बुलडोजर रुका तो जौहर की चौखट पर पहुंची ईडी

  • दिल्ली, सहारनुपर, रामपुर में एक साथ जौहर युनिवर्सिटी से जुड़े ठिकानों पर ईडी की रेड
  • यूपी में चुनावी शंखनाद के साथ ही ईडी एक्टिव विपक्ष का आरोप
  • आजम के किले में पैसों की पड़ताल, जौहर ट्रस्ट से ठेकों तक कथित धन के रास्ते की तलाश में दिल्ली, रामपुर और
  • सहारनपुर समेत 10 ठिकानों पर छापे

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ । उत्तर प्रदेश की सियासत में चुनावी बिगुल अभी औपचारिक रूप से भले न बजा हो लेकिन राजनीतिक मोर्चों पर बारूद की गंध साफ महसूस होने लगी है। 2027 विधानसभा चुनाव जैसे जैसे करीब आ रहे है वैसे-वैसे पुराने चेहरे पुराने किले और पुराने हिसाब फिर से राजनीति के केंद्र में लौटते दिखाई दे रहे हैं।
आज ईडी की रामपुर, दिल्ली और सहारनपुर समेत 10 ठिकानों पर हुई छापेमारी की कार्रवाई ने एक बार फिर उस नाम को सुर्खियों के सबसे ऊपर ला खड़ा कर दिया है जिसे लेकर उत्तर प्रदेश की राजनीति वर्षों से दो ध्रुवों में बंटी रही है। आजम खान और उनकी जौहर यूनिवर्सिटी। ईडी इसे कथित धनशोधन और सरकारी ठेकों से जुड़े वित्तीय लेनदेन की जांच बता रही है। समाजवादी पार्टी ने आज की कार्रवाई को चुनाव से पहले ईडी के एक्टिव होने की कार्रवाई बताया है और कहा है कि डर का महौल बनाने के लिए यह सब? किया जा रहा है। रामपुर में जौहर यूनिवर्सिटी सिर्फ एक युनिवर्सिटी नहीं रही। कभी यह आजम खान के राजनीतिक प्रभाव और महत्वाकांक्षा का प्रतीक बनी तो कभी जमीन और सरकारी संपत्तियों से जुड़े विवादों में घिरी कभी ट्रस्ट को मिले चंदे को लेकर सवालों के घेरे में आई और अब सरकारी ठेकों से जुड़े कथित धन के रास्ते की जांच ने इसे फिर सुर्खियों में ला दिया है। आज ईडी की टीमों ने जौहर ट्रस्ट और मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय से जुड़े दिल्ली, रामपुर और सहारनपुर समेत 10 ठिकानों पर एक साथ छापेमारी कर दी। मौजूदा छापे सरकारी ठेकों से जुड़े धन के कथित डायवर्जन और उसके इस्तेमाल पर केंद्रित है। ईडी यह पता लगाने कि कोशिश कर रही है कि सरकारी परियोजनाओं से जुड़े ठेकेदारों को भुगतान के बाद धन का प्रवाह किस तरह हुआ और क्या उसका कोई हिस्सा जौहर ट्रस्ट या विश्वविद्यालय की गतिविधियों में लगाया गया।

जमीन से शुरू हुई कहानी अब पैसों तक पहुंची जांच

आजम खान से जुड़े जौहर विश्वविद्यालय का विवाद नया नहीं है। वर्ष 2019 के बाद विश्वविद्यालय की जमीन, सरकारी संपत्तियों के इस्तेमाल और जमीन के कथित अधिग्रहण को लेकर कई मामले सामने आए। इन मामलों ने आजम खान और विश्वविद्यालय को लंबे समय तक राजनीतिक और कानूनी विवादों के केंद्र में रखा। लेकिन आज की कार्रवाई ने जांच का फोकस जमीन से आगे बढ़ाकर कथित वित्तीय लेनदेन तक पहुंचा दिया है। यानी कहानी अब सिर्फ यह नहीं है कि विश्वविद्यालय के लिए जमीन कैसे जुटाई गई। जांच एजेंसी अब यह भी देख रही है कि विश्वविद्यालय और ट्रस्ट की गतिविधियों में इस्तेमाल होने वाला पैसा कहां से आया और उसका स्रोत क्या था। खास तौर पर सरकारी ठेकों से जुड़े ठेकेदारों और ट्रस्ट के बीच कथित लेनदेन की कड़ी ईडी के लिए अहम है।

दस ठिकानों पर एक साथ कार्रवाई से बढ़ी हलचल

आज सुबह ईडी की अलग अलग टीमें दिल्ली, रामपुर और सहारनपुर में चिन्हित ठिकानों पर पहुंचीं। एक साथ 1० स्थानों पर हुई कार्रवाई के बाद रामपुर समेत पूरे उत्तर प्रदेश में राजनीतिक हलचल तेज हो गयी है। जौहर यूनिवर्सिटी और आजम खान से जुड़े पुराने विवादों को देखते हुए कार्रवाई को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी तेजी से सामने आ रही है। हालांकि ईडी की कार्रवाई के दौरान क्या-क्या दस्तावेज या डिजिटल साक्ष्य मिले हैं इसका पूरा ब्यौरा अभी सामने नहीं आया है। जांच एजेंसी तलाशी के बाद बरामद सामग्री का विश्लेषण करेगी। इसी के आधार पर आगे पूछताछ बयान दर्ज करने या अन्य कानूनी कार्रवाई की दिशा तय हो सकती है

