चुनाव आयुक्त केस में सरकार की नई चाल? बड़ी बेंच की मांग से बढ़ी हलचल
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच में 28 सुनवाई हो चुकी है.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच में 28 सुनवाई हो चुकी है.
अब सरकार ने इसे बड़ी बेंच में ट्रांसफर की मांग की है. सरकार का कहना है कि यह एक संवैधानिक मसला है.
चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के मामले में सुप्रीम कोर्ट और सरकार के बीच जोरदार बहस हुई है. गुरुवार (30 जुलाई) को जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच में इस मामले में सुनवाई हुई. सुनवाई के दौरान सरकार की तरफ से अटॉर्नी जरनल आर वेंकटरमणी और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश हुए. दोनों ने सुनवाई के दौरान इस बात पर जोर दिया कि इस केस को बड़ी बेंच में भेजा जाए.
मेहता ने कहा कि यह एक संवैधानिक मामला है, जिस पर बड़ी बेंच में सुनवाई जरूरी है. इस दौरान मेहता ने अनुच्छेद 145 (3) का हवाला दिया. वहीं याचिकाकर्ता की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकील विजय हंसरिया ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाया. हंसरिया ने कहा कि सरकार ने 28वें दिन की सुनवाई में केस ट्रांसफर की मांग की है. सरकार की मंशा गलत है.
डॉक्टर जया गुप्ता और एडीआर ने 2023 में सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका दाखिल की थी. इसमें कहा गया था कि सरकार ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर जो कानून बनाए हैं, उसमें सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को नहीं रखा गया है. एडीआर की तरफ से प्रशांत भूषण पेश हुए.
सरकार केस को बड़ी बेंच में ट्रांसफर क्यों चाहती है?
1. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि अनुच्छेद 324 (2) के तहत संसद को चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए कानून बनाने का अधिकार है. इसी तरह अनुच्छेद 327 औ 324 एक दूसरे के पूरक हैं. यह एक संवैधानिक मामला है, जिसे सिर्फ 5 जजों की बेंच ही सुन सकती है.
2. तुषार मेहता ने आगे कहा कि प्रधानमंत्री अगर किसी को चुनेंगे और वो गलत करेगा, यह सवाल नहीं उठना चाहिए. उनकी पवित्रता पर शक नहीं किया जाना चाहिए. प्रधानमंत्री कार्यपालिका के प्रमुख हैं. वे विधायिका के प्रति भी जिम्मेदार हैं.
3. मेहता ने आगे दलील दीं कि जज ही जज को चुनते हैं और इस पर पूरा देश विश्वास करता है. यह नहीं कहा जा सकता है कि जज ने जो जज को चुना वो गलत है. तुषार मेहता की इस दलील पर जस्टिस दीपांकर दत्ता ने भी तल्ख टिप्पणी की. दत्ता ने कहा कि आप यह बता सकते हैं कि देश में कितने दागी मंत्री हैं?
इस दौरान सरकार ने 2023 के अनूप वर्णवाल केस का हवाला दिया. सरकार ने कहा कि इस मामले की सुनवाई 5 जजों की बेंच में हुई थी, जिसने फैसला दिया था कि संसद को कानून बनाने का अधिकार है. अगर इस मामले का किसी तरह का उल्लंघन हुआ है, तो 5 जजों की बेंच के सामने ही इसे रखा जाना चाहिए.
5. हालांकि, एक एंगल 2029 का चुनाव भी है. सीनियर एडवोकेट विजय हंसरिया के मुताबिक 28 सुनवाई के बाद सरकार ने इसे ट्रांसफर के लिए कहा है. हंसरिया ने कहा कि अभी पुरानी व्यवस्था चल रही है, जिसमें चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, उनके द्वारा चुना हुआ कैबिनेट मंत्री और नेता प्रतिपक्ष कर रहे हैं.
6. 2029 का लोकसभा चुनाव मार्च में प्रस्तावित है. उससे पहले मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार (जनवरी 2029) और चुनाव आयुक्त सुखबीर संधू (जुलाई 2028) में रिटायर हो रहे हैं. अगर यह केस बड़ी बेंच को भेजा जाता है. मामले की सुनवाई में वक्त लग सकता है. ऐसे में सरकार अभी की प्रक्रिया से ही चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति कर सकती है.
सुनवाई के आखिर में जस्टिस दत्ता ने कहा कि जैसे यह कहावत है—”न्याय सिर्फ होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए”—उसी तरह पारदर्शी नियुक्ति सिर्फ होनी ही नहीं चाहिए, बल्कि होती हुई दिखनी भी चाहिए. दत्ता ने सभी पक्षों से लिखित हलफनामा देने के लिए कहा है. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट इस फैसला सुनाएगा.



