71 हजार हेक्टेयर जंगल हुआ साफ, अब गांवों में क्यों पहुंच रहे बाघ?
भारत में विकास परियोजनाओं के लिए 3 साल में 71 हजार हेक्टेयर से ज्यादा वन वन भूमि में कमी आई है.इसके चलते जंगलों से लगें गांवों में बाघों का हमला भी बढ़ा है, जिससे इसी 3 सालों में 233 मौतें भी हुईं.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: भारत में विकास परियोजनाओं के लिए 3 साल में 71 हजार हेक्टेयर से ज्यादा वन वन भूमि में कमी आई है.इसके चलते जंगलों से लगें गांवों में बाघों का हमला भी बढ़ा है, जिससे इसी 3 सालों में 233 मौतें भी हुईं.
भारत में विकास की रफ्तार बढ़ रही है, लेकिन इसकी कीमत जंगलों को भी चुकानी पड़ रही है. सड़क, रेलवे, खनन, बिजली और सिंचाई जैसी परियोजनाओं के लिए लगातार वनभूमि का डायवर्जन यानी इस्तेमाल हो रहा है.
केंद्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, 1 अप्रैल 2023 से 31 मार्च 2026 के बीच देश में 71,023.30 हेक्टेयर वन भूमि को गैर-वन कार्यों के लिए मंजूरी दी गई. इसका अर्थ हुआ कि तीन सालों में हीकरीब 710 वर्ग किलोमीटर वन भूमि को दूसरे इस्तेमाल के लिए मंजूरी मिली.
घटती वनभूमि का असर वन्यजीवों पर पड़ रहा है.देश के कई हिस्सों में इंसान और बाघ के बीच संघर्ष बढ़ता दिखाई दे रहा है. हालांकि,वन भूमि डायवर्जन को बाघों के हमलों की एकमात्र वजह नहीं कहा जा सकता है. लेकिन जंगलों का बंटना, बाघों के कॉरिडोर में मानवीय गतिविधियां बढ़ना और जंगल के आसपास आबादी का फैलाव मानव-बाघ संघर्ष की आशंकाओं को जरूर बढ़ा रहे हैं.
बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले में वाल्मीकि टाइगर रिजर्व (VTR) के पास हाल ही में 17 दिनों के भीतर बाघ के हमलों में 3 लोगों की जान चली गई है. इन घटनाओं से स्थानीय ग्रामीणों में भारी दहशत और आक्रोश का माहौल है. पीलीभीत टाइगर रिजर्व क्षेत्र में गन्ने के खेतों और जंगलों के पास वन्यजीव के हमलों में लगातार जानें गई हैं. हर दूसरे-तीसरे महीने यहां बाघ के हमले की घटनाएं सामने आती रही हैं.
किस राज्य में सबसे ज्यादा वन भूमि का डायवर्जन है?
मध्य प्रदेश में गैर-वन कामों के लिए वन भूमि मंजूर हुई. यहां 19,432.14 हेक्टेयर वन भूमि का डायवर्जन हुआ. फिर ओडिशा में 8,965.71 हेक्टेयर, अरुणाचल प्रदेश में 7,334.87 हेक्टेयर, झारखंड में 5,409.56 हेक्टेयर.छत्तीसगढ़ में 4,218.95 हेक्टेयर और उत्तर प्रदेश में भी 3,390.87 हेक्टेयर वन भूमि को गैर-वन कार्यों के लिए इस्तेमाल
किन तरह की परियोजनाओं में सबसे ज्यादा वन भूमि का इस्तेमाल?
खनन परियोजनाओं के लिए 16,463.28 हेक्टेयर वन भूमि मंजूर हुई. हाइडल और सिंचाई परियोजनाओं के लिए 14,294.41 हेक्टेयर. सड़क निर्माण के लिए 12,714.93 हेक्टेयर वन भूमि का डायवर्जन हुआ. बिजली ट्रांसमिशन लाइनों के लिए 7,711.55 हेक्टेयर. रक्षा परियोजनाओं के लिए 6,276.01 हेक्टेयर और रेलवे के लिए 3,887.71 हेक्टेयर वन भूमि मंजूर की गई.
किस साल बाघ के हमलों में कितनी मौतें?
