फिल्म ‘सहिया’ के समर्थन में उतरे खास से आम लोग

  • निर्माता-निर्देशक केलिए सोशल मीडिया में उभरे स्वर
  • सरकार व सेंसर बोर्ड पर लोगों ने उठाए सवाल

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। फिल्म सहिया की स्क्रीनिंग में देरी पर आम से लेकर खास लोगों ने सरकार व केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए है।
सोशल मीडिया में फिल्म और निर्माता निर्देशक केसमर्थन की बाढ़ आ गई है। सब लोग ऐसा लग रहा है सहिया की बहिया थामने को बेताब हैं। सभी एक सुर में उसको तुरंत प्रमाणन देने की मांग कर रहे हैं। लोगों को कहना है कि एक प्रेम कहानी को सरकार सबको देखने दे।

सहिया’ एक ऐसी फिल्म लग रही है, जिसका इंतजार किया जा सकता है। झारखंड के नेतरहाट की खूबसूरत वादियों में बनी यह फिल्म एक पारिवारिक और मानवीय प्रेम कहानी है। नीरज काबी, शांतनु माहेश्वरी और रिंकू राजगुरु जैसे शानदार कलाकार इसमें नजर आएंगे। फिल्म के संगीत और गीतों में स्वानंद किरकिरे जैसे बेहतरीन कलाकार का जुडऩा इसे और खास बनाता है। लेकिन सेंसर प्रक्रिया में हो रही देरी पर सवाल उठना भी जरूरी है। अगर फिल्म में नक्सलवाद का प्रचार नहीं है, तो फैसला जल्द और साफ तरीके से होना चाहिए। अच्छी कहानी को दर्शकों तक पहुंचने का मौका मिलना चाहिए। ‘सहिया’ का इंतजार है।
रागा फॉर इंडिया

फिल्म इंडस्ट्री समय से चलती है। रिलीज डेट, थिएटर, प्रमोशन, ओटीटी डील – सब एक कैलेंडर पर निर्भर है। सहिया की डेढ़ महीने की देरी ने वो पूरा कैलेंडर बिगाड़ दिया। अब न पुरानी प्लानिंग काम की, न नया बजट। इसका खामियाजा सिर्फ निर्माता नहीं, बल्कि स्वानंद किरकिरे समेत पूरी टीम भुगत रही है।
रितेश देशमुख

हर दिन की देरी का मतलब है ब्याज का बढऩा, कर्ज का बढऩा, और उम्मीदों का टूटना। साहिया के निर्माताओं ने अपनी पूरी पूंजी इस फिल्म में लगाई है। लेकिन रिलीज न होने के कारण रिकवरी रुकी हुई है। क्या सरकार और सीबीएफसी इस आर्थिक नुकसान की भरपाई करेंगे? या फिर फिल्ममेकर को खुद ही इस लड़ाई को लडऩा होगा?
अंशु पटेल

हम अक्सर कहते हैं कि रीजनल सिनेमा को बढ़ावा मिलना चाहिए। सहिया उसी दिशा में एक कदम थी। झारखंड की कहानी, झारखंड की लोकेशन, झारखंड के कलाकार। लेकिन जब ऐसी फिल्में ही सिस्टम में उलझ जाएंगी तो नए फिल्ममेकर हिम्मत कैसे करेंगे? संजय शर्मा आज अकेले नहीं लड़ रहे, वो पूरी इंडस्ट्री की आवाज बन गए हैं।
कल्पना

सीबीएफसी का काम फिल्मों को प्रमाणित करना है, उन्हें रोकना नहीं। लेकिन सहिया के केस में लग रहा है कि प्रक्रिया ही सबसे बड़ी बाधा बन गई है। न कोई कारण बताया जा रहा है, न कोई समय-सीमा। फिल्ममेकर अंधेरे में हैं। अगर एक प्रियोरिटी फिल्म के साथ ऐसा हो सकता है तो फिर सिस्टम पर भरोसा कैसे करें?
ललित ज्याणी

फिल्म इंडस्ट्री में टाइमिंग सब कुछ होती है। फेस्टिवल डेट, छुट्टियां, थिएटर की उपलब्धता – सब पहले से तय होता है। सहिया की डेढ़ महीने की देरी ने पूरी मार्केटिंग और रिलीज प्लान बिगाड़ दिया। अब न पुरानी डेट काम की, न नया प्रमोशन। इसका सीधा असर फिल्म के बिजनेस और टीम के मनोबल पर।
दीना देवी

नेतरहाट को राष्ट्रीय स्क्रीन पर लाने का मौका सहिया के पास था। झारखंड की संस्कृति, प्रकृति और लोगों की कहानी देश देख सकता था। स्वानंद किरकिरे की आवाज से सजी इस फिल्म को प्रक्रिया की सुस्ती ने रोक दिया। क्या हम रीजनल सिनेमा की बात करते हुए उसकी रिलीज को ही अटका देंगे?
निधि

फिल्म सहिया की सेंसर प्रक्रिया में हो रही देरी पर निर्माता-निर्देशक संजय शर्मा ने सीबीएफसी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि फिल्म के लिए प्रियोरिटी श्रेणी में आवेदन किया गया था, लेकिन निर्धारित समय-सीमा के बजाय करीब डेढ़ महीने बाद स्क्रीनिंग हुई।
मनमोहन सिंह, कमेंट्री

