वफ़ा गोरखपुरी की शायरी को मिला सम्मान, गोरखपुर में जुटे देश के नामचीन साहित्यकार
वफ़ा गोरखपुरी की शायरी को मिला सम्मान, गोरखपुर में जुटे देश के नामचीन साहित्यकार

4पीएम न्यूज नेटवर्क: उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में हिंदी और उर्दू की साझा सांस्कृतिक विरासत को समर्पित एक भव्य एक दिवसीय संगोष्ठी एवं मुशायरे का आयोजन यासमीन शरीफ वेलफेयर सोसाइटी, गोरखपुर के तत्वावधान में होटल प्रगति इन, विजय चौक, गोरखपुर में किया गया।
कार्यक्रम का विषय था—“हिंदी-उर्दू सांझी विरासत के प्रतीक वफ़ा गोरखपुरी”। इस अवसर पर साहित्य, भाषा और संस्कृति के क्षेत्र से जुड़े अनेक प्रतिष्ठित विद्वानों, शिक्षाविदों, शायरों एवं साहित्य प्रेमियों ने सहभागिता कर हिंदी और उर्दू की साझा परंपरा पर विस्तृत विचार व्यक्त किए।
कार्यक्रम की अध्यक्षता राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित वरिष्ठ शायर एवं साहित्यकार तारकेश्वर नाथ श्रीवास्तव ‘वफ़ा गोरखपुरी’ ने की। उल्लेखनीय है कि वफ़ा गोरखपुरी की ग़ज़लों पर आधारित लगभग दो दर्जन काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं और वे समकालीन उर्दू साहित्य के महत्वपूर्ण हस्ताक्षरों में गिने जाते हैं।
इस अवसर पर पूर्व अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग एवं पूर्व संकायाध्यक्ष, कला संकाय, दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, प्रो. कीर्ति पाण्डेय तथा पूर्व विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग, दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, प्रो. आर. डी. राय मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता लखनऊ विश्वविद्यालय के उर्दू विभागाध्यक्ष प्रो. अब्बास रज़ा नय्यर थे। वहीं विशिष्ट अतिथि के रूप में डॉ. विकास कुमार सरकार (प्रभारी, दर्शनशास्त्र विभाग, सेंट एंड्रयूज कॉलेज) एवं डॉ. महबूब हसन (सहायक आचार्य, उर्दू विभाग, दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय) ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज कराई।
अतिथियों का भव्य स्वागत
कार्यक्रम का शुभारंभ यासमीन शरीफ वेलफेयर सोसाइटी के सचिव एवं सेंट एंड्रयूज कॉलेज, गोरखपुर के उर्दू विभाग प्रभारी डॉ. अशफाक अहमद उमर द्वारा सभी अतिथियों का गुलदस्ता एवं शॉल भेंट कर स्वागत करने के साथ हुआ। स्वागत भाषण में उन्होंने कहा कि हिंदी और उर्दू दोनों भाषाएं भारतीय संस्कृति की आत्मा हैं तथा दोनों की साझा विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाना समय की आवश्यकता है।
“वफ़ा गोरखपुरी ने क्लासिकी उर्दू शायरी की परंपरा को जीवित रखा” — प्रो. अब्बास रज़ा नय्यर
मुख्य वक्ता प्रो. अब्बास रज़ा नय्यर ने अपने व्याख्यान में गोरखपुर की समृद्ध साहित्यिक परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि यह शहर सदियों से साहित्य, विचार और संस्कृति की धरती रहा है। उन्होंने कहा कि गोरखपुर को फिराक गोरखपुरी और मजनूं गोरखपुरी जैसे महान साहित्यकारों ने विश्व पटल पर पहचान दिलाई और आज उसी परंपरा को वफ़ा गोरखपुरी अपनी रचनात्मकता से आगे बढ़ा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि “वफ़ा गोरखपुरी ने उर्दू की क्लासिकी शायरी की रिवायत को जीवित रखा है। उनकी ग़ज़लों में भाषा की मिठास, विचारों की गहराई और मानवीय संवेदनाओं का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।”
प्रो. नय्यर ने यह भी बताया कि वफ़ा गोरखपुरी के व्यक्तित्व और साहित्यिक योगदान पर जम्मू-कश्मीर विश्वविद्यालय में शोध कार्य चल रहा है, जो उनकी साहित्यिक प्रतिष्ठा का प्रमाण है। उन्होंने कहा कि किसी भी साहित्यकार के लिए इससे बड़ी उपलब्धि नहीं हो सकती कि समाज उसे सम्मान और प्रेम के साथ स्वीकार करे।
“उर्दू ने हिंदुस्तान की साझी विरासत को आगे बढ़ाया” — प्रो. कीर्ति पाण्डेय
मुख्य अतिथि प्रो. कीर्ति पाण्डेय ने कहा कि गोरखपुर की साहित्यिक परंपरा में उर्दू भाषा और साहित्य का अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्होंने कहा कि वफ़ा गोरखपुरी ने अपनी शायरी के माध्यम से भारत की गंगा-जमुनी तहज़ीब को सशक्त अभिव्यक्ति दी है।
