टोल से 24,814 करोड़ की वसूली, फिर भी सड़कें बदहाल
देशभर में टोल टैक्स से 24,814 करोड़ की वसूली के बीच सड़कों की खराब हालत को लेकर सवाल उठ रहे हैं... कई जगह गड्ढों, अधूरे निर्माण...

4पीएम न्यूज नेटवर्कः गुजरात में टोल वसूली को लेकर एक बार फिर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है.. सवाल सिर्फ टोल टैक्स का नहीं है.. बल्कि उस सुविधा का है जिसके बदले यह पैसा जनता से लिया जाता है.. राज्य में टोल प्लाज़ाओं की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है.. पहले जहां गुजरात में 38 टोल प्लाजा थे.. वहीं अब इनकी संख्या बढ़कर 66 हो चुकी है.. इन टोल प्लाज़ाओं से अब तक करीब 24,814 करोड़ रुपये की वसूली की जा चुकी है..
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब हजारों करोड़ रुपये जनता से वसूले जा चुके हैं.. तब भी सड़कों की हालत इतनी खराब क्यों है.. आखिर लोग गड्ढों से भरी सड़कों पर सफर करने को क्यों मजबूर हैं.. अधूरी परियोजनाओं और खतरनाक डायवर्जनों के बीच भी पूरा टोल क्यों लिया जा रहा है.. यही सवाल अब आम आदमी पार्टी ने भी उठाया है.. आम आदमी पार्टी का कहना है कि यदि सड़क पूरी तरह तैयार नहीं है.. निर्माण कार्य चल रहा है या सड़क मरम्मत के अधीन है.. तो ऐसी स्थिति में टोल वसूली बंद कर देनी चाहिए। पार्टी का आरोप है कि.. जनता से सुविधा के नाम पर पैसा लिया जा रहा है.. लेकिन बदले में सुरक्षित और बेहतर सड़कें नहीं मिल रही हैं..
गुजरात देश का एक प्रमुख औद्योगिक और व्यापारिक राज्य है.. यहां से गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं.. दिल्ली-मुंबई कॉरिडोर, अहमदाबाद-वडोदरा एक्सप्रेसवे, सूरत-मुंबई मार्ग और कई अन्य हाईवे पर हर दिन लाखों वाहन गुजरते हैं.. भारी ट्रक, बसें, निजी कारें और व्यावसायिक वाहन इन सड़कों का लगातार इस्तेमाल करते हैं.. सरकार का कहना है कि टोल से मिलने वाली राशि का उपयोग सड़क निर्माण, रखरखाव, चौड़ीकरण.. और नई परियोजनाओं के लिए किया जाता है.. सुनने में यह व्यवस्था बिल्कुल सही लगती है.. लेकिन जब ज़मीन पर उतरकर इन सड़कों की स्थिति देखी जाती है.. तो तस्वीर कुछ और ही दिखाई देती है..
राज्य के कई हिस्सों में सड़क निर्माण का काम वर्षों से अधूरा पड़ा है.. कहीं फ्लाईओवर बन रहे हैं.. कहीं लेन बढ़ाने का काम चल रहा है.. और कई स्थानों पर लंबे समय से अस्थायी डायवर्जन बनाए गए हैं.. बरसात के मौसम में यही डायवर्जन सबसे बड़ी परेशानी बन जाते हैं.. कच्चे रास्ते कीचड़ में बदल जाते हैं.. गड्ढे पानी से भर जाते हैं और वाहन चालकों के लिए सफर जोखिम भरा हो जाता है.. इसके बावजूद टोल वसूली में कोई कमी नहीं आती.. चाहे सड़क पूरी बनी हो या आधी, चाहे गड्ढे हों या डायवर्जन, टोल पूरा लिया जाता है.. यही बात लोगों को सबसे ज्यादा परेशान करती है..
