फिर चर्चा में आया ‘ऑपरेशन टाइगर-3’ शिंदे गुट पर उठे सवाल!
उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना कथित तौर पर ‘ऑपरेशन टाइगर-3’ की तैयारी में जुटी है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: महाराष्ट्र में विकास भले ही न हो लेकिन नेताओं के दल बदलने का सिलसिला लगातार जारी है। सत्ताधारी दल विपक्ष को कमजोर करने के लिए तरह-तरह की नई चालें चल रहा है।
नेताओं को तोड़कर अपने दल में शामिल करने के लिए बड़े बड़े ऑफर भी दिए जाने की खबरें सामने आ रही है। इसी बीच महाराष्ट्र में एक बार फिर ‘ऑपरेशन टाइगर-3’ को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना कथित तौर पर ‘ऑपरेशन टाइगर-3’ की तैयारी में जुटी है। दावा किया जा रहा है कि इस अभियान के जरिए उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) और शरद पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) को एक और बड़ा झटका लग सकता है। हाल के दिनों में ठाकरे गुट के कई प्रमुख नेताओं और पदाधिकारियों के शिंदे गुट में शामिल होने से महाराष्ट्र की राजनीतिक तस्वीर में बदलाव देखने को मिला है। इसी बीच अब ‘ऑपरेशन टाइगर-3’ की चर्चा ने राजनीतिक गलियारों में हलचल और बढ़ा दी है।
शिंदे गुट के नेताओं का दावा है कि ठाकरे गुट के करीब 10 विधायकों के साथ पिछले कुछ दिनों से लगातार संपर्क और गोपनीय बैठकों का दौर जारी है। इन बैठकों में उन्हें शिंदे गुट में शामिल होने के लिए मनाने की कोशिश की गई है और दावा किया जा रहा है कि इसमें सफलता भी मिली है।
ऑपरेशन टाइगर-3′ की अगर बात की जाए तो इससे पहले 2022 में शिंदे ने उद्धव ठाकरे गुट से अलग होकर अपनी शिवसेना बनाई थी, उसे ऑपरेशन टाइगर-1 कहा जाता है। फिर हाल ही में उद्धव गुट के 6 सांसद शिंदे गुट में शामिल हो गए, उसे ऑपरेशन टाइगर-2 माना जा रहा है। अब खबर है कि उद्धव गुट के करीब 10 विधायकों शिंदे गुट में शामिल हो सकते हैं। शरद पवार की एनसीपी (एसपी) में भी कुछ बेचैनी बताई जा रही है।
कुल मिलाकर यह सब महाराष्ट्र की सत्ता की लड़ाई का हिस्सा लगता है। एकनाथ शिंदे महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री हैं और देवेंद्र फड़नवीस मुख्यमंत्री। दोनों मिलकर महायुति सरकार चला रहे हैं। उद्धव ठाकरे और शरद पवार विपक्ष में हैं। राजनीति में ऐसे बदलाव आम हैं, लेकिन आम लोग इनसे थक चुके हैं।
आम महाराष्ट्रीयन इन खबरों को देखकर सोचता है – नेता बदलते रहते हैं, लेकिन जनता की समस्याएं बनी रहती हैं। बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की परेशानी, मुंबई की सड़कें, पूना-मुंबई हाईवे पर लैंडस्लाइड जैसी घटनाएं। जबकि नेता एक-दूसरे को तोड़ने में लगे हैं। शिंदे और फड़नवीस सरकार में विकास का दावा करते हैं, लेकिन विपक्ष कहता है कि यह सिर्फ सत्ता का खेल है।
वहीं शिंदे को लेकर आलोचकों का कहना है कि उन्होंने पार्टी तोड़ी, अब फिर तोड़ रहे हैं। ऑपरेशन टाइगर नाम से वे इसे गर्व की बात बनाते हैं, लेकिन कई लोग इसे विश्वासघात मानते हैं।फड़नवीस लंबे समय से महाराष्ट्र की राजनीति में हैं। लेकिन आलोचना भी होती है कि वे भाजपा के हितों के लिए शिवसेना में फूट डाल रहे हैं। दोनों नेता मिलकर MVA सरकार गिरा चुके हैं। अब फिर उसी रणनीति को दोहरा रहे हैं।
जैस की हमने पहले ही बताया आपको कि, महाराष्ट्र की राजनीति पिछले कुछ वर्षों से लगातार उठापटक का केंद्र रही है। साल 2022 में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना में बड़ी बगावत हुई थी, जिसके बाद उद्धव ठाकरे सरकार गिर गई और भाजपा के समर्थन से नई सरकार बनी। इसके बाद 2023 में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में भी विभाजन हुआ और अजित पवार अपने समर्थक विधायकों के साथ सरकार में शामिल हो गए।
इन घटनाओं ने महाराष्ट्र के राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल दिए। अब “ऑपरेशन टाइगर-3” की चर्चा ऐसे समय में हो रही है जब कुछ सप्ताह पहले उद्धव ठाकरे गुट के कई सांसदों के शिंदे गुट के साथ जाने की खबरें सामने आई थीं। इसके बाद शिंदे समर्थक नेताओं ने संकेत दिए कि आने वाले समय में कुछ विधायक भी पाला बदल सकते हैं।