बीजेपी पर ध्रुवीकरण का आरोप

सियासी गलियारों में एक और बहस बहुत तेजी से जोर पकड़ रही है। विपक्ष का आरोप है कि भाजपा आगामी विधानसभा चुनाव में ध्रुवीकरण की राजनीति को फिर हवा देना चाहती है और हिंदू-मुस्लिम विमर्श को चुनावी नैरेटिव के केंद्र में लाने की कोशिश कर रही है। भाजपा इन आरोपों को नकारते हुए विकास, कानून व्यवस्था और भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई को अपना एजेंडा बता रही है लेकिन राजनीतिक विश्लेषण की दृष्टि से देखें तो आजम खान का नाम अपने आप में इतना प्रभावशाली है कि उनके खिलाफ होने वाली हर बड़ी कानूनी कार्रवाई चुनावी बहस का हिस्सा बन जाती है। चाहे वह अदालत का फैसला हो प्रशासनिक नोटिस हो या फिर ईडी की छापेमारी।

चुनाव से पहले आजम नाम नहीं नैरेटिव बन गये

आज की सुबह रामपुर में सिर्फ ईडी की गाडिय़ों की चर्चा नहीं थी बल्कि उससे कहीं ज्यादा चर्चा इस बात की थी कि क्या 2027 की लड़ाई में आजम खान फिर एक बार चुनावी धुरी बनने जा रहे हैं? शिवपाल यादव के गृह मंत्री वाले बयान ने जिस राजनीतिक चिंगारी को हवा दी थी ईडी की कार्रवाई ने उसमें नया ईंधन डाल दिया है। अब सत्ता इसे वित्तीय जांच कह रही है विपक्ष इसे चुनावी दबाव का हिस्सा बता रहा है और जनता एक बार फिर उसी पुराने सवाल के सामने खड़ी है कि रामपुर की राजनीति में आखिर हर रास्ता घूम फिरकर जौहर और आजम तक ही क्यों पहुंच जाता है? जवाब जांच के दस्तावेजों में मिलेगा या चुनावी मैदान में यह आने वाला वक्त तय करेगा लेकिन इतना साफ है कि उत्तर प्रदेश की सियासत में अब चुनाव से पहले आजम सिर्फ एक नाम नहीं बल्कि पूरा नैरेटिव बन चुका है।

ठेकों से निकला कथित पैसा जौहर की चौखट तक कैसे पहुंचा?

ईडी के लखनऊ जोनल कार्यालय ने पीएमएलए की धारा 17 के तहत यह तलाशी अभियान चलाया। जांच एजेंसी के निशाने पर सरकारी ठेकों से जुड़े धन का कथित डायवर्जन और उसके बाद उस रकम के जौहर ट्रस्ट तथा विश्वविद्यालय की गतिविधियों में कथित इस्तेमाल की कड़ी है। एजेंसी की पड़ताल इस बात पर केंद्रित है कि सरकारी परियोजनाओं से जुड़े ठेकेदारों को भुगतान होने के बाद धन का प्रवाह किस दिशा में हुआ और क्या उसका कोई हिस्सा कथित तौर पर ट्रस्ट को दान अथवा विश्वविद्यालय के निर्माण कार्यों में लगाया गया। ईडी के मुताबिक कुछ निजी ठेकेदारों और जौहर ट्रस्ट के बीच हुए वित्तीय लेनदेन जांच के दायरे में हैं। ईडी यह पता लगाने में जुटी है कि इन लेनदेन का वास्तविक स्रोत क्या था रकम किन माध्यमों से ट्रस्ट तक पहुंची और इस पूरी प्रक्रिया से कौन लोग लाभान्वित हुए।

समाजवादी पार्टी पहले से कहती आ रही है

सपा व अन्य विपक्षी दल लंबे समय से आरोप लगाते रहे हैं कि चुनावों से पहले ईडी, सीबीआई और आयकर जैसी एजेंसियों की सक्रियता विपक्ष के मनोबल को तोडऩे और उसके नेताओं पर दबाव बनाने का माध्यम बन जाती है। विपक्ष का आरोप रहा है कि कार्रवाई केवल किसी व्यक्ति तक सीमित नहीं रहती बल्कि उसके राजनीतिक सामाजिक और संस्थागत नेटवर्क तक संदेश पहुंचाती है कि सत्ता से टकराने की कीमत चुकानी पड़ सकती है। हालांकि इन आरोपों को केंद्र सरकार लगातार खारिज करती रही है और उसका कहना है कि जांच एजेंसियां स्वतंत्र रूप से कानूनी साक्ष्यों के आधार पर काम करती हैं।

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