कोटा का कुरुक्षेत्र : राहुल गांधी की गूंज

- रेल के डिब्बे से कोचिंग के जंगल तक आखिर कोटा ही क्यों चुना राहुल ने?
- जेन जी की बेचैनी नीट का जख्म और शिक्षा व्यवस्था पर अबतक का सबसे बड़ा राजनीतिक व तीखा प्रहार
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। राहुल गांधी ने राजस्थान के कोटा से जेन जी की नब्ज पकड़ते हुए एक बड़े बदलाव को लाने की मुहिम छेड़ दी है। कोटा में रेल का सफर पूर कर छात्रों से सवांद करने पहुंचे राहुल ने कहा है कि देश का एजूकेशन सिस्टम छात्रों के साथ न्याय नहीं कर रहा है। उन्होंने नीट एग्जाम पेपर लीक मामले में छात्रों के सुसाइड नोट पढ़ते हुए महौल को गंभीर बना दिया। राहुल गांधी ने राजस्थान के कोटा में जब स्टेज पर एंट्री ली तो माहौल किसी इंटरनेशनल पॉप सिंगर के कंसर्ट जैसा लग रहा था। लाइट्स, कैमरा, मोबाइल के फ्लैशेस और लाखों स्टूडेंट के जमावड़े की गूंज। कोटा में नीट और यूपीएससी की तैयारी कर रहे जेन जी राहुल को सुनने के लिए बेताब थे। राहुल गांधी के कन्सर्ट बता रहा था कि वह देश के एजुकेशन सिस्टम में बदलाव चाहते है।
कोटा से गूंज क्या बदल पाएगी एजूकेशन सिस्टम
देश की राजनीति में ऐसे बहुत कम मौके आते हैं जब कोई नेता चुनावी मंच छोड़कर सीधे उस पीढ़ी के बीच पहुंचता है जो वोटर कम और भविष्य ज्यादा है। राजस्थान के कोटा में राहुल गांधी की मौजूदगी सिर्फ एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं थी बल्कि उस व्यवस्था पर सीधा हमला था जिसने लाखों युवाओं को सफलता और असफलता के बीच एक ऐसे गलियारे में खड़ा कर दिया है जहां उम्मीद और अवसाद साथ-साथ चल रहे हैं। राहुल गांधी कोटा पहुंचे तो सीन किसी राजनीतिक सभा जैसा नहीं लग रहा था। वहां मौजूद छात्रों का जोश मोबाइल फ्लैश की चमक और लगातार गूंजते नारे ने साफ संकेत दे रहे थे कि यह भीड़ किसी नेता को देखने नहीं बल्कि अपने सवालों का जवाब सुनने पहुंची है। राहुल गांधी ने भी माहौल की नब्ज पकड़ ली। उन्होंने भाषण को राजनीतिक आरोप प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रखा बल्कि सीधे शिक्षा व्यवस्था परीक्षा प्रणाली और छात्रों की मानसिक स्थिति पर बात की। नीट पेपर लीक का मुद्दा उठाते हुए राहुल गांधी ने उन छात्रों के सुसाइड नोट का जिक्र किया जिनकी जिंदगी परीक्षा प्रणाली की खामियों के बीच पिस गई। यह भावनात्मक क्षण था लेकिन उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण था वह राजनीतिक संदेश जो इसके पीछे छिपा था। राहुल यह बताने की कोशिश कर रहे थे कि देश की सबसे बड़ी आबादी युवा वर्ग आज अवसरों की कमी परीक्षा घोटालों और असुरक्षित भविष्य से जूझ रहा है।
कोटा को चुनना कोई संयोग नहीं
कोटा को चुनना भी कोई संयोग नहीं था। भारत में यदि शिक्षा व्यवस्था का कोई प्रतीकात्मक शहर है तो वह कोटा है। यहां हर साल लाखों छात्र डॉक्टर, इंजीनियर और प्रशासनिक अधिकारी बनने का सपना लेकर आते हैं। लेकिन यही शहर सफलता के साथ-साथ तनाव अवसाद और आत्महत्या की खबरों के लिए भी चर्चा में रहता है। यह भारत की प्रतियोगी परीक्षा संस्कृति का सबसे बड़ा प्रयोगशाला बन चुका है। राहुल गांधी ने इस मंच से एक ऐसा सवाल उठाया जो वर्षों से छात्रों के मन में घूम रहा है कि क्या शिक्षा व्यवस्था छात्रों को अवसर दे रही है या उन्हें एक अंतहीन दौड़ का हिस्सा बना रही है? यह सवाल केवल नीट या जेईई तक सीमित नहीं है। यह पूरे उस ढांचे पर प्रश्नचिन्ह है जिसमें लाखों छात्र कुछ हजार सीटों के लिए अपना बचपन मानसिक शांति और कई बार जीवन तक दांव पर लगा देते हैं। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी इस असंतोष को राजनीतिक आंदोलन में बदल पाएंगे? क्या शिक्षा सुधार उनके एजेंडे का स्थायी हिस्सा बनेगा या यह भी बाकी राजनीतिक नारों की तरह कुछ दिनों में खो जाएगा? कोटा से उठी यह आवाज फिलहाल देशभर के छात्रों तक पहुंच चुकी है। अब देखना यह है कि यह आवाज बदलाव की दस्तक बनती है या सिर्फ एक और राजनीतिक प्रतिध्वनि साबित होती है।
क्या शिक्षा सुधार राजनीतिक मुद्दा बन सकता है?
