जेन जी गुमराह… या बदलाव की चाह ?
जेन जी को गुमराह बता कर फंस गये पीएम मोदी

- क्या हम किसी एक वायरल घटना के आधार पर पूरी पीढ़ी का मूल्यांकन कर सकते हैं?
- गुमराह या जागरूक? जेन-जी पर छिड़ी बहस सिर्फ एक बयान की नहीं, पूरे दौर की कहानी है
- कुछ युवाओं की गलती करोड़ों युवाओं की पहचान नहीं बन सकती
- बयान के खिलाफ युवओं में उबाल वीडियो जारी कर पीएम ने की थी टिप्पणी
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जंतर-मंतर की घटनाओं पर प्रतिक्रिया देते हुए एक वीडियो संदेश जारी किया है। विडियो संदेश में उन्होंने कहा है कि अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने वाले युवा गुमराह बच्चे हैं। उन्होंने जेन जी को दंड के बजाए उन्हें माफ कर देने और उनमें सुधार पैदा करने की बात कही है। पीएम मोदी ने सजा की जगह संवाद और सुधार पर जोर दिया है।
वहीं खुद को गुमराह का टाइटल मिलने से जेन जी का गुस्सा उबाल पर आना शुरू हो गया है और सोशल मीडिया पर वह खुद को जागरूक बेबाक और लोकतंत्र की नई आवाज बता रहे हैं। वीडियो अपलोड होने के बाद गुमराह शब्द ने एक व्यापक सार्वजनिक बहस को जन्म दे दिया है। और सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह टिप्पणी कुछ लोगों तक सीमित थी या इससे पूरी जेन जी को लेकर एक धारणा बनती है?
अपने वीडियो संदेश में क्या कहा है पीएम मोदी ने?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने आधिकारिक इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक वीडियो संदेश साझा करते हुए जंतर मंतर पर हुई घटना पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि जंतर-मंतर पर जो कुछ भी हुआ उसे पूरे देश और दुनिया ने देखा। प्रधानमंत्री ने कहा कि कुछ शरारती बच्चों ने बेहद अभद्र और असभ्य भाषा का प्रयोग किया जो किसी भी सभ्य समाज को शोभा नहीं देता। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि उन्हें व्यक्तिगत रूप से गालियां दी गईं और उनकी दिवंगत माता के लिए भी अत्यंत आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया गया। उन्होंने कहा कि घटना का स्वरूप बेहद दुखद था लेकिन वह इस मुद्दे पर किसी के प्रति कटुता नहीं बल्कि सुधार और सकारात्मक सोच के साथ बात करना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि बचपन में गलतियां होना स्वाभाविक है और बचपन की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि उसमें गलतियों को सुधारने का अवसर भी होता है। उन्होंने कहा कि समाज के भीतर इस घटना को लेकर जो आक्रोश है उसे वह भली भांति समझ सकते हैं। उनके अनुसार यह एक कल्चरल शॉक है कि देश की बेटियां इस प्रकार की भाषा का प्रयोग कर सकती हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि यह समय इन बच्चों को गले लगाकर उन्हें सही रास्ता दिखाने का है। उन्होंने कहा कि यह गुमराह बच्चे हैं और उन्हें सही दिशा देना पूरे समाज की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि इन बच्चों को सजा देना अदालतों के चक्कर कटवाना या समाज में प्रताडि़त करना परिस्थितियों को नहीं बदल सकता। उन्होंने कहा कि मैं उन्हें माफ करना चाहता हूं। समाज भी मेरी इस भावना को स्वीकार करे क्योंकि मेरे मन में एक ही भाव है। कभी कभी दांतों तले हमारी जीभ आ जाती है खून भी निकल आता है लेकिन हम दांत नहीं तोड़ते क्योंकि दांत भी हमारे हैं जीभ भी हमारी है और बच्चे भी हमारे हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि गुमराह लोगों को सही राह दिखाना आसान काम नहीं होता लेकिन कठिन कार्यों को ही करने का संकल्प लेना चाहिए।
क्या सिर्फ जेन जी गालीबाज है?
