जगन्नाथपुरी से मिर्जापुर तक 18 दिन का सफर, ऊंट के साथ लौटे मेहनत की मिसाल बने युवक

प्रयागराज के मेजा निवासी दो ऊंट संचालक जगन्नाथपुरी में चार महीने तक पर्यटकों को ऊंट की सवारी कराकर रोजगार कमाने के बाद 950 किलोमीटर की पैदल यात्रा कर मिर्जापुर के लालगंज पहुंचे। उनकी मेहनत और आत्मनिर्भरता की कहानी लोगों के लिए प्रेरणा बन रही है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: सफलता की कहानियां हमेशा बड़े शहरों और बड़ी कंपनियों से नहीं निकलतीं। कई बार गांव की पगडंडियों से निकलकर ऐसे लोग भी मिसाल बन जाते हैं, जो सीमित संसाधनों के बावजूद मेहनत और आत्मविश्वास के दम पर अपने परिवार का भविष्य संवार रहे होते हैं। ऐसी ही एक प्रेरणादायक कहानी प्रयागराज के मेजा क्षेत्र के दो ऊंट संचालकों की है, जिन्होंने रोजगार की तलाश में सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय किया और अब चार महीने की मेहनत के बाद अपने घर लौट रहे हैं।

शनिवार को जब दोनों ऊंट संचालक अपने सजे-धजे ऊंट के साथ मिर्जापुर के लालगंज पहुंचे तो उन्हें देखने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक हर कोई इस अनोखे सफर को जानने के लिए उत्सुक नजर आया।

चार महीने जगन्नाथपुरी में किया काम

प्रयागराज के मेजा निवासी राजेंद्र और लाल बहादुर ने बताया कि वे लगभग चार माह पहले अपने ऊंट के साथ ओडिशा के प्रसिद्ध धार्मिक और पर्यटन स्थल जगन्नाथपुरी पहुंचे थे। वहां समुद्र तट पर आने वाले पर्यटकों, खासकर बच्चों को ऊंट की सवारी कराकर वे अपनी आजीविका चलाते हैं। पर्यटन सीजन के दौरान उन्हें अच्छी आमदनी हो जाती है, जिससे परिवार का खर्च, बच्चों की पढ़ाई और अन्य जरूरी आवश्यकताएं पूरी हो जाती हैं।

ऊंट सवारी से चल रहा परिवार का खर्च

राजेंद्र बताते हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर सीमित हैं। ऐसे में वे हर साल किसी न किसी प्रमुख पर्यटन स्थल का रुख करते हैं, जहां ऊंट सवारी के माध्यम से आय अर्जित कर सकें। उनका कहना है कि यह सिर्फ एक रोजगार नहीं बल्कि परिवार के बेहतर भविष्य की उम्मीद भी है। चार महीने तक घर से दूर रहकर की गई मेहनत उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाती है और परिवार को नई संभावनाएं देती है।

18 दिन में तय किया करीब 950 किलोमीटर का सफर

जगन्नाथपुरी से वापस लौटते समय दोनों संचालकों ने ऊंट के साथ करीब 930 से 950 किलोमीटर की दूरी पैदल तय की है। इस लंबी यात्रा को पूरा करने में उन्हें लगभग 18 दिन लगे।

उन्होंने बताया कि रास्ते में कई स्थानों पर रुककर ऊंटों के लिए भोजन और पानी की व्यवस्था करनी पड़ती है। साथ ही मौसम और सड़क की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए यात्रा की गति निर्धारित की जाती है।

लालगंज में लोगों की उमड़ी भीड़

शनिवार को जब दोनों संचालक लालगंज पहुंचे तो ऊंट को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग जमा हो गए। बच्चों में विशेष उत्साह देखने को मिला। कई लोगों ने ऊंट के साथ तस्वीरें खिंचवाईं और उनके सफर के बारे में जानकारी ली। स्थानीय लोगों ने भी उनकी मेहनत और संघर्ष की सराहना की।

अब खेती-बाड़ी में जुटेंगे

राजेंद्र और लाल बहादुर ने बताया कि अब वे अपने गांव लौटकर खेती-किसानी के कार्यों में जुटेंगे। फसल का सीजन पूरा होने के बाद फिर किसी प्रमुख पर्यटन स्थल पर जाकर रोजगार की तलाश करेंगे। उनकी यह यात्रा न केवल स्वरोजगार की मिसाल है, बल्कि यह भी बताती है कि मेहनत, धैर्य और आत्मनिर्भरता के बल पर सीमित संसाधनों में भी बेहतर जीवन की राह बनाई जा सकती है।

ग्रामीण युवाओं के लिए प्रेरणा

आज जब रोजगार को लेकर चुनौतियां बढ़ रही हैं, ऐसे में राजेंद्र और लाल बहादुर जैसे लोग यह संदेश देते हैं कि मेहनत और नवाचार के जरिए आजीविका के नए रास्ते खोजे जा सकते हैं। उनकी कहानी ग्रामीण युवाओं के लिए प्रेरणा बनकर उभर रही है, जो आत्मनिर्भर भारत की भावना को भी मजबूत करती है।

रिपोर्ट : संतोष देव गिरी

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