योगी जी देखिए आपके अफसर कैसे कैमरे के सामने ले रहे हैं लाखों की घूस !
आखिरकार फंस ही गया योगी सरकार में भ्रष्टाचार का गॉडफादर सतीश कुमार

यूपी आवास विकास सहकारिता विभाग में कार्यरत अधिकारी रिश्वत के रिमोट कंट्रोल से चला रहा विभाग
कैमरे में कैद बातचीतों ने खोली भ्रष्टाचार की परतें अब जवाब मांगेगी जनता
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। भ्रष्टाचार… यह शब्द सुनते ही आम आदमी के मन में किसी बाबू की मेज किसी फाइल का बोझ और किसी मजबूर नागरिक की बेबसी की तस्वीर उभर आती है। लेकिन अगर व्यवस्था के भीतर बैठा कोई अधिकारी खुद यह दावा करने लगे कि जांच किस दिशा में जाएगी शिकायत कौन करेगा किसे फंसाया जाएगा तो फिर इस स्स्टिम को भगवान ही बचा सकता है।
जी हां बिल्कुल सच योगी सरकार में उत्तर प्रदेश आवास विकास सहकारिता विभाग का अधिकारी सतीश कुमार 4PM के स्टिंग आपरेशन में फंस कर फंडफ़ड़ा रहा है। सतीश कुमार एक ऐसे अधिकारी का नाम है जो पैसों के बल पर सही को गलत और गलत को सही करने में माहिर है। यह भ्रष्टाचार का भस्मासुर है और यदि इन्होंने पैसों की डिमांड किसी से कर दी है तो फिर वह पूरी करनी ही होगी वर्ना यह व्यक्ति उस को, उसकी सोसाइटी को बर्बाद कर देगा। चलिए जानते हुए पूरा किस्सा कि क्या हुआ और यह कैसे फंंसा।
जब अफसर बिकने लगे
आज का जो खुलासा हमने आपके सामने रखा है वह सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। यह उन आरोपों की कहानी है जो सरकारी तंत्र के उस अंधेरे हिस्से की ओर इशारा करते हैं जहां नियम किताबों में रहते हैं और फैसले कथित तौर पर नोटों की गड्डियों पर लिखे जाते हैं। यह कहानी उन लोगों की है जो दावा करते हैं कि उन्होंने एक ऐसे तंत्र को करीब से देखा जहां शिकायतें पैदा की जाती हैं जांचें तैयार की जाती हैं और फिर कानून का चाबुक चुनिंदा लोगों पर चलाया जाता है। क्या गाजियाबाद की वेब सिटी में संचार नस्ट नाम की सोसाइटी को सील करने की कार्रवाई वास्तव में नियमों के तहत हुई थी या उसके पीछे कोई और वजह थी? क्या किसी अधिकारी के कथित प्रभाव से शिकायतों का निर्माण और जांचों का संचालन संभव है? क्या व्यवस्था में बैठे कुछ लोग अपनी कुर्सी को सार्वजनिक सेवा का माध्यम नहीं बल्कि निजी साम्राज्य का सिंहासन समझ बैठे हैं? इन सवालों का जन्म किसी अफवाह से नहीं हुआ। इनके पीछे हैं वह वीडियो वह बातचीतें और वह दावे जो अब सार्वजनिक बहस का विषय बन चुके हैं। कैमरे के सामने कैमरे से अनजान बातचीतों में जो बातें कही गयी वह बाते व्यवस्था की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर रही है।
खमोशी भी अपराध बन जाती है
हम स्पष्ट कर दें कि हमारा उद्देश्य किसी विभाग या संस्था को कटघरे में खड़ा करना नहीं है। हर विभाग में हजारों ईमानदार अधिकारी और कर्मचारी होते हैं जो व्यवस्था को चलाने के लिए दिन रात मेहनत करते हैं। लेकिन यदि कुछ लोगों के आचरण पर गंभीर आरोप लगते हैं तो उन आरोपों की जांच और सत्य सामने आना लोकतंत्र की आवश्यकता है। आज की यह रिपोर्ट किसी व्यक्ति के खिलाफ फैसला नहीं सुनाती। फैसला जांच एजेंसियों और न्यायालयों को करना है। लेकिन यह रिपोर्ट उन सवालों को जरूर उठाती है जिन्हें अब दबाया नहीं जा सकता। क्योंकि जब जनता के अधिकार कानून की गरिमा और सरकारी संस्थाओं की विश्वसनीयता दांव पर हो तब खामोशी भी एक अपराध बन जाती है।
सोसाइटी को सील किये जाने के बाद विवाद
विवाद की शुरुआत गाजियाबाद स्थित संचार नस्ट नाम की सोसाइटी को सील किया जाने के बाद हुई। समिति से जुड़े लोगों का आरोप है कि विभागीय स्तर पर उनसे 50 लाख रूपये और दो लाख रूपये प्रति माह की घूस की रकम मांगी गयी। मांग पूरी न होने के बाद कार्रवाई का रास्ता अपनाया गया। स्टिंग में रिकॉर्ड हुई बातचीतों में अधिकारी यह बताते हुए सुनाई दे रहे है कि शिकायतों और जांचों की प्रक्रिया को किस प्रकार प्रभावित किया जा सकता है। बातचीत में यह भी दावा किया गया कि यदि किसी समिति के खिलाफ कार्रवाई करानी हो तो उसके लिए शिकायतकर्ता की व्यवस्था की जा सकती है जांच बैठाई जा सकती है और परिस्थितियां ऐसी बनाई जा सकती हैं कि समिति प्रशासनिक संकट