादा स्तर है.

इसमें यह भी कहा गया कि अगर दुनिया 1850-1900 के बेसलाइन से तापमान में बढ़ोतरी को 1.5 डिग्री सेल्सियस के अंदर सीमित रखना चाहती है, तो उसे 2026 की शुरुआत से 130 बिलियन टन से अधिक अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन नहीं करना होगा.

जर्मनी में क्लाइमेट को लेकर मंथन

IGCC की स्टडी ऐसे हफ्ते में जारी की जा रही है जब दुनिया के ज्यादातर देश सालाना मिड-ईयर क्लाइमेट बातचीत के लिए जर्मनी के बॉन में जुट रहे हैं. बातचीत मुख्य रूप से क्लाइमेट एक्शन की महत्वाकांक्षा को बढ़ाने के तरीकों पर केंद्रित है, क्योंकि पिछले साल 2015 के पेरिस समझौते से अमेरिका के हटने से इस मुहिम को बड़ा झटका लगा था. खास बात यह है कि ग्लोबल क्लाइमेट एक्शन भविष्य में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में भारी कटौती की जरूरत के साथ तालमेल नहीं बिठा सका है.

इस स्टडी के नतीजे तेज़ी से बढ़ते ग्लोबल टेम्परेचर की एक और याद दिलाते हैं. पिछले ही महीने, WMO की एक स्टडी में कहा गया था कि 91 प्रतिशत संभावना इस बात की है कि 2026 और 2030 के बीच अगले 5 सालों में से कम से कम एक साल 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा को पार कर जाएगा, ठीक वैसे ही जैसे 2024 में हुआ था. इसमें यह भी कहा गया है कि इस 5 साल की अवधि में औसत तापमान के 1850-1900 के बेसलाइन लेवल से 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक होने की संभावना 75% है.

2026 में हैवी अल नीनो का खतरा

जबकि इस साल इक्वेटोरियल पैसिफिक ओशन में एक हैवी अल नीनो बनने का अनुमान जताया जा रहा है. अल नीनो का असर ला नीना के ठीक उल्टा होता है और आम तौर पर इससे धरती का तापमान काफी बढ़ जाता है. उम्मीद है कि इस साल का अल नीनो न सिर्फ साल के आखिर तक बना रहेगा, बल्कि हो सकता है कि अगले साल की शुरुआत तक भी बना रहे.

इस बीच जर्मनी के बॉन में चल रही क्लाइमेट मीटिंग में एक ग्लोबल कमिटमेंट का प्रस्ताव रखा गया है ताकि यह तय किया जा सके कि 2035 तक कुल एनर्जी खपत में बिजली का हिस्सा कम से कम 35% हो. अभी ग्लोबल एनर्जी खपत में बिजली का योगदान 20% है. यह फॉसिल फ्यूल से दूसरी तरह की एनर्जी की ओर बढ़ने की दिशा में एक अहम कदम है.

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