मर्डर केस में दोषियों को राहत, सुप्रीम कोर्ट ने क्यों पलटा फैसला?

9 दिनों में मर्डर केस में आरोपियों को राहत मिली. कहीं गवाहों के बयान, कहीं हथियार तो कहीं CCTV और कॉल रिकॉर्ड जैसे सबूत कानूनी प्रक्रिया के तहत पेश नहीं किए गए.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: 9 दिनों में मर्डर केस में आरोपियों को राहत मिली. कहीं गवाहों के बयान, कहीं हथियार तो कहीं CCTV और कॉल रिकॉर्ड जैसे सबूत कानूनी प्रक्रिया के तहत पेश नहीं किए गए. आखिर आरोपियों को क्यों बरी किया?

5 मुख्य बातें

9 दिनों में 4 मामलों के 9 आरोपियों को अदालत से राहत मिली

कहीं गवाह बदले तो कहीं हथियार और जरूरी सबूत नहीं मिले

CCTV और कॉल रिकॉर्ड भी कानूनी प्रक्रिया के तहत पेश नहीं हुए

आखिर हत्या साबित होने के बाद भी आरोपी क्यों हुए बरी?

क्या पुलिस की जांच में छोटी गलती से पूरा केस कमजोर हो गया?

अदालत में किसी आरोपी को दोषी साबित करने के लिए सिर्फ यह बताना काफी नहीं होता कि उसके खिलाफ शक है. पुलिस की जांच, गवाहों के बयान, बरामद सबूत और घटनाओं की पूरी कड़ी ऐसी होनी चाहिए, जिससे यह साबित हो सके कि अपराध उसी व्यक्ति ने किया है. हाल के दिनों में सामने आए हत्या के कुछ मामलों में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट ने इसी बात को अहम माना.

कई मामलों में निचली अदालतों ने आरोपियों को दोषी ठहराया, कुछ को उम्रकैद तो कुछ को मौत की सजा तक सुनाई गई, लेकिन बाद की अदालतों में जांच और सबूतों की कमजोरियां सामने आईं. आरोपियों को बरी करने की वजह में कहीं गवाहों के बयान आपस में नहीं मिले, कहीं हत्या में इस्तेमाल हथियार बरामद नहीं हुआ और कहीं CCTV और फोन रिकॉर्ड जैसे डिजिटल सबूतों को कानून के मुताबिक पेश ही नहीं किया गया.

शक के आधार पर दोषी नहीं ठहरा सकते

ऐसे में अदालतों ने कहा कि सिर्फ शक के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता. इनमें सबसे अहम बात यह है कि अदालत ने यह नहीं कहा कि घटना में हत्या हुई ही नहीं थी. कई मामलों में हत्या या अपराध होना साबित था, लेकिन सवाल यह था कि क्या सरकार की तरफ से मामला लड़ने वाला पक्ष यह साबित कर पाया कि अपराध आरोपी ने ही किया था? अगर इसका जवाब साफ तौर पर नहीं मिलता, तो कानून के मुताबिक आरोपी को संदेह का फायदा दिया जाता है.

केसों में किन वजह से बरी हुए आरोपी

यही वजह है कि इन मामलों में आरोपियों को बरी किया गया. कहीं पुलिस की जांच में बड़ी लापरवाही सामने आई, कहीं गवाहों के बयान बदलते मिले और कहीं डिजिटल सबूतों को कोर्ट में सही तरीके से पेश ही नहीं किया गया. ऐसे में अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति को सिर्फ शक के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता. ऐसे ही 4 मामलों में पिछले 9 दिनों में मर्डर के केस में 9 आरोपियों को बरी किया गया है.

1- बिहार केस-

यह मामला बिहार का था, जहां दो परिवारों के बीच विवाद के बाद झगड़ा हुआ. दोनों परिवार के बीच ये विवाद नाली के पानी को लेकर हुआ था. आरोप था कि इसी झगड़े में पांच लोग पहुंचे और एक आरोपी ने गोली चलाकर एक व्यक्ति की हत्या कर दी. दूसरे आरोपी पर महिलाओं और बच्चों पर गोली चलाने का आरोप था.

ट्रायल कोर्ट ने पांच में से तीन आरोपियों को बरी कर दिया, जबकि दो को दोषी माना गया था. हाईकोर्ट ने भी उनकी सजा बरकरार रखी, इसके बाद दोनों सुप्रीम कोर्ट पहुंचे. सुप्रीम कोर्ट ने गवाहों के बयानों, मेडिकल रिपोर्ट और पुलिस जांच को देखा तो कई गड़बड़ियां सामने आईं.

सुप्रीम कोर्ट ने दोनों को बरी क्यों किया?

जांच में खामियां पाईं, गवाहों के बयान भी आपस में नहीं मिल रहे थे.

सबसे अहम सवाल था कि घायल व्यक्ति को अस्पताल ले जाने के बजाय पुलिस स्टेशन क्यों ले जाया गया.

डॉक्टर के मुताबिक गोली की चोट से उसकी तुरंत मौत नहीं हुई थी, वह 3 से 6 घंटे तक जीवित रह सकता था.

गवाहों के बयान भी आपस में नहीं मिल रहे थे. कुछ ने कहा शव पुलिस स्टेशन ले जाया गया, जबकि कुछ ने अस्पताल ले जाने की बात कही.

कथित हत्या का हथियार बरामद नहीं हुआ. घटनास्थल से जरूरी सबूत और खून से सने कपड़े भी पुलिस ने जब्त नहीं किए.

पुलिस ने घटनास्थल का नक्शा तक तैयार नहीं किया, जबकि जांच अधिकारी वहां गया था.

कई गवाह मृतक के करीबी रिश्तेदार थे और उनके बयान पहले दिए गए बयानों से भी मेल नहीं खाते थे.