में फंस जाए। पूरी बातचीत के आधार पर यह केवल भ्रष्टाचार का मामला नहीं रहेगा बल्कि संस्थागत निष्पक्षता पर सीधा हमला माना जाएगा। क्योंकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जांच का उद्देश्य सत्य की खोज होता है किसी को निशाना बनाना नहीं। स्टिंग में शामिल लोगों ने एक काल्पनिक विवाद का उल्लेख करते हुए यह परखा कि संबंधित अधिकारी की प्रतिक्रिया क्या होती है। बातचीत के दौरान जो बातें सामने आईं उन्होंने कई नए प्रश्न खड़े कर दिए। आन कैमरा यह बताया गया कि शिकायत कैसे लिखी जाए उसमें क्या आरोप लगाए जाएं और जांच को किस दिशा में ले जाया जाए इन सबकी रूपरेखा स्वयं सतीश कुमार के द्वारा बताई जा रही थी।
गाजियाबाद की वेब सिटी से जुड़ा है मामला
दरअसल बात कुछ महीने पुरानी है गाजियाबाद की वेब सिटी में संचार नस्ट नाम की सोसाइटी को सील किया गया था तब नोटिस लगाने खुद सतीश कुमार नाम का यही अधिकारी गया था अब खुफिया कैमरे पर यही अधिकारी कबूल कर रहा है कि संचार न सहकारी आवास समिति के सचिव और अध्यक्ष से इसकी नाराजगी थी और उसने उसी नाराजगी के कारण कर्रवाई की। समिति का कहना है कि है नाराजगी केवल इस बात से थी कि समिति ने सतीश कुमार की 50 लाख की मांग को नहीं माना और पैसे देने से मना कर दिया। यह बात समिति के अधिकारियों ने आन कैमरा बोली है और सीधे आरोप लगाये हैं। समिति के अधिकारियों का यह भी कहना है कि यह प्रत्येक माह 2 लाख रूपये महीने अतिरिक्त समिति से चाहता था। सतीश कुमार की मांग जब पूरी नही हुई तो इसने सीलिंग की कार्रवाई कर दी और लोगों को दौड़ा दौड़ा कर परेशान करने में जुट गया। सतीश कुमार नाम का ये अधिकारी अपने निजी स्वार्थ के लिए लोगों को तंग करता है। करेप्शन की रेल पेल में यह अकेलेन नहीं है बल्कि पूरी टीम बना कर व्यवस्थित तरीके से इस काम को किया जा रहा है। इसकी पहुंच ऊपर तक है इनके एक इशारे पर कोई भी फर्जी शिकायत दर्ज कर उस पर जांच के आदेश जारी हो जाते हैं। इस पूरी करेप्शन की कहानी को आप हमारे यूटयूब चैनल के इस लिंग पर जाकर देख सकते हैं।
जिम्मेदारों के नहीं उठे फोन
आप खुद बताईय कि विसिल ब्लोअर क्या क्या करें? कैसे भ्रष्टाचारियों के मंसूबों को फेल किया जाए जब जिम्मेदार जवाब देने से बचे। इस पूरे प्रकरण में जब विभागीय मंत्री और विभागीय प्रमुख सचिव से उनके जबाव जानने के लिए फोन किया तो उन्होंने फोन ही नही उठाये। यह हाल तब है जब सूबे के मुखिया सीएम योगी आदित्यनाथ के स्पष्ठ आदेश है कि अधिकारी जनता से मिलें और उनके फोन उठाये।
आर्थिक लेनदेन की बातें चिंताजनक
सबसे चिंताजनक पहलू वह हिस्सा है जिसमें आर्थिक लेनदेन की बात हो रही है। बातचीत में एक निश्चित रकम के बदले प्रशासनिक कार्रवाई और जांच प्रक्रिया को प्रभावित करने का आश्वासन दिया गया। स्टिंग के दौरान यह भी कहा गया कि शिकायतों और जांचों को लेकर उच्च स्तर तक संपर्क मौजूद हैं। यह दावा अपने आप में गंभीर है क्योंकि इससे यह आशंका पैदा होती है कि कहीं भ्रष्टाचार व्यक्तिगत स्तर तक सीमित न होकर व्यापक नेटवर्क का रूप तो नहीं ले चुका। मामले का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि शिकायत के आधार पर बाद में वास्तव में जांच गठित हुई। इससे आरोप लगाने वाले पक्ष का दावा मजबूत होता है कि स्टिंग में कही गई बातें बाद की घटनाओं से मेल खाती हैं। पूरे प्रकरण ने सहकारी समितियों के सदस्यों के बीच भी चिंता पैदा कर दी है। उनका कहना है कि यदि जांच और शिकायत की प्रक्रिया पर भरोसा कमजोर होगा तो सहकारिता आंदोलन की मूल भावना को नुकसान पहुंचेगा। सहकारी संस्थाएं सामूहिक विश्वास पर चलती हैं और यदि सरकारी निगरानी तंत्र पर ही सवाल खड़े हो जाएं तो यह विश्वास डगमगा सकता है। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर सच क्या है? क्या यह एक व्यक्ति की करतूत का मामला है या फिर व्यवस्था के भीतर मौजूद किसी बड़े रोग की झलक? क्या जांचों का इस्तेमाल न्याय के लिए हो रहा है या फिर प्रभाव और पैसों के खेल के लिए? इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में जांच एजेंसियों विभागीय अधिकारियों और संबंधित पक्षों के बयानों से सामने आएंगे।




