84वें-87वें संशोधन केस में यू-टर्न, याचिकाकर्ता ने अर्जी ली वापस
सुप्रीम कोर्ट में 84वें और 87वें संविधान संशोधन को चुनौती देने वाली याचिका वापस ले ली गई है.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: सुप्रीम कोर्ट में 84वें और 87वें संविधान संशोधन को चुनौती देने वाली याचिका वापस ले ली गई है.
इन संशोधनों ने लोकसभा सीटों के बंटवारे को 1971 की जनगणना पर फ्रीज किया, जबकि 2001 की जनगणना के आधार पर परिसीमन की अनुमति दी. याचिकाकर्ता ने वोट की वैल्यू घटने का तर्क दिया.
सुप्रीम कोर्ट में 84वें और 87वें संविधान संशोधन की वैधता को चुनौती देने वाली एक याचिका दायर की गई थी, जिसे याचिकाकर्ता ने खुद वापस ले लिया है. इन संशोधनों ने 1971 की जनगणना के आधार पर राज्यों के बीच लोकसभा सीटों के बंटवारे को तो फ्रीज कर दिया था, लेकिन 2001 की जनगणना के आधार पर संसदीय और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से तय करने की इजाजत दे दी थी.
जस्टिस जॉयमाला बागची ने याचिकाकर्ता से कहा कि आप किसी भी चुनाव क्षेत्र से वोट दे सकते हैं और चुनाव लड़ सकते हैं. वकील ने कहा कि मेरे वोट की वैल्यू कम हो गई है, अब आबादी बढ़ गई है. गुरुग्राम, नोएडा को देखिए, 1970 के दशक में ये गांव हुआ करते थे और तब वहां बहुत कम लोग रहते थे. अब वहां लाखों लोग रहते हैं. मोहाली तो तब था ही नहीं.
वोट की वैल्यू कम नहीं हुई’
जस्टिस बागची ने कहा कि अगर आप संघीय संवैधानिक ढांचे को देखें, तो राज्य के संदर्भ में वोट की वैल्यू कम नहीं हुई है. ये सवाल तभी उठता है जब राज्यसभा के मामले में असमान तरीका अपनाया जाता है. सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि कुछ मामलों में विधायी हस्तक्षेप की जरूरत हो सकती है, लेकिन न्यायपालिका की नहीं.
कुछ मामलों में विधायी हस्तक्षेप की जरूरत है’
निशांत खत्री बनाम यूनियन मामले में CJI ने कहा कि कुछ मामलों में विधायी हस्तक्षेप की जरूरत हो सकती है. वकील ने कहा कि तमिलनाडु में प्रति सांसद आबादी 10 लाख थी. इस पर CJI ने कहा कि इसका संशोधन से कोई लेना-देना नहीं है.



