भाजपा में बगावत की शुरुआत!
एक टिकट और पूरा शहर ठप

- दतिया से उठी चिंगारी कहीं देशभर में आग न बन जाए!
- मध्य प्रदेश के दतिया से नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटा, भारी बवाल
- एएसपी समेत दर्जनों पुलिसकर्मी चोटिल उप-चुनाव में काटा है बीजेपी ने टिकट
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। राजनीति में कहा जाता है कि चुनाव लोकतंत्र का पर्व होता है। लेकिन यह लोकतंत्र अब भीड़तंत्र में बदल चुका, अब पार्टी के टिकट कटने के साथ ही सड़कें जाम होना शुरू हो गयी हैं। पुलिस पर पत्थर बरसने लगें हैं और समर्थक अपनी ही पार्टी के खिलाफ मोर्चा खोलने से परहेज नहीं कर रहे। सवाल उठना लाजिमी है कि क्या भारतीय राजनीति एक नए दौर में प्रवेश कर रही है? मध्य प्रदेश के दतिया से आई तस्वीरें सिर्फ एक विधानसभा की कहानी नहीं लगतीं। भारतीय जनता पार्टी ने उपचुनाव के लिए पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटा और देखते ही देखते समर्थकों का गुस्सा सड़कों पर उतर आया। हाईवे जाम हो गया। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव हुआ। एएसपी समेत कई पुलिसकर्मी घायल हुए। बाजार बंद का आह्वान हुआ। सवाल यह नहीं कि एक नेता का टिकट क्यों कटा। सवाल यह है कि क्या अब राजनीतिक दलों में टिकट वितरण लोकतांत्रिक प्रक्रिया कम और शक्ति प्रदर्शन का कारण ज्यादा बनता जा रहा है? यह कहानी सिर्फ दतिया की नहीं है। लगभग हर बड़े दल में एक एक सीट पर कई दावेदार हैं। भाजपा जैसी विशाल संगठनात्मक पार्टी में तो अनेक सीटों पर एक टिकट के लिए कई प्रभावशाली चेहरे वर्षों से मेहनत करते हैं। टिकट एक को मिलता है लेकिन असंतोष कई लोगों के हिस्से आता है। अब तक यह असंतोष बंद कमरों में सिमट जाता था। लेकिन अगर वह सड़कों पर उतरने लगे तो चुनावी राजनीति का चरित्र बदल सकता है। कल्पना कीजिए अगर यही तस्वीर आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों में देशभर में दोहराई जाने लगी तो क्या होगा? हर टिकट के बाद प्रदर्शन हर सूची के बाद सड़क जाम हर असंतुष्ट नेता के समर्थन में शक्ति प्रदर्शन क्या चुनाव प्रचार से ज्यादा ऊर्जा टिकट विरोध में खर्च होगी?
नरोत्तम के समर्थन में सभी पदाधिकारियों का इस्तीफा
स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भाजपा के स्थानीय पदाधिकारियों ने भी अपने पदों से इस्तीफे दे दिए। समर्थकों ने टायर जलाकर और नारेबाजी कर पार्टी नेतृत्व के फैसले के खिलाफ खुला विरोध दर्ज कराया। आज दतिया बंद का भी आह्वान किया गया है, जिससे राजनीतिक तनाव और बढ़ गया है।
प्रशासनिक चूक हालात बेकाबू, घंटो चक्का जाम की स्थिति बनी रही
दतिया के जिलाधिकारी स्वप्निल वानखेड़े ने कहा है कि घंटो चक्का जाम की स्थिति बनी रही। उन्होंने कहा कि प्रदर्शनकारियों को शांतिपूर्वक समझाने का प्रयास किया गया लेकिन वह हटने को तैयार नहीं थे। इसके बाद उन्हें हटाने के लिए प्रशासन की ओर से आंसू गैस के गोले दागे गए। पथराव में कई पुलिसकर्मी घायल हुए हैं। डीएसपी, एसडीओपी और अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (एएसपी) को भी चोटें आई हैं। जिलाधिकारी ने कहा कि सभी प्रदर्शनकारियों को चेतावनी दी गई है कि कोई भी व्यक्ति शांति भंग करने का प्रयास न करे। उन्होंने कहा कि प्रशासन आचार संहिता के पालन को