उन्होंने कहा कि “उर्दू केवल एक भाषा नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति की साझी विरासत का प्रतीक है। वफ़ा गोरखपुरी की ग़ज़लें समाज, संस्कृति और मानवीय मूल्यों का जीवंत दस्तावेज हैं।”
“उर्दू और हिंदी के बिना हिंदुस्तान अधूरा है” — प्रो. आर. डी. राय
पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. आर. डी. राय ने कहा कि हिंदी और उर्दू दोनों भाषाएं भारतीय समाज की सांस्कृतिक पहचान हैं। उन्होंने कहा कि वफ़ा गोरखपुरी ने अपनी रचनाओं के माध्यम से मानवीय मूल्यों, सामाजिक सौहार्द और सांस्कृतिक परंपराओं को समृद्ध किया है।
उन्होंने कहा कि “उर्दू और हिंदी के बिना हिंदुस्तान की कल्पना अधूरी है। दोनों भाषाएं एक-दूसरे की पूरक हैं और भारतीय समाज की साझा आत्मा का प्रतिनिधित्व करती हैं।”
“वफ़ा गोरखपुरी ने फ़िराक़ की परंपरा को नई ऊर्जा दी” — डॉ. महबूब हसन
सहायक आचार्य डॉ. महबूब हसन ने कहा कि गोरखपुर की धरती साहित्यिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध रही है। उन्होंने कहा कि वफ़ा गोरखपुरी ने फ़िराक़ गोरखपुरी की साहित्यिक परंपरा को नई ऊर्जा प्रदान की है।
उन्होंने कहा कि उनकी शायरी में जीवन के प्रत्येक रंग दिखाई देते हैं। पारंपरिक ग़ज़ल की शैली को बनाए रखते हुए उन्होंने आधुनिक संवेदनाओं को भी अपनी रचनाओं में स्थान दिया है, जिससे उनकी शायरी नई पीढ़ी के लिए भी प्रासंगिक बन गई है।
स्वागत ग़ज़ल ने बांधा समां
कार्यक्रम के दौरान अध्यक्ष वफ़ा गोरखपुरी ने मुख्य वक्ता प्रो. अब्बास रज़ा नय्यर के सम्मान में एक विशेष स्वागत ग़ज़ल प्रस्तुत की। उनकी प्रस्तुति को श्रोताओं ने खूब सराहा और तालियों की गूंज से पूरा सभागार गूंज उठा।
मुशायरे में गूंजे शानदार अशआर
संगोष्ठी के उपरांत आयोजित मुशायरे में शहर के प्रतिष्ठित शायरों ने अपने बेहतरीन कलाम पेश कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
प्रो. अब्बास रज़ा नय्यर
ज्ञान की धुन में गाते हैं पत्ते उसके,
जिस पीपल की छांव में गौतम रहता है।
डॉ. बाहर गोरखपुरी
आंखें हैं अश्कबार मेरी और ज़बां चुप,
धड़कन है तेज़-तेज़, ख़यालों का गुमां चुप।
अर्शी बस्तवी
ये मयकदा है यहां बादानोश आते हैं,
जनाब-ए-शैख़ भला आ गए इधर कैसे।
दीदार बस्तवी
रूह को राख बना देती है बदले की आग,
सब्र इंसान को चट्टान बना देता है।
डॉ. फरीद कमर
कहीं चंबेली की शाख रोपी, कहीं गुलाब बोए,
यही वो मौसम है जिसमें हमने तुम्हारी आंखों में ख़्वाब बोए।
वसीम मज़हर
वहमो-गुमां के रास्ते इतने तवील थे,
दुनिया मेरे यक़ीन से बाहर निकल गई।
फुरक़ान फरहान
कभी तन्हाई में जब आंख से आंसू निकलता है,
तो दुनिया यह समझती है कोई जुगनू निकलता है।
बड़ी संख्या में जुटे साहित्य प्रेमी
कार्यक्रम में शहर के अनेक साहित्यकार, शिक्षाविद, शोधार्थी और साहित्य प्रेमी उपस्थित रहे। प्रमुख रूप से सिद्दीकी मजाज़, सरवत जमाल, मुहम्मद उमर, सैयद पीरज़ादा मीर मेहदी, मुहम्मद जहांगीर, मोहम्मद अली, अयान, एलिजा, सुमेरा, साजिया, अरमान, आशुतोष, आशीष कुमार, अब्दुल वाली, डॉ. मुहम्मद अशरफ़, सैयद नजमुल हसन, मोहम्मद शोएब सहित बड़ी संख्या में लोग कार्यक्रम में शामिल हुए।
कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. अशफाक अहमद उमर ने किया, जबकि अंत में डॉ. दरख्शां ताजवर ने सभी अतिथियों, प्रतिभागियों और उपस्थित जनों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया।
हिंदी-उर्दू की साझा विरासत को मिला नया आयाम
पूरे आयोजन में वक्ताओं ने एक स्वर से इस बात पर बल दिया कि हिंदी और उर्दू केवल भाषाएं नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति की साझा धरोहर हैं। वफ़ा गोरखपुरी जैसे साहित्यकार दोनों भाषाओं के बीच सेतु का कार्य कर रहे हैं। संगोष्ठी और मुशायरे ने न केवल साहित्यिक विमर्श को नई दिशा दी, बल्कि सामाजिक सौहार्द, सांस्कृतिक एकता और गंगा-जमुनी तहज़ीब के संदेश को भी मजबूती प्रदान की।
रिपोर्ट- अमरेंद्र पांडेय, गोरखपुर



