भाई को बचाने कूदी बहन, फिर भांजा भी उतरा नदी में… तीन मासूमों की मौत से रो पड़ा गांव
बांदा के गौरी कलां गांव में सोमवती अमावस्या के दिन चंद्रावल नदी में डूब रहे भाई को बचाने के लिए बहन और फिर भांजा नदी में कूद गए। तेज बहाव में तीनों बच्चों की दर्दनाक मौत हो गई। इस हादसे से पूरे गांव में शोक की लहर दौड़ गई है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: सोमवती अमावस्या का दिन श्रद्धा, पूजा और आस्था का प्रतीक माना जाता है। लेकिन बांदा जिले के जसपुरा क्षेत्र में यही दिन एक परिवार के लिए ऐसी त्रासदी बन गया, जिसकी टीस शायद कभी कम न हो सके। चंद्रावल नदी में डूब रहे छोटे भाई को बचाने के लिए एक किशोरी ने अपनी जान की परवाह किए बिना छलांग लगा दी। बहन को संघर्ष करता देख भांजा भी मदद के लिए पानी में उतर गया। लेकिन नदी की गहराई और तेज बहाव ने तीनों मासूम जिंदगियों को हमेशा के लिए अपने आगोश में समा लिया।
यह हृदय विदारक घटना सोमवार सुबह जसपुरा थाना क्षेत्र के गौरी कलां गांव स्थित सिद्धबाबा मंदिर के पास हुई, जिसने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया।
दर्शन-पूजन के लिए पहुंचे थे बच्चे
जानकारी के अनुसार गौरी कलां गांव निवासी रमाशंकर विश्वकर्मा के बेटे अंश (10), बेटी माधुरी (14), बड़े बेटे सिद्धार्थ तथा रिश्ते में भांजे प्रतीक (12) सिद्धबाबा मंदिर में दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचे थे। परिवार के लोगों को अंदाजा भी नहीं था कि धार्मिक आस्था के साथ शुरू हुआ दिन कुछ ही घंटों में जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी में बदल जाएगा।
भाई को बचाने के लिए बहन ने लगाई छलांग
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक पूजा से पहले चारों बच्चे नदी में स्नान कर रहे थे। इसी दौरान 10 वर्षीय अंश का पैर फिसल गया और वह गहरे पानी में चला गया। अपने छोटे भाई को डूबता देख 14 वर्षीय माधुरी ने बिना देर किए नदी में छलांग लगा दी। वह लगातार भाई को बचाने का प्रयास करती रही, लेकिन नदी की तेज धारा और गहराई दोनों पर भारी पड़ गई।
मदद के लिए उतरा भांजा भी नहीं बच सका
बहन और भाई को संघर्ष करते देख 12 वर्षीय प्रतीक भी उन्हें बचाने के लिए नदी में कूद पड़ा। लेकिन दुर्भाग्यवश वह भी तेज बहाव में फंस गया। कुछ ही पलों में तीनों बच्चे पानी में समा गए। यह पूरा दृश्य बड़े भाई सिद्धार्थ की आंखों के सामने घटित हुआ।
बेबस खड़ा रहा बड़ा भाई
सिद्धार्थ मदद के लिए चीखता-चिल्लाता रहा। उसकी आवाज सुनकर ग्रामीण मौके पर पहुंचे, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। ग्रामीणों और स्थानीय गोताखोरों ने करीब दो घंटे तक नदी में सर्च अभियान चलाया। काफी मशक्कत के बाद तीनों बच्चों को बाहर निकाला गया।
अस्पताल पहुंचने से पहले टूट गई उम्मीद
तीनों बच्चों को तत्काल सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र जसपुरा ले जाया गया। परिजनों को उम्मीद थी कि शायद उनके बच्चे बच जाएं, लेकिन चिकित्सकों ने जांच के बाद तीनों को मृत घोषित कर दिया। जैसे ही यह खबर परिजनों तक पहुंची, अस्पताल परिसर में चीख-पुकार और मातम का माहौल बन गया।
एक साथ उठीं तीन अर्थियां
मृत बच्चों की मां सुनैना अपने बेटे और बेटी के शवों से लिपटकर बार-बार बेसुध होती रहीं। पिता रमाशंकर विश्वकर्मा की आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। वहीं प्रतीक की मां स्नेहा अपने बेटे को खोने के गम में बदहवास नजर आईं। परिवार और गांव के लोगों के लिए यह क्षति असहनीय बन गई। शाम को पोस्टमार्टम के बाद जब गांव से तीन अर्थियां एक साथ निकलीं तो पूरा गौरी कलां गांव गम में डूब गया। हर आंख नम थी और हर व्यक्ति इस दर्दनाक घटना को याद कर भावुक हो रहा था।
पूरे इलाके को झकझोर गया हादसा
स्थानीय लोगों का कहना है कि भाई को बचाने के लिए बहन की बहादुरी और उनकी मदद के लिए कूदे भांजे का साहस हमेशा याद रखा जाएगा। हालांकि इस साहसिक प्रयास का अंत बेहद दुखद रहा। सोमवती अमावस्या के दिन हुई यह घटना केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए ऐसा घाव बन गई है जिसे भरने में लंबा समय लगेगा।
रिपोर्ट : इकबाल खान, बांदा
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