अब माता-पिता नहीं होंगे बेघर, Bombay HC ने बेटे-बहू से वापस दिलाया फ्लैट

कोर्ट ने कहा कि अगर बेटा माता-पिता की सेवा नहीं करता, तो बेटे को दिया गया फ्लैट वापस लौटाना होगा, भले ही आर्थिक रूप से सक्षम हों. 

4पीएम न्यूज नेटवर्क: बॉम्बे हाई कोर्ट ने माता-पिता की देखभाल न करने वाले बेटा और बहू के खिलाफ एक बड़ा फैसला लिया. कोर्ट ने कहा कि अगर बेटा माता-पिता की सेवा नहीं करता, तो बेटे को दिया गया फ्लैट वापस लौटाना होगा, भले ही आर्थिक रूप से सक्षम हों.

मुंबई में एक माता-पिता ने ये सोचकर अपने जीवन भर की कमाई अपना लाखों का फ्लैट अपने बेटे के नाम ट्रांसफर किया था कि बेटा बुढ़ापे में उनकी सेवा करेगा, लेकिन जब बेटे ने सेवा करने में आनाकानी की बेईज्जती करने लगा तकलीफ देने लगा तब माता पिता ने कोर्ट की शरण ली और कई महीनों तक चले कोर्ट मामले मैं जो फैसला आया वो माता पिता के हक में आया.

बेटे ने नहीं निभाई जिम्मेदारी तो बॉम्बे हाईकोर्ट ने फ्लैट लौटाने का आदेश दिया. अगर माता-पिता ने इस भरोसे पर अपनी संपत्ति बेटे या बेटी के नाम कर दी है कि बुढ़ापे में उनकी देखभाल की जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं होता, तो वे अपनी संपत्ति वापस पाने के हकदार हैं. बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यही स्पष्ट किया है.

बॉम्बे हाईकोर्ट ने अपने हालिया फैसले में कहा है कि यदि माता-पिता ने अपने बेटे को इस शर्त पर संपत्ति उपहार (गिफ्ट डीड) के जरिए दी थी कि वह उनकी देखभाल करेगा, लेकिन उसने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई, तो माता-पिता उस संपत्ति को वापस लेने का कानूनी अधिकार रखते हैं. यह अधिकार तब भी लागू होगा, जब माता-पिता आर्थिक रूप से सक्षम हों.

बहू-बेटे ने नहीं की थी देखभाल
ये मामला मुंबई के लोअर परेल स्थित एक फ्लैट से जुड़ा है. 68 साल के पिता ने अपने बेटे को फ्लैट गिफ्ट किया था. बाद में उन्होंने आरोप लगाया कि बेटा और बहू उनकी तथा उनकी पत्नी की देखभाल नहीं कर रहे हैं और उन्हें घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा. इसके बाद उन्होंने वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत राहत की मांग की.
हाईकोर्ट ने वरिष्ठ नागरिक अधिकरण (ट्रिब्यूनल) के आदेश को सही ठहराते हुए बेटे को फ्लैट वापस करने का निर्देश दिया.

अदालत ने कहा कि माता-पिता द्वारा संपत्ति हस्तांतरित करने के पीछे उनकी देखभाल की अपेक्षा स्वाभाविक और निहित होती है. यदि इस भरोसे का पालन नहीं किया जाता, तो गिफ्ट डीड रद्द की जा सकती है. यह फैसला वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों को मजबूत करने वाला माना जा रहा है और भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल बन सकता है.

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