मोदी के गुजरात मॉडल की खुली पोल, 4,000 लोग गड्ढे का पानी पीने को मजबूर

दाहोद के खरवानी गांव में आज भी 4,000 से अधिक लोग साफ पीने के पानी से वंचित हैं... ग्रामीणों को गड्ढों से पानी निकालकर...

4पीएम न्यूज नेटवर्कः गुजरात को विकास का मॉडल बताया जाता है.. बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं.. हर घर नल से जल.. सबका विकास, आधुनिक बुनियादी ढांचा और समृद्धि.. लेकिन दाहोद जिले के खरवानी गांव में हकीकत कुछ.. और है.. यहां 4,000 से ज्यादा लोग आज भी गंदे गड्ढे के पानी को पीने पर मजबूर हैं.. जानवर भी उसी पानी को पीते हैं.. साफ पानी के लिए तरस रहे लोग सरकार की योजनाओं.. और 31 साल से चले आ रहे भाजपा शासन की सच्चाई पर सवाल उठा रहे हैं.. वहीं यह मामला सिर्फ एक गांव की समस्या नहीं है.. बल्कि पूरे गुजरात मॉडल की उन कमियों को उजागर करता है.. जहां विज्ञापनों और दावों के पीछे आम आदमी की बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं हो पातीं..

आपको बता दें कि खरवानी गांव दाहोद जिले में स्थित एक आदिवासी बहुल इलाका है.. यहां की मिट्टी लाल है.. और पानी की समस्या सालों पुरानी है.. गांववाले बताते हैं कि बरसात के बाद गड्ढे खोदकर जो पानी निकलता है.. वही उनके लिए पीने, नहाने और खाना बनाने का साधन है.. इस पानी में गंदगी, कीड़े और कई बार बैक्टीरिया भी होते हैं.. इससे बच्चे बार-बार बीमार पड़ते हैं.. पेट की बीमारियां फैलती हैं और महिलाओं को सबसे ज्यादा परेशानी होती है..

केंद्र और राज्य सरकार हर घर नल से जल योजना के तहत बड़े-बड़े दावे करती हैं.. लाखों घरों में नल कनेक्शन दिए गए.. पाइपलाइन बिछाई गई। लेकिन खरवानी जैसे गांवों में ये योजनाएं सिर्फ कागजों पर सिमटकर रह गई हैं.. गांववाले कहते हैं कि नल तो आए.. लेकिन उनमें पानी नहीं आता.. या फिर बहुत कम और गंदा पानी आता है.. 31 साल से भाजपा के शासन में भी यह स्थिति नहीं बदली.. लोग पूछते हैं कि विकास का मॉडल तो अमीरों और शहरों के लिए है.. गांवों और गरीबों के लिए क्यों नहीं..

दाहोद जिला आदिवासी क्षेत्र है.. यहां पानी की कमी, सूखा और भूजल स्तर का नीचे जाना आम समस्या है.. खरवानी गांव के लोग सुबह उठकर गड्ढे पर जाते हैं.. महिलाएं और बच्चे बाल्टी और घड़े लेकर पानी भरते हैं.. इस पानी को कपड़े से छानकर पीते हैं.. कई बार बारिश न होने पर गड्ढा सूख जाता है.. तो दूर-दूर से पानी लाना पड़ता है.. जानवर भी इसी पानी पर निर्भर हैं.. जिससे बीमारियां फैलती हैं..

खरवानी के किसान बताते हैं कि हमारी फसल तो सूख जाती है.. लेकिन पानी का कोई सहारा नहीं है.. गड्ढे का पानी पीकर बच्चे दस्त और उल्टी से परेशान रहते हैं.. अस्पताल जाने में भी खर्चा होता है.. महिलाएं सुबह से शाम तक पानी की चिंता में रहती हैं.. स्कूल जाने वाले बच्चे स्वस्थ पानी न मिलने से बीमार रहते हैं.. जिससे उनकी पढ़ाई प्रभावित होती है.. स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं कि ऐसे गंदे पानी से टाइफाइड, हेपेटाइटिस और डायरिया जैसी बीमारियां फैलती हैं.. खासकर छोटे बच्चों और बुजुर्गों के लिए यह जानलेवा हो सकता है.. गांव में कोई पानी शुद्धिकरण प्लांट नहीं है.. सरकारी टैंकर कभी-कभी आते हैं.. लेकिन नियमित रूप से नहीं..

भाजपा शासन के 31 सालों में गुजरात को औद्योगिक विकास, सड़कें, बिजली.. और शहरों की तस्वीर के रूप में दिखाया जाता है.. लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों, खासकर आदिवासी इलाकों में बुनियादी सुविधाएं अभी भी कमजोर हैं.. दाहोद जैसे जिलों में पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार की कमी बनी हुई है.. गुजरात मॉडल के नाम पर बड़े-बड़े विज्ञापन और प्रचार होते हैं.. लेकिन जमीन पर हकीकत अलग है.. सरकार का कहना है कि लाखों नल कनेक्शन दिए गए.. लेकिन खरवानी जैसे गांवों में पाइपलाइन बिछाने, रखरखाव.. और नियमित जलापूर्ति की अनदेखी हुई है.. भूजल स्तर गिरने, सूखे और अनियमित बारिश के बावजूद लंबे समय से कोई ठोस समाधान नहीं निकाला गया..

 

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