खरगे से इतनी नफरत ? हवन की आग से सियासत

- सदन में फूटा खरगे का गुस्सा बीजेपी आरएसएस पर आरोप
- खरगे की रैली के बाद शुद्धिकरण विवाद पर कांग्रेस का भाजपा-आरएसएस पर निशाना
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। हल्द्वानी के रामलीला मैदान में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की रैली के बाद हुए शुद्धिकरण हवन ने देश की राजनीति में आग लगा दी है। कांग्रेस सपा को बैठे बिठाए बड़ा मुददा मिल गया है तो बीजेपी ने इस पूरे कांड से दूरी बना कर जांच की बात कही है। कुल मिलाकर जाति धर्म और सामाजिक बराबरी की बहस के बीच एक बार फिर पूरे देश में सवाल उठ रहे हैं। कांग्रेस ने इसे दलित नेता के अपमान और जातिगत मानसिकता से जोड़ा है। खरगे बोले तो वह लोकतंत्र का मंच था लेकिन खरगे के जाते ही वही मंच अशुद्ध कैसे हो गया हल्द्वानी के रामलीला मैदान में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की रैली के दो दिन बाद हुए शुद्धिकरण हवन ने देश की राजनीति में ऐसा सवाल खड़ा कर दिया है जिसका जवाब सिर्फ भाजपा या कांग्रेस से नहीं बल्कि पूरे समाज से मांगा जाना चाहिए। सवाल यह नहीं कि हवन में कितना घी डाला गया और गंगाजल कितना छिड़का गया सवाल यह है कि आखिर किस चीज को अशुद्ध माना गया। एक राजनीतिक कार्यक्रम को? एक नेता के भाषण को? या उस नेता की सामाजिक पहचान को? कांग्रेस इसे दलित विरोधी मानसिकता का प्रतीक बता रही है जबकि भाजपा ने आयोजन से अपना पल्ला झाड़ लिया है। लेकिन विवाद यहीं खत्म नहीं होता। क्योंकि जिस देश के संविधान ने छुआछूत को अपराध घोषित कर बराबरी का अधिकार दिया उसी देश में अगर किसी नेता की सभा के बाद मंच को शुद्ध करने की जरूरत महसूस की जाती है तो यह सिर्फ हल्द्वानी के एक मैदान की कहानी नहीं रह जाती। यह उस मानसिकता पर बहस बन जाती है जो 21वीं सदी के भारत में भी किसी इंसान की मौजूदगी को पवित्रता और अपवित्रता के तराजू पर तौलने की कोशिश करती है।
बीजेपी के सामने दोहरी चुनौती
इस विवाद ने भाजपा के सामने असहज स्थिति पैदा कर दी है। बीजेपी की पहली चुनौती है घटना से अपना संबंध स्पष्ट करना दूसरी चुनौती है अगर पार्टी इस घटना से असहमत है तो यह साफ करना कि क्या वह इसे सामाजिक रूप से भी गलत मानती है और क्या किसी स्तर पर कार्रवाई या जांच होगी। क्योंकि राजनीति में सिर्फ यह कहना कि हमारा इससे कोई लेना देना नहीं हमेशा पर्याप्त नहीं होता। खासकर तब जब विवाद किसी संवेदनशील सामाजिक मुद्दे से जुड़ जाए। जेपी नड्डा की ओर से ऐसे किसी कृत्य का समर्थन न करने और जांच की बात सामने आना इसी दबाव का संकेत माना जा सकता है।
सड़क से सदन में मामला पहुंचा
यह पूरा प्रकरण अब संसद तक पहुंच चुका है खडग़े ने राज्यसभा में इसे अपना अपमान बताते हुए सवाल उठाया है। यानी हल्द्वानी का हवन अब सिर्फ धुआं नहीं छोड़ रहा बल्कि? उसकी राख से भारतीय राजनीति का सबसे पुराना और सबसे असहज सवाल फिर उठ खड़ा हुआ है। भारतीय धार्मिक परंपराओं में शुद्धि या शुद्धिकरण के अनेक संदर्भ मिलते हैं। कई धार्मिक परिस्थितियों में गंगाजल, हवन और अन्य कर्मकांड सामान्य धार्मिक आस्था का हिस्सा हैं। इसलिए