संघर्ष, शिकायत दर्ज एफआईआर का इंतजार
4PM की शेरनियों के साथ पुलिस ज्यादती पर दिल्ली में संग्राम

- संजय शर्मा की दो टूक दोषी पुलिसकर्मियों पर एफआईआर नहीं हुई तो हाईकोर्ट जाएंगे
- रविवार तक सरकार के जवाब का इंतजार
- एक लाख से ज्यादा ट्वीट 40 से अधिक देशों से समर्थन संदेश
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। दिल्ली में 4PM की महिला पत्रकारों के साथ हुए जुल्म और जाति पूछ कर किये गये अत्याचार की कहानी से सिर्फ देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में गुस्से की लहर है और आक्रोश के स्वर उभर रहे हैं। सोशल मीडिया घटना के वीडियो फुटेज से पटा पड़ा और लोगों के समर्थन संदेशों की बाढ़ सी आ गयी है।
मामला ट्रेंड कर रहा है। समाजिक संगठन, राजनीतिक संगठन और आम जनता ने बढ़ चढ़ कर इस मुद्दे पर 4PM का सपोर्ट किया है। 4PM न्यूज नेटवर्क के समूह संपादक संजय शर्मा आज दिल्ली पहुंचे और प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में प्रेस कांफ्रेंस कि जिसमें भारी तादात में पत्रकार पहुंचे। उनकी आवाज में आवाज मिलाते हुए पत्रकारों ने एक स्वर में घटना की निंदा की है और आगे की लड़ाई का एलान किया है। संपादक संजय शर्मा ने दो टूक कहा है कि वह संडे तक दिल्ली पुलिस की इस दिशा में कार्रवाई का इंतजार करेंगे। यदि माकूल कार्रवाई नहीं होती है तो फिर वह हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे।
सोशल मीडिया पर 4PM की गूंज
4PM की पत्रकार शाहीन और नफीसा के समर्थन में एक लाख से ज्यादा ट्वीट हुए और 40 से ज्यादा देशों से फोन, एसएमएस और व्हाटसएप संदेश आए है। यानी शाहीन के साथ ज्यादती का सवाल अब एक संस्थान की चारदीवारी में बंद मामला नहीं रहा। यह प्रेस की स्वतंत्रता, महिला पत्रकारों की सुरक्षा और पुलिस की जवाबदेही का सवाल बन चुका है। संजय शर्मा ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में 4PM के पिछले संघर्षों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि संस्थान को करोड़ों रुपये के विज्ञापनों के प्रलोभन दिए गए लेकिन 4PM ने सच की आवाज से पीछे हटना स्वीकार नहीं किया। उन्होंने यह भी बताया कि अलग अलग मौकों पर चैनल को बंद करने जैसी परिस्थितियां सामने आयी लेकिन हर बार कानूनी लड़ाई लड़ी गई और संस्थान अपनी आवाज के साथ वापस आया। उनका संदेश साफ है सत्ता बदलेगी परिस्थितियां बदलेंगी दबाव बदलेंगे लेकिन सवाल पूछने का अधिकार नहीं बदलेगा।
यह लड़ाई अब पीछे हटने वाली नहीं है
दिल्ली की उस रात के बाद अब सवाल सिर्फ इतना नहीं रह गया है कि 4PM की महिला पत्रकार शाहीन और नफीसा के साथ पुलिस थाने में क्या हुआ था। सवाल अब यह है कि सवाल पूछने वाली पत्रकार की आवाज को आखिर दबाएगा कौन? क्योंकि एक महिला पत्रकार थाने से बाहर निकली, कैमरे के सामने आयी ज्यादती के निशान दिखाए और उसके बाद जो हुआ उसने दिल्ली की सियासत और पत्रकारिता दोनों को हिला दिया। रातभर थाने के बाहर गुस्सा दिखाई दिया, पत्रकारों और सामाजिक संगठनों की आवाज बुलंद हुई और देखते ही देखते मामला दिल्ली की चारदीवारी से निकलकर देश और दुनिया तक पहुंच गया। अब 4PM के संपादक संजय शर्मा खुद दिल्ली पहुंच चुके हैं और उन्होंने साफ कर दिया है यह लड़ाई अब पीछे हटने वाली नहीं है। संपादक संजय शर्मा ने कहा कि ४क्करू कभी किसी सरकार के खिलाफ नहीं है उसका काम सिर्फ सवाल पूछना है। सवाल पूछना ही पत्रकारिता है और अगर सवाल पूछने की कीमत पुलिसिया उत्पीड़न है तो यह सवाल सिर्फ शाहीन और नफीसा का नहीं रहेगा। यह उस हर पत्रकार का सवाल बनेगा जो सत्ता के सामने कैमरा लेकर खड़ा होता है। संजय शर्मा ने साफ कहा है कि यदि दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं किया गया तो 4PM दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाएगा। सरकार को रविवार तक का वक्त दिया गया है। यानी अब गेंद सीधे सरकार के पाले में है कि वह क्या कार्रवाई करती है।
