उप-चुनाव के त्रिकोण में फंस गयी बीजेपी

  • दतिया से लेकर बांकीपुर तक बीजेपी के लिए बुरी खबर
  • दतिया में अपनों की नाराजगी बांकीपुर में प्रशांत किशोर की चुनौती, मांजलपुर में सीधी टक्कर
  • क्या सत्ता के लिए यह सिर्फ तीन सीटों की लड़ाई है या 2029 की दस्तक?

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। विधानसभा चुनाव सिर्फ सिर्फ तीन सीटों पर हो रहा है लेकिन लेकिन दिल्ली से लेकर पटना भोपाल और गांधीनगर तक में राजनीतिक धड़कनें इतनी तेज हैं कि दूर से ही सुनाई दे रही है। भारतीय राजनीति में कई बार इतिहास लोकसभा से नहीं बल्कि उपचुनाव से लिखा गया है। आज सवाल सीटों का नहीं है सवाल उस संदेश का है जो जनता सत्ता को भेजना चाहती है।
एक तरफ मध्य प्रदेश का दतिया विधानसभा सीट है जहां कभी बीजेपी की ताकत माने जाने वाले नरोत्तम मिश्रा की बागावत ने अलाकमान के मांथे पर बल ला दिये हैं। दूसरी तरफ बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट जहां चुनावी रणनीति के मास्टरमाइंड प्रशांत किशोर पहली बार मैदान में उतरकर पूरे समीकरण को चुनौती दे रहे हैं। और तीसरी तरफ गुजरात का मांजलपुर है जहां कांग्रेस सीधे मुकाबले में है और बीजेपी अपने सबसे मजबूत किले में बढ़त बनाए रखने की कोशिश कर रही है।

सवाल उठता है

सवाल लाजमी है कि क्या यह सिर्फ तीन उपचुनाव हैं? या फिर जनता सत्ता को कोई बड़ा राजनीतिक संदेश देने की तैयारी कर रही है? राजनीति का पुराना सिद्धांत कहता है कि उपचुनाव में सरकार अपनी पूरी ताकत झोंकती है। प्रशासनिक प्रतिष्ठा भी दांव पर होती है संगठन की अग्निपरीक्षा भी होती है और नेतृत्व की विश्वसनीयता भी। लेकिन इस बार तस्वीर सामान्य नहीं दिख रही। दतिया में चुनौती बाहर से कम अंदर से ज्यादा दिखाई दे रही है। बांकीपुर में मुकाबला सिर्फ दलों का नहीं बल्कि नयी राजनीति बनाम पुरानी राजनीति का भी बताया जा रहा है। और गुजरात जहां बीजेपी का संगठन हमेशा उसकी सबसे बड़ी ताकत माना जाता है वहां भी विपक्ष मुकाबले को आसान मानने के मूड में नहीं है।

बांकीपुर प्रशांत किशोर की पहली बड़ी राजनीतिक परीक्षा

बिहार का बांकीपुर इस चुनाव का सबसे हाई प्रोफाइल मुकाबला बन चुका है। वर्षों तक दूसरों के चुनावी अभियान तैयार करने वाले प्रशांत किशोर अब खुद मैदान में हैं। यह चुनाव केवल एक सीट का नहीं बल्कि उनकी राजनीतिक विश्वसनीयता की पहली वास्तविक परीक्षा भी है। भाजपा ने शुरुआती उम्मीदवार अभिषेक कुमार बंटी का नाम वापस होने के बाद नीरज कुमार सिन्हा को मैदान में उतारा है। पार्टी का दावा है कि बांकीपुर उसका परंपरागत गढ़ है और संगठन के दम पर वह सीट बरकरार रखेगी। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने रेखा कुमारी को उम्मीदवार बनाया है। महागठबंधन स्थानीय मुद्दों, महंगाई, बेरोजगारी और सत्ता विरोधी माहौल को चुनावी मुद्दा बनाकर भाजपा को घेरने की कोशिश कर रहा है। सबसे अधिक चर्चा प्रशांत किशोर की है जो जन सुराज पार्टी के टिकट पर पहली बार स्वयं चुनाव लड़ रहे हैं।