लेकर पूरी तरह सख्त है। वानखेड़े ने कहा कि किसी राजनीतिक दल द्वारा किसे टिकट दिया जाए यह उसका आंतरिक मामला है लेकिन ऐसे मामलों के कारण आम लोगों को परेशानी नहीं होनी चाहिए। बाजार बंद के आह्वान पर जिलाधिकारी ने कहा कि प्रदर्शनकारियों ने एक दिन पहले बाजार बंद का ऐलान किया था, जिससे व्यापारी सहमत नहीं थे। इसके मद्देनजर बाजारों में भारी पुलिस बल तैनात किया गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी को भी जबरन बाजार बंद नहीं कराने दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव सुनिश्चित करने के लिए सीआरपीएफ की 16 कंपनियां उपलब्ध कराई गई हैं और सभी मतदाताओं की सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी। दतिया के पुलिस अधीक्षक मयूर खंडेलवाल ने कहा कि पत्थरबाजी के बाद पुलिस की ओर से आंसू गैस के गोलों का प्रयोग किया गया। कई कर्मचारी गंभीर रूप से घायल हैं। एडिशनल एसपी को भी चोटें आई हैं। अच्छी बात यह है कि इस दौरान हम लोगों की ओर से लाठीचार्ज नहीं किया गया है। उपद्रव करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है और कुछ लोगों को गिरफ्तार भी किया गया है। आचार सहिंता के दौरान किसी की ओर से भी शांति भंग करने की कोशिश की गई तो उसके खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की जाएगी।
पार्टी का टिकट राजनीतिक अस्तित्व का अंतिम प्रमाणपत्र
मध्य प्रदेश के हालात को देखते हुए कई सवाल जन्म ले रहे हैं कि क्या दतिया की घटना पूरे देश की दिशा तय कर देगी? क्या राजनीतिक दलों का आंतरिक अनुशासन पहले जैसा मजबूत नहीं रहा? क्या कार्यकर्ता अब फैसलों को संगठन का निर्णय मानने के बजाय व्यक्तिगत सम्मान का प्रश्न बना रहे हैं? और सबसे अहम सवाल क्या टिकट अब सिर्फ चुनाव लडऩे का अधिकार नहीं बल्कि राजनीतिक अस्तित्व का अंतिम प्रमाणपत्र बन गया है? दतिया की सड़क पर जो गुस्सा दिखाई दिया वह चाहे स्थानीय परिस्थितियों का परिणाम हो या समर्थकों की भावनाओं का उफान लेकिन उसने भारतीय राजनीति को एक आईना जरूर दिखाया है। सवाल अब सिर्फ नरोत्तम मिश्रा का नहीं है। सवाल यह है कि अगर टिकट कटते ही बगावत का नया चलन शुरू हुआ तो आने वाले चुनावों में लोकतंत्र का सबसे बड़ा रणक्षेत्र मतदान केंद्र नहीं बल्कि राजनीतिक दलों के भीतर ही बन जाएगा।
क्या चुनावी मौसम में हर टिकट बनेगा राजनीतिक विस्फोट?
भारतीय जनता पार्टी के पूर्व गृह मंत्री और छह बार के विधायक रहे डॉ. नरोत्तम मिश्रा का दतिया विधानसभा उपचुनाव में टिकट कटना सिर्फ एक राजनीतिक फैसला नहीं रहा बल्कि उसने सियासी भूचाल का रूप ले लिया। भाजपा ने इस बार नरोत्तम मिश्रा की जगह पूर्व संभागीय संगठन मंत्री आशुतोष तिवारी पर दांव लगाया जिसके बाद नाराज समर्थक सड़कों पर उतर आए। दतिया-झांसी हाईवे को नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों ने जाम कर दिया। देखते ही देखते करीब तीन किलोमीटर लंबा जाम लग गया जिससे दतिया, झांसी, शिवपुरी और ग्वालियर तक यातायात प्रभावित हुआ। हालात इतने बिगड़ गए कि पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव की नौबत आ गई। पुलिस के अनुसार, प्रदर्शनकारियों ने पथराव किया जिसमें कई पुलिसकर्मी घायल हुए। प्रशासन को भीड़ को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस के गोले छोडऩे पड़े।