शाहीन-नफीसा बहादुर पत्रकार हैं डरने वाली नहीं
शाहीन और नफीसा सिर्फ 4PM की महिला पत्रकार नहीं हैं वह उस पत्रकारिता की प्रतिनिधि हैं जो सड़क पर उतरकर सवाल करती है। कैमरा लेकर सत्ता के दरवाजे तक जाती है और जवाब मांगती है। यही पत्रकारिता लोकतंत्र की असली ताकत है। 4PM ने दिल्ली के साइकिल घोटाले को जिस तरह प्रमुखता से उठाया उसने कई असहज सवाल खड़े किए। अब जब उसी संस्थान की दो महिला पत्रकारों के साथ पुलिस पर ज्यादती के आरोप लगे हैं तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या उनकी पत्रकारिता और इस कार्रवाई के बीच कोई संबंध है? इसका जवाब आरोप से नहीं जांच से मिलेगा। लेकिन एक बात बिल्कुल साफ है कि शाहीन और नफीसा को डराकर सवाल पूछने से नहीं रोका जा सकता। उनकी बहादुरी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि घटना के बाद भी उन्होंने चुप रहने के बजाय सामने आकर अपनी बात रखी। उन्होंने सवाल उठाए और न्याय की मांग की।
हमने सुविधाजनक पत्रकारिता का रास्ता नहीं चुना
4PM चैनल पर दिल्ली के साइकिल घोटाले को प्रमुखता से उठाया गया था। 4PM लगातार सच की आवाज उठा रहा है और शायद यही कारण है कि सरकारों के कोपभजन का शिकार बनना पड़ रहा है। 4PM का कहना है कि उसकी लड़ाई किसी सरकार के खिलाफ नहीं है पत्रकार का काम सवाल पूछना है मुख्यमंत्री से भी मंत्री से भी पुलिस से भी विपक्ष से भी और अपने संस्थान से भी। संजय शर्मा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में इसी पत्रकारिता की बात की। उन्होंने कहा कि अगर 4PM भी सवाल पूछना छोड़ देता सत्ता के साथ सुविधाजनक रिश्ते बना लेता और सिर्फ वही बोलता जो सत्ता सुनना चाहती है तो शायद आज उसके पास करोड़ों के विज्ञापन होते और सरकार में उसकी पूछ होती। हमने कभी नहीं पूछा कि आप आम चूस कर खाते हैं या फिर काट कर, आप थकते क्यों नहीं यदि हम भी ऐसा करते तो फिर हम 4PM नहीं होते फिर हम सिर्फ एक और संस्थान होते। 4PM ने जिस रास्ते को चुना है उसका मतलब ही है कि सवाल जारी रहेंगे।
साथ देने वालों का शुक्रिया अब इंसाफ का इंतजार है
संपादक संजय शर्मा ने उन तमाम लोगों का शुक्रिया अदा किया जिन्होंने शाहीन और नफीसा के साथ खड़े होकर इस मामले को आवाज दी। उन्होंने अधिवक्ता हैदर भाई का भी आभार जताया और कहा कि इस पूरे मामले में कानूनी लड़ाई जारी रहेगी। उन्होंने कहा कि सीसीटीवी फुटेज सामने आया है और अब उन सवालों का जवाब मिलना चाहिए जो घटना के बाद से लगातार उठ रहे हैं। संजय शर्मा ने कहा कि उन्हें संविधान और न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है। उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री से भी न्याय सुनिश्चित करने की अपील की और साफ कहा कि अगर पुलिस की तरफ से एफआईआर दर्ज नहीं की गई तो वह दिल्ली हाईकोर्ट जाएंगे रविवार तक सरकार के रुख का इंतजार किया जाएगा उसके बाद अदालत का दरवाजा खटखटाया जाएगा यह लड़ाई किसी व्यक्ति से बदला लेने की लड़ाई नहीं है यह न्याय की मांग है और इसी वजह से सवाल यह भी है कि जब सीसीटीवी मौजूद है तो निष्पक्ष जांच में परेशानी क्या है? यदि आरोप गलत हैं तो जांच उन्हें गलत साबित कर देगी यदि आरोप सही हैं तो दोषियों पर कार्रवाई होनी चाहिए यही कानून का रास्ता है। संजय शर्मा ने इस पूरे घटनाक्रम के व्यापक सामाजिक प्रभाव की तरफ भी इशारा किया। उन्होंने कहा कि एक तरफ देश के बाहर भारतीय मुसलमानों के बारे में सकारात्मक बातें कही जाती हैं वहीं दूसरी तरफ देश के भीतर अगर किसी नागरिक को उसकी पहचान के आधार पर उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है तो यह गंभीर विरोधाभास है। उन्होंने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के विदेश में दिए गए मुस्लिम समुदाय से जुड़े सकारात्मक बयानों का संदर्भ देते हुए सवाल उठाया कि देश के भीतर ऐसा माहौल क्यों दिखाई दे रहा है जिसमें पहचान के आधार पर भेदभाव के आरोप सामने आते हैं।