मांजलपुर किला बचाने की चुनौती

गुजरात भारतीय जनता पार्टी का सबसे मजबूत राजनीतिक गढ़ माना जाता है। पिछले तीन दशकों से राज्य की सत्ता पर भाजपा का वर्चस्व कायम है और विधानसभा चुनावों में पार्टी लगातार बड़ी जीत दर्ज करती रही है। ऐसे में वडोदरा जिले की मांजलपुर विधानसभा सीट पर हो रहा उपचुनाव महज एक सीट का चुनाव नहीं बल्कि भाजपा की संगठनात्मक ताकत और राजनीतिक पकड़ की एक अहम परीक्षा माना जा रहा है। यह सीट विधायक योगेश पटेल के निधन के बाद खाली हुई थी जिसके चलते उपचुनाव कराया जा रहा है। भाजपा ने इस सीट पर जितेंद्रभाई वाघेला को उम्मीदवार बनाया है जबकि कांग्रेस ने भिखाभाई रबारी को मैदान में उतारकर सीधी चुनौती दी है। दोनों प्रमुख दल पूरे दमखम के साथ चुनाव प्रचार में जुटे हैं और इसे प्रतिष्ठा का मुकाबला मान रहे हैं। भाजपा के लिए चुनौती केवल सीट जीतने की नहीं है बल्कि यह साबित करने की भी है कि गुजरात में उसका पारंपरिक जनाधार और मजबूत संगठन पहले की तरह अटूट बना हुआ है। दूसरी ओर कांग्रेस इस उपचुनाव को स्थानीय मुद्दों, जनसंपर्क और सत्ता विरोधी भावनाओं के सहारे भाजपा के अभेद्य किले में सेंध लगाने के अवसर के रूप में देख रही है।

दतिया घर को आग लग गयी घर के चिराग से

मध्य प्रदेश का दतिया उपचुनाव सबसे ज्यादा इसलिए चर्चा में है क्योंकि यहां टिकट वितरण के बाद असंतोष की खबरें सुर्खियों में रहीं। पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा का नाम लगातार राजनीतिक बहस का हिस्सा बना हुआ है। विपक्ष इसी असंतोष को चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहा है जबकि बीजेपी संगठन यह संदेश देने में जुटा है कि चुनाव व्यक्ति नहीं संगठन लड़ता है। यही वजह है कि दतिया अब केवल स्थानीय चुनाव नहीं रहा। यह इस बात की भी परीक्षा है कि क्या मजबूत संगठन आंतरिक असंतोष के बावजूद मतदाताओं को एकजुट रख सकता है। नरोत्तम मिश्रा अपना जोकि पूर्व गृहमंत्री रह चुके हैं और दंबगई के साथ राजनीति करते हैं का टिकट कटा और दतिया का पूरा बीजेपी संगठन उनके समर्थन में खड़ा हो गया। 24 घंटे से ज्यादा समय तक विरोध प्रर्दशन हुए। लाठी चार्ज हुआ आंसू गैसे के गोले छोड़े गये। जर्बदस्त दबाव बनाने के बाद भी उनका टिकट नहीं बहाल हो सका। दतिया से भाजपा ने आशुतोष तिवारी को अपना प्रत्याशी बनाया है। वहीं कांग्रेस ने दो बार के विधायक रहे घनश्याम सिंह पर दांव लगाया है। घनश्याम सिंह राजघराने से जुड़े माने जाते हैं और दतिया की राजनीति में उनका अच्छा जनाधार माना जाता है। कांग्रेस का दावा है कि स्थानीय मुद्दों और भाजपा की अंदरूनी खींचतान का लाभ उसे मिलेगा। इस प्रकार दतिया का मुकाबला केवल आशुतोष तिवारी बनाम घनश्याम सिंह तक सीमित नहीं है बल्कि इसे भाजपा के संगठनात्मक अनुशासन नरोत्तम मिश्रा के प्रभाव और कांग्रेस की वापसी की कोशिश की भी परीक्षा माना जा रहा है।

Related Articles

Back to top button