श्रमिक सुरक्षा को लेकर मचा सियासी बवाल

जयराम रमेश बोले- कमजोर होने का खतरा

  • सुप्रीम कोर्ट ने बदली उद्योग की परिभाषा, कांग्रेस ने उठाए सवाल
  • न्यायमूर्ति नागरत्ना का फैसला साहसिक

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। औद्योगिक संबंधों से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले पर बवाल मच गया है। कांग्रेस ने इस मामले में चिंता जताई है। पार्टी का कहना है कि ‘उद्योग’ की परिभाषा को संकीर्ण करने से श्रमिकों को मिलने वाले कानूनी संरक्षण का दायरा प्रभावित हो सकता है। जयराम रमेश ने कहा कि 1978 में स्थापित व्यवस्था ने लंबे समय तक यह तय करने में मदद की कि किन गतिविधियों और कर्मचारियों पर श्रम कानून लागू होंगे। कांग्रेस ने शनिवार को सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले पर चिंता जताई, जिसमें कहा गया है कि उद्योग शब्द की 1978 में दी गई श्रमिक हितैषी व्याख्या औद्योगिक संबंध संहिता, 2०1० के तहत नए मामलों पर लागू नहीं होगी। पार्टी ने कहा कि कानून को उद्योग की व्यापक परिभाषा से सीमित करने या उससे अलग करने की कोई भी कोशिश श्रमिकों के संरक्षण को कमजोर कर सकती है। उन्होंने कहा कि उद्योग की व्याख्या का महत्व इस कानूनी स्थिति से जुड़ा है कि कौन कामगार माना जाएगा और इसके आधार पर किसे श्रम कानूनों का संरक्षण मिलेगा।
रमेश ने कहा, 1978 के बंगलूरू वाटर सप्लाई मामले में सुप्रीम कोर्ट ने तीन तत्व बताए थे, जो आम तौर पर किसी उद्योग की पहचान करते हैं। इनमें व्यवस्थित गतिविधि, नियोक्ता और कर्मचारी के बीच सहयोग तथा लोगों की जरूरतों और इच्छाओं को पूरा करने के लिए वस्तुओं या सेवाओं का उत्पादन या वितरण शामिल है। हालांकि, पूरी तरह आध्यात्मिक या धार्मिक सेवाओं को इससे बाहर रखा गया था।
रमेश ने कहा कि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि लाभ कमाना जरूरी नहीं है। धर्मार्थ संस्थाओं या सार्वजनिक निकायों की गतिविधियां भी उद्योग की परिभाषा में आ सकती हैं। रमेश के मुताबिक, इसका एकमात्र अपवाद संप्रभु कार्य थे, जैसे न्यायपालिका, कानून-व्यवस्था और रक्षा से जुड़े काम। उन्होंने कहा, करीब पांच दशकों तक इस ट्रिपल टेस्ट ने यह तय करने के लिए व्यापक और स्थापित व्यवस्था दी कि क्या उद्योगके दायरे में आता है। इससे पुराने औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत बड़ी संख्या में श्रमिकों को श्रम कानूनों का संरक्षण मिला। रमेश ने तर्क दिया कि इससे व्यवहार में उद्योग की संकीर्ण परिभाषा को जगह मिल सकती है। खासकर तब, जब औद्योगिक संबंध संहिता पहले ही केंद्र सरकार को अपने दायरे से प्रतिष्ठानों की कुछ और श्रेणियों को बाहर रखने का अधिकार देती है। कांग्रेस नेता ने कहा, न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना का असहमति वाला फैसला हमेशा की तरह साहसिक, स्पष्ट और प्रभावी है। उन्होंने कहा है कि बंगलूरू वाटर सप्लाई मामले में तय ट्रिपल टेस्ट पर दोबारा विचार करने की जरूरत नहीं थी और न्यायिक निश्चितता के हित में स्थापित कानून को बदलने से बचने की चेतावनी दी है। रमेश ने कहा कि न्यायमूर्ति नागरत्ना ने यह भी सही कहा है कि पुराने कानून के तहत स्थापित न्यायिक व्यवस्था नए कोड की व्याख्या में मदद कर सकती है। इसके बजाय नए कोड का इस्तेमाल पुराने कानून के तहत स्थापित व्यवस्था को फिर से खोलने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगस्त 2026 का बहुमत वाला फैसला चिंता का विषय है, क्योंकि ऐसे समय में श्रम संबंधों में अनिश्चितता बढ़ रही है जब औद्योगिक शांति के लिए स्पष्टता जरूरी है।

मोदी सरकार ने औद्योगिक संहिता को कमजोर किया

कांग्रेस महासचिव और संचार प्रभारी जयराम रमेश ने दावा किया कि मोदी सरकार की औद्योगिक संबंध संहिता, 2०2० ने हमारे श्रमिकों के लिए जरूरी सुरक्षा उपायों को काफी कमजोर कर दिया है। जयराम रमेश ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि इसी पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट की बहुमत वाली पीठ ने 20 अगस्त 26 को उत्तर प्रदेश राज्य बनाम जय बीर सिंह मामले में अपने 1978 के चर्चित फैसले में तय ट्रिपल टेस्ट को नए सिरे से तय करने की परिकल्पना की है। यह ट्रिपल टेस्ट फरवरी 1978 के बंगलूरू वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड बनाम ए राजप्पा मामले में तय किया गया था।

ये था सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा था कि उद्योग शब्द की उसकी 48 साल पुरानी व्यापक और श्रमिक हितैषी व्याख्या औद्योगिक संबंध संहिता, 2०2० के तहत नए मामलों पर लागू नहीं होगी। फैसला सुनाते हुए प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि 1978 के फैसले में न्यायमूर्ति वी आर कृष्ण अय्यर द्वारा विकसित ट्रिपल टेस्ट यह तय करने के लिए वैध रहेगा कि कोई गतिविधि उद्योग है या नहीं। उन्होंने कहा कि मौजूदा फैसले में ट्रिपल टेस्ट को परिष्कृत किया गया है, लेकिन इसका इस्तेमाल अब निरस्त हो चुके औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत लंबित या पहले ही तय हो चुके मामलों में नहीं किया जा सकता। बहुमत के फैसले में यह भी स्पष्ट किया गया कि अदालत ने औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 पर विचार नहीं किया है।

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