महाराष्ट्र सरकार के मंत्री गुलाबराव पाटिल ने सार्वजनिक रूप से दावा किया था कि उद्धव गुट के कई विधायक शिंदे गुट में आने वाले हैं। हालांकि शिंदे सरकार के कुछ अन्य नेताओं ने “ऑपरेशन टाइगर” जैसी किसी औपचारिक योजना से इनकार भी किया है।
इस पूरे घटनाक्रम ने महाविकास अघाड़ी के भीतर भी बेचैनी बढ़ा दी है। हाल ही में शरद पवार और एकनाथ शिंदे की मुलाकात ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चाओं को जन्म दिया।
विपक्षी गठबंधन के भीतर कुछ नेताओं ने इस मुलाकात पर सवाल उठाए, जबकि एनसीपी (शरद पवार) की सांसद सुप्रिया सुले ने इसे सामान्य मुलाकात बताते हुए राजनीतिक महत्व कम करने की कोशिश की। उद्धव ठाकरे गुट का आरोप है कि सत्ता पक्ष लगातार विपक्षी नेताओं और जनप्रतिनिधियों को अपने साथ लाने की कोशिश कर रहा है।
पार्टी के नेताओं का कहना है कि यह लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए अच्छा संकेत नहीं है और इससे मतदाताओं के जनादेश का सम्मान कम होता है। वहीं भाजपा और शिंदे गुट का तर्क है कि जो नेता उनके साथ आ रहे हैं, वे विकास कार्यों और राजनीतिक भविष्य को देखते हुए स्वेच्छा से निर्णय ले रहे हैं।
वहीं सियासी पंडितों का मानना है कि महाराष्ट्र में लगातार हो रहे दल-बदल ने राज्य की राजनीति को अस्थिर बनाया है। एक ओर सत्ता पक्ष अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिश में दिखाई देता है,
वहीं विपक्ष अपनी एकजुटता बनाए रखने की चुनौती का सामना कर रहा है। उद्धव ठाकरे के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने विधायकों और कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखने की है। इसी कारण वे लगातार राज्य के विभिन्न क्षेत्रों का दौरा कर रहे हैं और पार्टी संगठन को मजबूत करने पर जोर दे रहे हैं।
वर्तमान विधानसभा में महायुति गठबंधन पहले से ही मजबूत स्थिति में है। इसके बावजूद यदि विपक्षी दलों के और विधायक सत्ता पक्ष में शामिल होते हैं तो महाराष्ट्र की राजनीति में विपक्ष और कमजोर हो सकता है। दूसरी ओर यदि उद्धव ठाकरे और शरद पवार अपने विधायकों को एकजुट रखने में सफल रहते हैं तो “ऑपरेशन टाइगर-3” केवल राजनीतिक चर्चा बनकर रह सकता है।
ऐसे ऑपरेशन से लोकतंत्र कमजोर होता है। जनता ने वोट देकर विधायक भेजे, लेकिन वे पार्टी बदलते रहते हैं। एंटी डिफेक्शन कानून है, लेकिन छेद हैं। दो-तिहाई अगर साथ हों तो बच जाते हैं।
शिंदे और फड़नवीस इस कानून के दायरे में काम कर रहे हैं, लेकिन नैतिकता का सवाल उठता है।आम लोग चाहते हैं कि नेता विकास पर काम करें। महाराष्ट्र में अच्छी संभावनाएं हैं – उद्योग, कृषि, पर्यटन। लेकिन राजनीतिक अस्थिरता से निवेश प्रभावित होता है। शिंदे-फड़नवीस सरकार दावा करती है कि वे स्थिरता लाए हैं, लेकिन लगातार ऑपरेशन से लगता है कि अस्थिरता खुद पैदा कर रहे हैं।
अभी monsoon session या अगले चुनाव तक और हलचल हो सकती है। अगर 10 MLA चले गए तो उद्धव गुट बहुत कमजोर हो जाएगा। शिंदे गुट मजबूत होगा। शरद पवार गुट भी सतर्क है।लेकिन इतिहास बताता है कि ऐसे बदलाव स्थायी नहीं होते। लोग देख रहे हैं कि कौन सच्चा काम करता है। शिंदे और फड़नवीस को सत्ता में रहते विकास दिखाना होगा। सड़कें, पानी, बिजली, रोजगार – ये मुद्दे ज्यादा महत्व रखते हैं।
हालांकि इन दावों के बाद उद्धव ठाकरे गुट और शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी में राजनीतिक हलचल और असहजता की चर्चा तेज हो गई है। हालांकि, अब तक इन दावों की किसी स्वतंत्र स्रोत या आधिकारिक स्तर पर पुष्टि नहीं हुई है। “ऑपरेशन टाइगर-3” को लेकर कई दावे और अटकलें हैं, लेकिन 10 विधायकों के शिंदे गुट में शामिल होने की कोई आधिकारिक और अंतिम पुष्टि सामने नहीं आई है।
इसलिए इस पूरे मामले को राजनीतिक दावों और संभावनाओं के रूप में ही देखा जाना चाहिए। आने वाले दिनों में महाराष्ट्र विधानसभा और विपक्षी दलों की गतिविधियां तय करेंगी कि यह चर्चा वास्तव में बड़े राजनीतिक बदलाव में बदलती है या नहीं। लेकिन गौर करने वाली बात ये है कि जितना ध्यान सत्ताधारी दल विपक्षी नेताओं को अपने दल में शामिल करने में लगाते हैं उतना ही ध्यान कहीं राज्य की बेहतरी और जनता के हिट में लगाए तो जनता का उद्धार हो जाएगा।



