वन्दे मातरम पर बीजेपी का दांव उन्हीं पर पड़ा उल्टा, विपक्ष ने दिखा दिया आईना
पार्टी का कहना है कि वह 1937 के कोलकाता कांग्रेस अधिवेशन में लिए फैसले के हिसाब से केवल दो लाइनों का ही गायन करेगी.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: इन दिनों वन्दे मातरम को लेकर एक बार फिर सियासी पारा सातवें आसमान पर है। दरअसल विवाद की शुरुआत स्वतंत्रता दिवस के दिन कांग्रेस मुख्यालय में तिंरगा फहराने के बाद इस गीत के गायन से हुई. कार्यक्रम के दौरान सोनिया गांधी के व्यवहार का वीडिया सामने आने के बाद बवाल मच गया.
इस वीडियो में दिख रहा है कि गीत की पहली दो लाइनों के गायन के बाद सोनिया गांधी बात करने लगती हैं. जबकि नए नियम के तहत इस पूरे गीत का गायन करना अनिवार्य है. ऐसे में कहा जा रहा है कि सोनिया गांधी ने इस गीत का अपमान किया. वहीं कांग्रेस पार्टी का तर्क है कि वह इस गीत की शुरुआती केवल दो लाइनों को गाने के लिए बाध्य है.
पार्टी का कहना है कि वह 1937 के कोलकाता कांग्रेस अधिवेशन में लिए फैसले के हिसाब से केवल दो लाइनों का ही गायन करेगी. इस अधिवेशन में गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगौर, महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल जैसे दिग्गज मौजूद थे. उनकी सहमति से ही वंदे मातरम गीत की केवल दो लाइनों को लाने का फैसला किया गया. इसको लेकर प्रस्ताव पारित किया गया.
वहीं इस फैसले को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस पर हमला बोलते हुए कहा कि कांग्रेस ने 1937 के अपने पुराने प्रस्ताव को मानते हुए ‘वंदे मातरम’ के सिर्फ दो पद गाने का फैसला किया है। यह बयान तब आया जब कांग्रेस कार्य समिति ने पार्टी के कार्यक्रमों में राष्ट्रीय गीत के केवल पहले दो छंद गाने का निर्णय लिया।
वर्किंग कमिटी इस गाने की अहमियत समझाना चाहती है. यह गाना बंकिम चंद्र चटर्जी के नॉवेल “आनंदमठ” में है, लेकिन उनकी बायोग्राफी में बताया गया है कि यह गाना नॉवेल से बहुत पहले और अलग से लिखा गया था, और बाद में इसे इसमें शामिल कर लिया गया. इसलिए इस गाने को किताब से अलग माना जाना चाहिए. इसे 1896 में रवींद्रनाथ टैगोर ने म्यूज़िक दिया था.
ब्रिटिश सरकार ने इस गाने और “वंदे मातरम” शब्दों को देशद्रोही माना और हिंसा और डरा-धमकाकर इसे दबाने की कोशिश की. अप्रैल 1906 में श्री ए. रसूल की अध्यक्षता में बारीसाल में हुए बंगाल प्रोविंशियल कॉन्फ्रेंस के एक सेशन में, पुलिस ने डेलीगेट्स और वॉलंटियर्स पर बेरहमी से लाठीचार्ज किया और उनके पहने हुए “वंदे मातरम” बैज बुरी तरह फाड़ दिए गए.
कुछ डेलीगेट्स को “वंदे मातरम” चिल्लाते हुए इतनी बुरी तरह पीटा गया कि वे बेहोश होकर गिर पड़े. तब से, पिछले तीस सालों में, पूरे देश में “वंदे मातरम” के साथ कुर्बानी और तकलीफ के अनगिनत उदाहरण जुड़े हैं और मर्दों और औरतों ने अपने होठों पर यह नारा लगाकर भी मौत का सामना करने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई.
इस तरह यह गाना और इसके शब्द खासकर बंगाल में और आम तौर पर भारत के दूसरे हिस्सों में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ़ देश के विरोध के सिंबल बन गए. “वंदे मातरम” शब्द ताकत का नारा बन गया जिसने हमारे लोगों को प्रेरणा दी, और एक ऐसा अभिवादन जो हमें हमेशा देश की आज़ादी के लिए हमारे संघर्ष की याद दिलाता है.
धीरे-धीरे गाने के पहले दो हिस्सों का इस्तेमाल दूसरे प्रांतों में भी फैल गया और उन्हें एक खास देश का महत्व मिलने लगा. गाने का बाकी हिस्सा बहुत कम इस्तेमाल हुआ और अब भी बहुत कम लोग इसे जानते हैं. इन दो लाइनों में मातृभूमि की सुंदरता और उसके तोहफ़ों की भरमार के बारे में प्यार भरी भाषा में बताया गया है.
इनमें ऐसा कुछ भी नहीं था जिस पर धार्मिक या किसी और नज़रिए से एतराज़ किया जा सके. यह गाना कभी भी भारत के किसी ग्रुप या कम्युनिटी को चुनौती देने के लिए नहीं गाया गया और न ही इसे कभी ऐसा माना गया कि यह किसी कम्युनिटी की भावनाओं को ठेस पहुंचाता है.
असल में, इसमें तीस करोड़ भारतीयों का ज़िक्र यह साफ़ करता है कि यह भारत के सभी लोगों पर लागू होता था. खैर अभी मौजूदा दौर की बात करें तो इसे लेकर पक्ष विपक्ष आमने-सामने है। वहीं अमित शाह ने जैसे ही बयान दिया उनके बयान पर पलटवार करते हुए कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने जोरदार हमला बोला।
इतना ही नहीं वंदे मातरम विवाद पर शिवसेना (UBT) सांसद संजय राउत ने कहा, “बीजेपी न तो देश का संविधान जानती है और न ही वंदे मातरम के बारे में जानती है। गृह मंत्री अमित शाह और पीएम मोदी को आगे आना चाहिए और बिना टेलीप्रॉम्प्टर के सबके सामने वंदे मातरम के सभी छह पद गाने चाहिए।