आज फास्टैग की वजह से टोल प्लाज़ा पर लंबी कतारें जरूर कम हुई हैं.. लेकिन लोगों के खाते से हर कुछ किलोमीटर पर पैसे कटते रहते हैं.. खासकर लंबी दूरी तय करने वाले ट्रक चालकों.. छोटे व्यापारियों, टैक्सी संचालकों और मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए यह खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है.. वहीं अब लोग पूछ रहे हैं कि आखिर 24,814 करोड़ रुपये कहां खर्च हुए.. अगर इतनी बड़ी राशि टोल के रूप में वसूली जा चुकी है.. तो सड़कें अब भी गड्ढों से क्यों भरी हैं.. निर्माण कार्य समय पर पूरा क्यों नहीं हो रहा.. और यदि सड़क अधूरी है.. तो जनता से पूरा शुल्क किस आधार पर लिया जा रहा है..
बरसात के दिनों में स्थिति और भी चिंताजनक हो जाती है.. सड़कों पर बने गड्ढे पानी से भर जाते हैं.. वाहन चालकों को उनकी गहराई का अंदाज़ा नहीं लग पाता.. कई बार अचानक वाहन गड्ढे में गिर जाता है.. जिससे दुर्घटना का खतरा बढ़ जाता है.. दोपहिया वाहन चालकों के लिए यह और भी खतरनाक साबित होता है.. यही कारण है कि लोगों का गुस्सा लगातार बढ़ रहा है.. सोशल मीडिया पर गड्ढों वाली सड़कों के वीडियो और तस्वीरें वायरल होती रहती हैं.. लोग सवाल पूछते हैं कि आखिर टोल का पैसा किस काम में लगाया जा रहा है.. यदि सड़कें सुरक्षित नहीं हैं, तो टोल वसूली का औचित्य क्या है..
आम आदमी पार्टी ने इसी मुद्दे को लेकर सरकार पर निशाना साधा है.. पार्टी का कहना है कि जनता पहले ही पेट्रोल और डीजल पर भारी टैक्स देती है.. जीएसटी और दूसरे कर भी चुकाती है.. इसके बाद भी अगर खराब सड़क पर अलग से टोल देना पड़े.. तो यह जनता के साथ न्याय नहीं है.. पार्टी की मांग है कि जिन सड़कों पर निर्माण कार्य चल रहा है.. जहां बड़े पैमाने पर गड्ढे हैं या जहां मरम्मत जारी है.. वहां टोल वसूली तत्काल रोकी जाए.. जब तक सड़क पूरी तरह सुरक्षित और उपयोग के योग्य न हो जाए.. तब तक यात्रियों से पूरा शुल्क नहीं लिया जाना चाहिए..
दरअसल, गुजरात में सड़क निर्माण का काम कई एजेंसियों के माध्यम से किया जाता है.. राष्ट्रीय राजमार्गों की जिम्मेदारी राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण यानी एनएचएआई के पास होती है.. वहीं कई परियोजनाएं निजी कंपनियों को भी दी जाती हैं.. इन कंपनियों को अनुबंध के अनुसार एक निश्चित अवधि तक टोल वसूलने का अधिकार मिलता है.. लेकिन कई बार परियोजनाएं समय पर पूरी नहीं हो पातीं.. निर्माण में देरी होती है, गुणवत्ता पर सवाल उठते हैं.. और रखरखाव भी अपेक्षित स्तर का नहीं होता.. इसके बावजूद टोल वसूली लगातार जारी रहती है.. यही व्यवस्था अब सवालों के घेरे में है..
विशेषज्ञों का भी मानना है कि टोल नीति में सुधार की आवश्यकता है.. यदि किसी सड़क का बड़ा हिस्सा निर्माणाधीन है या यात्रियों को पूरी सुविधा उपलब्ध नहीं है.. तो उस अवधि के लिए टोल में छूट या अस्थायी रोक जैसे विकल्पों पर विचार किया जाना चाहिए.. इससे जनता का भरोसा भी बढ़ेगा और निर्माण एजेंसियों की जवाबदेही भी तय होगी.. सिर्फ सड़क बनाना ही पर्याप्त नहीं है.. उसका नियमित रखरखाव भी उतना ही जरूरी है.. यदि बरसात के बाद हर साल सड़कें टूट जाती हैं.. और गड्ढों से भर जाती हैं.. तो इसका मतलब है कि निर्माण की गुणवत्ता और निगरानी दोनों पर सवाल उठते हैं..