प्रायोरिटी कैटेगरी (प्राथमिकता श्रेणी) के तहत आवेदन करने वाली एक फिल्म को हफ्तों की देरी के बाद भी सर्टिफिकेशन का इंतजार है। अगर कोई आपत्ति है, तो उसे नियमों के दायरे में रहकर और पारदर्शी तरीके से सुलझाया जाना चाहिए, न कि अंतहीन इंतजार करवाकर। फिल्ममेकर्स एक निष्पक्ष और समय-सीमा के भीतर होने वाली सर्टिफिकेशन प्रक्रिया के हकदार हैं।
महुआ मोइत्रा, फैन्स

लड़ाई समय की है

प्रोड्यूसर और डायरेक्टर संजय शर्मा कि शिकायत को सिर्फ फिल्म को सेंसर ने रोक दिया के रूप में देखना शायद इस कहानी को छोटा कर देना होगा। असल संकट समय का है फिल्म की रिलीज रणनीति समय पर टिकी होती है मार्केटिंग समय पर टिकी होती है थिएटर समय पर मिलते हैं कलाकारों की उपलब्धता भी समय पर निर्भर करती है और पैसा भी समय के साथ खर्च होता है। इसलिए अगर रिलीज प्रक्रिया में देरी होती है तो नुकसान सिर्फ एक तारीख का नहीं होता। नुकसान पूरी रिलीज स्ट्रेटेजी का होता है।

सहिया एक मानवीय कहानी है। इसमें नफरत नहीं, प्रेम है। इसमें हिंसा नहीं, रिश्ते हैं। ऐसी फिल्मों की आज सबसे ज्यादा जरूरत है। लेकिन दुर्भाग्य है कि ऐसी फिल्म ही सिस्टम की सुस्ती का शिकार बन गई। अगर हम अच्छी कहानियों को समय पर दर्शकों तक नहीं पहुंचाएंगे तो फिर सिनेमा का भविष्य क्या होगा?
वर्मा जी

सहिया एक मानवीय कहानी है। इसमें नफरत नहीं, प्रेम है। इसमें हिंसा नहीं, रिश्ते हैं। ऐसी फिल्मों की आज सबसे ज्यादा जरूरत है। लेकिन दुर्भाग्य है कि ऐसी फिल्म ही सिस्टम की सुस्ती का शिकार बन गई। अगर हम अच्छी कहानियों को समय पर दर्शकों तक नहीं पहुंचाएंगे तो फिर सिनेमा का भविष्य क्या होगा?
वर्मा जी

संजय शर्मा अकेले नहीं हैं। हर साल सैकड़ों फिल्ममेकर सीबीएफसी की धीमी प्रक्रिया से जूझते हैं। साहिया सिर्फ एक उदाहरण है। स्वानंद किरकिरे जैसे प्रतिष्ठित कलाकार भी इस देरी से प्रभावित हैं। इसलिए इस मुद्दे को गंभीरता से लेना जरूरी है।
अकरम

सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं है, ये एक उद्योग है। इसमें पैसा लगता है, समय लगता है और सैकड़ों लोगों की रोजी-रोटी जुड़ी होती है। स्रहिया के साथ भी यही हुआ। शूटिंग नेतरहाट में हुई, पोस्ट प्रोडक्शन पूरा हुआ, प्रमोशन की प्लानिंग बनी। लेकिन सीबीएफसी की सुस्त प्रक्रिया ने सब रोक दिया। प्रियोरिटी में जमा करने के बाद भी 45 दिन बाद स्क्रीनिंग और अब महीनों से कोई अपडेट नहीं। संजय शर्मा का सवाल जायज है – अगर सिस्टम खुद अपने नियमों का पालन नहीं करेगा तो फिल्ममेकर किस पर भरोसा करेंगे?
सौरभ बक्शी

केआरके साहिया के पक्ष में उतरे

केआरके (कमाल आर खान) ने 4PM न्यूज नेटवर्क के संस्थापक संजय शर्मा की फिल्म सहिया और सेंसर बोर्ड (सीबीएफसी) के विवाद पर सोशल मीडिया (एक्स/ट्विटर) पर यह टिप्पणी की कि सेंसर बोर्ड ने फिल्म को सीधे सर्टिफिकेट देने से मना कर दिया है और इसे रिव्यू कमेटी के पास भेज दिया है। केआरके के अनुसार, सेंसर बोर्ड का यह आरोप है कि इस फिल्म में कथित तौर पर नक्सलियों को बढ़ावा दिया जा रहा है या उनका समर्थन किया जा रहा है, जबकि फिल्म के निर्माता-निर्देशक संजय शर्मा ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज किया है। केआरके ने दावा किया कि फिल्म रिलीज के लिए तैयार थी, लेकिन सीबीएफसी ने इसे अनुमति देने के बजाय समीक्षा समिति को सौंप दिया। केआरके की पोस्ट के मुताबिक, फिल्म पर यह सवाल उठाया गया है कि इसकी कहानी में नक्सली समस्याओं को इस तरह दिखाया गया है जिससे वे प्रोत्साहित होते हैं।

‘सहिया’ की रिलीज अटकी?

CBFC की प्रतिक्रिया पर फिल्ममेकर संजय शर्मा ने उठाए सवाल फिल्म सहिया के निर्माता-निर्देशक संजय शर्मा ने सीबीएफसी पर सर्टिफिकेशन प्रक्रिया में देरी का आरोप लगाया है उनका कहना है कि फिल्म नक्सलवाद पर आधारित नहीं है।

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