SC ने बरकरार रखी लालू यादव की राहत, हाईकोर्ट को तय की 6 महीने की समयसीमा
एडिशनल सॉलिसिटर ने सुनवाई के दौरान तर्क दिया कि हाई कोर्ट ने इस गलत आधार पर सजा पर रोक लगाई थी कि लालू ने अपनी सजा का 50 फीसदी हिस्सा पूरा कर लिया.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: एडिशनल सॉलिसिटर ने सुनवाई के दौरान तर्क दिया कि हाई कोर्ट ने इस गलत आधार पर सजा पर रोक लगाई थी कि लालू ने अपनी सजा का 50 फीसदी हिस्सा पूरा कर लिया.
सजा पर रोक के लिए पहले की 2 अर्जियां खारिज कर दी गई थीं जबकि तीसरी अर्जी को तथ्यात्मक रूप से गलत आधार पर मंजूरी दी गई थी.
सुप्रीम कोर्ट ने आज मंगलवार को बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के प्रमुख लालू प्रसाद यादव की जमानत को रद्द करने से इनकार कर दिया, साथ ही झारखंड हाई कोर्ट के उस आदेश में दखल देने से मना कर दिया, जिसमें देवघर चारा घोटाला मामले में उनकी सजा पर रोक लगाई गई थी. उसने हाई कोर्ट से उनकी लंबित आपराधिक अपील पर 6 महीने के भीतर फैसला करने का अनुरोध भी किया.
जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस पीबी वराले की बेंच आज झारखंड राज्य की ओर से दायर स्पेशल लीव पिटिशन पर सुनवाई कर रही थी. यह याचिका झारखंड हाई कोर्ट के 12 जुलाई, 2019 के उस आदेश को चुनौती देने के लिए दायर की गई थी, जिसमें देवघर चारा घोटाला मामले में लालू की सजा पर रोक लगाई गई थी.
HC को सुनवाई में तेजी लाना होगा: SC
बेंच ने कहा, “दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद, हम आदेश में दखल देने के पक्ष में नहीं हैं, खासकर इसलिए क्योंकि तब से 7 साल का वक्त गुजर गया है. ये अपीलें साल 2018 की हैं, इसलिए हाई कोर्ट से सुनवाई में तेजी लाने का अनुरोध करना ही उचित होगा.” साथ ही बेंच ने कहा कि इन अपीलों पर अगले 6 महीने के अंदर फैसला करना बेहतर रहेगा.
राज्य की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) एसवी राजू ने सुनवाई के दौरान तर्क दिया कि हाई कोर्ट ने इस गलत आधार पर सजा पर रोक लगाई थी कि लालू प्रसाद ने अपनी सजा का 50 फीसदी हिस्सा पूरा कर लिया है. उन्होंने बताया कि सजा पर रोक के लिए पहले की 2 अर्जियां खारिज कर दी गई थीं जबकि तीसरी अर्जी को तथ्यात्मक रूप से गलत आधार पर मंजूरी दी गई थी.
HC ने अवधि की गलत गणना कीः ASG
राजू ने यह भी तर्क दिया कि क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (CrPC) की धारा 427 लागू होगी क्योंकि लालू यादव को अलग-अलग केसों से जुड़े कई चारा घोटाला मामलों में दोषी ठहराया गया है. उन्होंने आगे कहा कि जब तक कोर्ट कोई और निर्देश न दे, बाद की सजाएं पिछली सजा पूरी होने के बाद ही शुरू होती हैं. उनके अनुसार, हाई कोर्ट ने जेल में बिताई गई अवधि की गणना करते समय सजाओं को एक साथ मानकर गलती की.
उन्होंने यह भी कहा, “इसके लिए अपनाया गया पैमाना ही गलत है,” साथ ही यह भी जोड़ा कि देवघर चारा घोटाला मामले में सजा पिछली सजा पूरी होने के बाद ही शुरू होगी. जस्टिस सुंदरेश ने हाई कोर्ट में लंबित अपील की स्थिति के बारे में पूछा. राजू ने जवाब दिया कि अपील पर अभी सुनवाई नहीं हुई है और आरोप लगाया कि देरी के लिए आरोपी जिम्मेदार है.
हालांकि लालू प्रसाद की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट कपिल सिबल ने राज्य की याचिका का विरोध किया. उन्होंने तर्क दिया कि सजा पर रोक पर विचार करने के चरण में धारा 427 का हवाला देकर राज्य कानून का गलत तर्क दे रहा है.
सिब्बल ने कहा कि सजा एक साथ चलेगी या एक के बाद एक, यह सवाल आखिरी स्टेज पर उठाया जाएगा. उन्होंने यह भी कहा कि हाई कोर्ट ने सजा सस्पेंड करने के लिए एक जैसा पैमाना अपनाया, जिसके तहत अपील करने वाले की आधी सजा पूरी होने पर सजा सस्पेंड कर दी जाती है.
लालू प्रसाद को CBI की स्पेशल कोर्ट ने दोषी ठहराया था. कोर्ट ने IPC और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की अलग-अलग धाराओं के तहत साढ़े तीन साल की सजा सुनाई थी.
हाई कोर्ट में सजा निलंबित किए जाने को लेकर लालू की यह तीसरी अर्जी थी. उनकी पिछली दोनों अर्जियां 23 फरवरी 2018 और 10 जनवरी 2019 को इस आधार पर खारिज कर दी गई थीं कि उन्होंने अपनी आधी सजा तक पूरी नहीं की है. अब तीसरी और नई अर्जी में लालू की ओर से कहा गया कि अब उन्होंने अपनी आधी से अधिक की सजा पूरी कर ली है.