बाघ के हमलों से हुई मौतों की बात करें तो साल 2020 में कुल 51 लोगों की मौत हुई, साल 2021 में भी 51 लोगों की मौत हुई साल 2022 में यह संख्या बढ़कर 109 हो गई, साल 2023 में 88 मौतें दर्ज की गईं, साल 2024 में 74 मौतें हुईं और साल 2025 में 71 लोगों की जान गई.यानी पांच साल में सबसे ज्यादा मौतें 2022 में हुईं.इस आंकड़े में महाराष्ट्र सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य रहा. 2021 से 2025 के बीच राज्य में बाघों के हमलों से 231 लोगों की मौत हुई.
साल 2021 से 2025 के बीच बाघों के हमले से किस राज्य में कितनी मौतें?
असम: 4 मौतें
बिहार: 17 मौतें
छत्तीसगढ़: 4 मौतें
झारखंड: 0 मौतें
कर्नाटक: 11 मौतें
केरल: 7 मौतें
मध्य प्रदेश: 39 मौतें
महाराष्ट्र: 231 मौतें
मिजोरम: 0 मौतें
ओडिशा: 0 मौतें
राजस्थान: 6 मौतें
तमिलनाडु: 2 मौतें
तेलंगाना: 3 मौतें
उत्तर प्रदेश: 52 मौतें
उत्तराखंड: 10 मौतें
पश्चिम बंगाल: 7 मौतें
गांवों में क्यों घुस रहे हैं बाघ?
विशेषज्ञों का कहना है कि बाघ और इंसान एक-दूसरे के करीब आ रहे हैं, ऐसे में दोनों के बीच संघर्ष में भी इजाफा हुआ है. दरअसल,बाघों को रहने, घूमने और शिकार करने के लिए बड़े क्षेत्र की जरूरत होती है. जंगल के बड़े हिस्से को सड़क, रेलवे, खनन या दूसरी परियोजनाओं में इस्तेमाल करने से प्राकृतिक आवास कई बार छोटे-छोटे हिस्सों में बंट जाता है. इसे हैबिटेट फ्रैगमेंटेशन कहा जाता है.
ऐसे में समस्या सिर्फ पेड़ों की संख्या कम होने की नहीं होती. जंगल के अलग-अलग हिस्सों को जोड़ने वाले वन्यजीव कॉरिडोर भी इससे प्रभावित होते हैं. बाघ एक इलाके से दूसरे इलाके में भोजन, पानी, प्रजनन या अपना क्षेत्र तलाशने के लिए जाते हैं. जब उनके रास्ते में सड़क, रेलवे लाइन, खदान या मानव बस्ती आ जाती है तो इंसान और बाघ का सामना होने की संभावना बढ़ जाती है.यही वजह है कि जंगल के किनारे बसे गांवों में बाघों के आने की घटनाएं कई बार सामने आती हैं.
पौधारोपण के जरिए वनीकरण का कितना फायदा?
हालांकि, सरकार वनभूमि को परियोजनाओं में इस्तेमाल को लेकर एक तर्क यह भी देती है कि पौधारोपण के जरिए वनीकरण भी अलग से कराया जा रहा है.पिछले पांच साल में 1,78,261.52 हेक्टेयर क्षेत्र में प्रतिपूरक वनीकरण किया गया. पौधों के जीवित रहने की दर अलग-अलग राज्यों में 40 से 100 प्रतिशत तक है.लेकिन यहां भी सवाल उठता है कि क्या नया पौधारोपण पुराने प्राकृतिक जंगल की पूरी भरपाई कर सकता है?
एक प्राकृतिक जंगल सिर्फ पेड़ों का समूह नहीं होता. उसमें जल स्रोत, घास, झाड़ियां, शिकार प्रजातियां, कीड़े-मकौड़े और कई दूसरे जीवों का पूरा इकोसिस्टम होता है. इसलिए लगाए गए नए पौधों को पुराने जंगल के बराबर इकोसिस्टम तैयार करने में लंबा समय लग सकता है.
बाघों के हमलों को रोकना है तो जंगल बचाना होगा
इसका साफ अर्थ है बाघों के बढ़ते हमलों के पीछे उनकी आबादी और घनत्व बढ़ना, संरक्षित क्षेत्रों के बाहर बाघों की मौजूदगी, जंगल के आसपास खेती और आबादी का विस्तार, प्राकृतिक शिकार की उपलब्धता, पशुओं का जंगल में जाना और मानव गतिविधियों का बढ़ना शामिल हैं.बाघों को बचाना है या उनके हमले से होने वाली मौतों को रोकना है तो जंगल और कॉरिडोर बचाने होंगे.