भारतीय राजनीति में जाति धर्म क्षेत्र और कल्याणकारी योजनाएं लंबे समय से चुनावी विमर्श का केंद्र रही हैं। लेकिन पहली बार ऐसा दिखाई दे रहा है कि शिक्षा और परीक्षा प्रणाली भी राष्ट्रीय राजनीतिक बहस का हिस्सा बन रही है। पेपर लीक भर्ती घोटाले और बढ़ती बेरोजगारी ने युवाओं को सीधे प्रभावित किया है। यही कारण है कि राजनीतिक दल अब इस वर्ग को नजरअंदाज नहीं कर सकते। कोटा में राहुल गांधी की सभा केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं थी। यह उस पीढ़ी की बेचैनी का मंच था जो मेहनत तो कर रही है लेकिन व्यवस्था पर भरोसा खोती जा रही है। नीट पेपर लीक बढ़ती प्रतिस्पर्धा मानसिक तनाव और रोजगार की अनिश्चितता आज करोड़ों युवाओं की साझा चिंता है। राहुल गांधी ने इन सवालों को राष्ट्रीय मंच पर रखने की कोशिश कर रहे हैं। उनको इन कोशिशों से राजनीतिक लाभ मिलेगा या नहीं यह आने वाले वक्त पर छोड़ देते हैं लेकिन लेकिन उनकी इन कोशिशों को देखकर कह सकते हैं कि इतना तय है कि कोटा से उठी यह बहस अब सिर्फ कोटा तक सीमित नहीं रहेगी यह बहस भारत के भविष्य उसकी शिक्षा व्यवस्था और उस जेन जी की है जो अब केवल सुनना नहीं जवाब मांगना चाहती है।
जेन-जी को राहुल में क्या दिखायी दे रहा है?
आज की जेन जी परंपरागत राजनीति से प्रभावित नहीं होती। यह पीढ़ी रोजगार शिक्षा स्किल अवसर और पारदर्शिता की भाषा समझती है। राहुल गांधी पिछले कुछ वर्षों से लगातार युवाओं और छात्रों के मुद्दों पर मुखर रहे हैं। भारत जोड़ो यात्रा से लेकर विभिन्न विश्वविद्यालयों में संवाद तक उन्होंने युवाओं से सीधे संपर्क बनाने की कोशिश की है। कोटा कार्यक्रम उसी रणनीति का विस्तार दिखाई देता है। युवाओं का एक वर्ग राहुल गांधी को ऐसे नेता के रूप में देख रहा है जो कम से कम उनके मुद्दों पर बात कर रहा है। हालांकि यह समर्थन अभी भावनात्मक और मुद््दा आधारित है इसे स्थायी राजनीतिक समर्थन में बदलना अलग चुनौती होगी। कोटा की सफलता की कहानियां देशभर में सुनाई जाती हैं। लेकिन इस सफलता के पीछे एक दूसरा पक्ष भी है। महंगे हॉस्टल लगातार टेस्ट रैंकिंग का दबाव परिवार की उम्मीदें और असफलता का भय कई छात्रों को मानसिक तनाव की ओर धकेलता है।
शिक्षा व्यवस्था पर राहुल के बड़े सवाल
राहुल गांधी का कोटा में दिया भाषण मुख्यत तीन बिंदुओं पर केंद्रित रहा। परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि नीट पेपर लीक विवाद ने लाखों छात्रों के मन में यह सवाल पैदा किया कि क्या मेहनत का कोई मूल्य बचा है। जब परीक्षा की गोपनीयता ही संदेह के घेरे में हो तो छात्र का भरोसा टूटना स्वाभाविक है। राहुल गांधी ने इसी मुद्दे को केंद्र में रखकर कहा कि व्यवस्था छात्रों के साथ न्याय नहीं कर रही। उन्होने कहा कि सिस्टम में अवसरो की कमी है। भारत हर साल करोड़ों युवाओं को शिक्षा देता है लेकिन गुणवत्तापूर्ण नौकरियों की संख्या उस अनुपात में नहीं बढ़ रही। राहुल गांधी के मुताबिक मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी युवा वर्ग के भीतर बढ़ती बेचैनी का भी एक बड़ा कारण है। उन्होंने आत्महत्या की घटनाओं का उदहारण देते हुए कहा कि यह सिर्फ व्यक्तिगत असफलता की कहानी नहीं हैं बल्कि पूरे सामाजिक और शैक्षिक दबाव की तस्वीर हैं।