केवल शुद्धिकरण शब्द अपने आप में किसी व्यक्ति के अपमान का प्रमाण नहीं है। लेकिन राजनीति में संदर्भ अर्थ बदल देता है। अगर किसी धार्मिक स्थल में किसी परंपरा के तहत शुद्धिकरण हो तो उसका अर्थ अलग होगा। अगर किसी राजनीतिक सभा के बाद उसी सभा स्थल पर शुद्धिकरण किया जाए और आयोजक इसे उस सभा में हुई किसी गतिविधि से जोड़ें तो उसका राजनीतिक अर्थ अलग बन सकता है। और अगर उस राजनीतिक सभा में देश का एक प्रमुख दलित नेता मौजूद रहा हो तो जातिगत सवाल अपने आप चर्चा में आ जाता है। इसीलिए कांग्रेस ने इस घटना को हाथों हाथ लिया।
राजनीति के बेहद निचले स्तर को दर्शाता है यह प्रकरण
कांग्रेस सांसद राजीव शुक्ला ने इस घटना को बेहद गलत और निंदनीय बताया। उन्होंने कहा कि अगर खरगे जैसे दलित नेता किसी बैठक या राजनीतिक कार्यक्रम को संबोधित करते हैं और उसके बाद शुद्धिकरण की रस्म की जाती है, तो यह राजनीति के बेहद निचले स्तर को दर्शाता है। उन्होंने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से इस मामले पर स्पष्ट बयान देने की मांग की। कांग्रेस सांसद अमन सिंह ने आरोप लगाया कि आरएसएस और भाजपा की सोच समाज में अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति और ओबीसी वर्गों की भागीदारी को स्वीकार नहीं करने वाली है। वहीं इमरान प्रतापगढ़ी ने कहा कि खडग़े देश के बड़े दलित नेताओं में हैं और लंबे संसदीय जीवन में उन्होंने देश की सेवा की है। उन्होंने भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन और प्रधानमंत्री से सवाल किया कि खडग़े के कार्यक्रम के बाद शुद्धिकरण क्यों किया गया।
चुनावी उत्तराखंड में जाति का सवाल
इस पूरे विवाद को उत्तराखंड की राजनीति के संदर्भ में भी देखना होगा। राज्य की राजनीति में धर्म पहचान क्षेत्रीय अस्मिता और सामाजिक समीकरण पहले से महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। अब शुद्धिकरण विवाद ने उसमें जाति और सामाजिक बराबरी की नई परत जोड़ दी है। कांग्रेस के लिए यह मौका है कि वह भाजपा पर दलित और पिछड़े वर्गों के सवाल पर घेरा कसने की कोशिश करे। भाजपा के लिए चुनौती यह है कि वह इस विवाद को कांग्रेस के राजनीतिक हथियार में बदलने से रोके। और इस पूरी लड़ाई के बीच उत्तराखंड सरकार को जवाब देना होगा कि उसकी नजर में इस घटना की प्रकृति क्या है। यही कारण है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से बयान की मांग सिर्फ औपचारिक राजनीतिक मांग नहीं रह गई है। भाजपा समर्थक इसे कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति कह सकते हैं। कांग्रेस इसे दलित सम्मान का सवाल बता सकती है। लेकिन इन दोनों राजनीतिक दावों के बीच एक बड़ा सामाजिक प्रश्न खड़ा है। भारत ने संविधान के जरिए समानता को अपना मूल मूल्य स्वीकार किया। छुआछूत के खिलाफ संवैधानिक व्यवस्था बनाई गई। राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय की पूरी बहस इसी विचार के आसपास विकसित हुई कि किसी इंसान की गरिमा उसके जन्म से तय नहीं हो सकती। ऐसे में जब किसी दलित नेता के राजनीतिक कार्यक्रम के बाद शुद्धिकरण की खबर आती है तो समाज में बेचैनी होना स्वाभाविक है।