यह भी सच है कि सोशल मीडिया ने संवाद की संस्कृति को बदला है। त्वरित प्रतिक्रिया, ट्रोलिंग, वायरल क्लिप और एल्गोरिदम अक्सर भाषा को अधिक आक्रामक बना देते हैं। यह समस्या केवल जेन जी तक सीमित नहीं है गौर से देखे और विषलेशण करें तो आप राजनीति मनोरंजन की दुनिया और मीडिया समेत समाज के दूसरे सेक्टर में भी ऐसा ही माहौल पाएंगे। जेन जी ने जिस भाषा का इस्तेमाल किया है और उसे आलोचना का शिकार होना पड़ा रहा है और गुमराह बच्चों के टाइटल से दोचार होना पड़ रहा है। दरअस्ल जो वह कर रहे हैं जैसा वह कह रहे हैं वह सबकुछ उन्होंने टीवी पर राजनीति में और मीडिया में देखा है। चैनल की डिबेट किस स्तर पर पहुंच चुकी है। चुनावी रैलियों और भाषणों में नेताओं के वक्तव्यों का क्या स्तर है यह सभी को पता है। तो फिर आमर्यादित भाषा के लिए गुमराह सिर्फ जेन जी को क्यों कहा जाए क्या हम सब गुमराह नहीं। संबंधित खबरें 8 पर भी
जेन जी की समस्याओं पर देना होगा ध्यान
युवाओं की वास्तविक चिंताओं पर भी ध्यान देना होगा। रोजगार कौशल विकास शिक्षा की गुणवत्ता प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता तकनीकी बदलाव कृत्रिम बुद्धिमत्ता का प्रभाव और मानसिक स्वास्थ्य यह वह विषय हैं जिन पर लगातार चर्चा होती रही है। यदि इन मुद्दों पर संवाद मजबूत होगा तो राजनीतिक संवाद भी अधिक रचनात्मक बन सकता है। पालिटिक्ल लीडरशिप की जिम्मेदारी केवल प्रेरित करना नहीं बल्कि सुनना भी है। उसी तरह नागरिकों की जिम्मेदारी केवल सवाल पूछना नहीं बल्कि मर्यादा बनाए रखना भी है। लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब सत्ता आलोचना को सुनती है और समाज आलोचना को सभ्य भाषा में व्यक्त करता है। इस पूरे घटनाक्रम ने एक और प्रश्न सामने रखा है कि क्या हम किसी एक वायरल घटना के आधार पर पूरी पीढ़ी का मूल्यांकन कर सकते हैं? किसी भी समाज में कुछ लोगों का व्यवहार पूरे समाज का प्रतिनिधित्व नहीं करता। उसी तरह कुछ युवाओं की गलती करोड़ों युवाओं की पहचान नहीं बन सकती।
जेन जी कंपनियां भी बना रही है और रिसर्च भी कर रही है
भारत की जेन जी विरोध भी करती है नवाचार भी करती है। यही पीढ़ी नई कंपनियां बना रही है शोध कर रही है खेलों में देश का प्रतिनिधित्व कर रही है सामाजिक अभियानों का नेतृत्व कर रही है और लोकतंत्र में सक्रिय भागीदारी निभा रही है। इसलिए उसकी तस्वीर एक रंग में नहीं बनाई जा सकती। आज आवश्यकता लेबल लगाने की नहीं संवाद बढ़ाने की है। यदि भाषा बिगड़ी है तो उसे सुधारा जाना चाहिए। यदि असहमति है तो उसे सुना जाना चाहिए। यदि भ्रम है तो तथ्य सामने रखे जाने चाहिए। और यदि भरोसा कम हुआ है तो उसे संवाद के माध्यम से ही मजबूत किया जा सकता है। शायद यही इस बहस का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष है। सवाल केवल यह नहीं कि जेन जी गुमराह है या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या भारत अपनी सबसे बड़ी युवा आबादी को सुनने समझने और उसके साथ मिलकर भविष्य बनाने के लिए तैयार है। लोकतंत्र की शक्ति इसी संतुलन में है जहां मर्यादा भी बनी रहे और सवाल पूछने की आजादी भी।
जेन जी बोले तो स्पष्ट सोच- समर्थन भी विरोध भी
भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में है। करोड़ों युवा उच्च शिक्षा, रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं, डिजिटल अर्थव्यवस्था और तेजी से बदलती सामाजिक परिस्थितियों के बीच अपना भविष्य बना रहे हैं। यही पीढ़ी देश की सबसे बड़ी कार्यशील आबादी भी है। इसलिए जब युवाओं के बारे में कोई व्यापक टिप्पणी होती है तो उसका असर केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहता वह समाज और नीति निर्माण तक जाता है। इसमें कोई विवाद नहीं कि व्यक्तिगत अपमान गाली गलौज और अभद्र भाषा सार्वजनिक जीवन में स्वीकार्य नहीं हो सकती। लोकतांत्रिक असहमति और व्यक्तिगत अपमान के बीच स्पष्ट रेखा होनी चाहिए। यदि कोई उस सीमा को पार करता है तो उसकी आलोचना स्वाभाविक है। लेकिन उतना ही जरूरी यह भी है कि असहमति को केवल भटकाव या गुमराही मान लेने से बचा जाए। आज की जेन जी पहले की पीढिय़ों से अलग है। यह इंटरनेट के साथ बड़ी हुई है। इसे सूचना तक तत्काल पहुंच मिली है। यह वैश्विक घटनाओं से तुरंत जुड़ जाती है। यह सरकारों की उपलब्धियों की सराहना भी करती है और कमियों पर सवाल भी उठाती है। यही पीढ़ी किसी नीति के समर्थन में अभियान चला सकती है और अगले ही दिन किसी दूसरी नीति का विरोध भी कर सकती है।