2- अपहरण, फिरौती और हत्या का मामला-

हैदराबाद में एक व्यक्ति के अपहरण और हत्या के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कोंडापाका श्रीधर को बरी कर दिया. मामला था कि एक व्यक्ति हैदराबाद गया था और वहां उसका अपहरण कर लिया गया. उसके पिता से 2 लाख रुपये की फिरौती मांगी गई. परिवार ने कथित तौर पर 1.5 लाख रुपये एक महिला के खाते में जमा किए.

बाद में उस व्यक्ति की लाश एक फ्लैट के अंदर फ्रिज में छिपी मिली. पोस्टमार्टम में पता चला कि उसकी मौत दम घुटने से हुई थी. इस मामले में कुल 6 लोगों पर आरोप लगा. एक आरोपी की ट्रायल के दौरान मौत हो गई और बाकी 5 को ट्रायल कोर्ट ने दोषी माना. बाद में हाईकोर्ट ने 4 लोगों को बरी कर दिया, लेकिन श्रीधर की सजा बरकरार रखी. इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा.

65B सर्टिफिकेट इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

CCTV, कॉल रिकॉर्ड, मोबाइल डेटा जैसे इलेक्ट्रॉनिक सबूतों को कोर्ट में पेश करने के लिए यह प्रमाणित करना जरूरी होता है कि रिकॉर्ड असली है और उसे सही तरीके से हासिल किया गया है.

सुप्रीम कोर्ट ने बरी क्यों किया?

ठोस और भरोसेमंद सबूत नहीं हैं. और जिस बैंक खाते में फिरौती की रकम जमा हुई, उसकी जांच भी ठीक से नहीं की गई.

CCTV फुटेज में आरोपी की पहचान भी साफ नहीं थी. फोन कॉल रिकॉर्ड के लिए भी जरूरी 65B सर्टिफिकेट नहीं दिया गया.

जिस बैंक खाते में फिरौती की रकम जमा हुई, उसकी जांच भी ठीक से नहीं की गई. न ही बरामद हुए पैसों को फिरौती की रकम से जोड़ने वाला ठोस सबूत नहीं था.

जिन गवाहों से आरोपी की फोटो पहले दिखाने के बाद पहचान कराई गई, उनकी टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड(Test Identification Parade) भी भरोसेमंद नहीं लगी.

जिस फ्लैट में शव मिला, वह असल में श्रीधर का था या उसके कब्जे में था, इसका सबूत भी नहीं मिला.

3- अंबाला केस-

हरियाणा के अंबाला में 2007 में एक नाबालिग बच्चा लापता हुआ था. ये मामला 11 मार्च 2007 का है, जिस दिन बच्चा लापता हुआ था और अगले दिन उसका शव एक कुएं से मिला. आरोपी पर बच्चे के साथ यौन अपराध करने और फिर उसका गला दबाकर हत्या करने का आरोप था. बच्चे को आखिरी बार आरोपी के साथ देखा गया था.

इसके अलावा पुलिस ने दावा किया कि आरोपी ने दो दिन बाद गांव के सरपंच के सामने अपना अपराध कबूल किया था. ट्रायल कोर्ट ने 2010 में उम्रकैद और हाईकोर्ट ने 2022 में सजा बरकरार रखी. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 2026 में आरोपी को बरी कर दिया. कोर्ट ने कहा कि कोई सीधा सबूत नहीं था और आखिरी बार साथ देखे जाने की बात भी पक्की नहीं थी. कथित कबूलनामा भी भरोसेमंद नहीं लगा. आरोपी 16 साल 7 महीने जेल में रहा था.

सुप्रीम कोर्ट ने बरी क्यों किया?

आरोपी के खिलाफ सीधा और पक्का सबूत नहीं था. पूरा केस सबूतों यानी घटनाओं को जोड़कर तैयार किया गया था.

‘आखिरी बार साथ देखे जाने’ की कहानी पक्की नहीं थी. गवाहों के बयान से यह बात भरोसे के साथ साबित नहीं हुई.

आरोपी का कथित कबूलनामा गांव के सरपंच के सामने बताया गया, लेकिन कोर्ट ने कहा कि आरोपी और सरपंच के बीच ऐसा कोई संबंध नहीं था.

मौके से मिले सबूत को आरोपी से जोड़ने की कोशिश की गई, जो कि काफी आम चीज थी.

– विले पार्ले का रेप और हत्या का मामला

मुबई के विले पार्ले में 5 दिसंबर 2016 को 24 साल की एक फिजियोथेरेपिस्ट की उसके घर में रेप के बाद हत्या कर दी गई थी. पुलिस के मुताबिक, महिला के कमरे में आग भी लगाई गई थी. पीड़िता अपने परिवार के साथ रहती थी. 5 और 6 दिसंबर 2016 की रात वह दोस्तों के साथ बाहर से घर लौटी थी.

करीब सुबह 3:30 बजे उसके कमरे से धुआं निकलता देखा गया, जिसके बाद परिवार और पड़ोसी वहां पहुंचे. पुलिस के मुताबिक, उसका शव कमरे में मिला था और गले में जींस लिपटी हुई थी. जांच के दौरान पुलिस ने पास में काम करने वाले देबाशीष नंदलाल धारा को आरोपी बनाया और उसे पश्चिम बंगाल से गिरफ्तार किया. 2019 में ट्रायल कोर्ट ने उसे दोषी मानते हुए मौत की सजा सुनाई.

मामला कितना पुराना था?

घटना दिसंबर 2016 की है. ट्रायल कोर्ट ने 4 अक्टूबर 2019 को धारा को दोषी मानते हुए मौत की सजा सुनाई थी. इसके बाद उसने हाईकोर्ट में अपील की. करीब 7 साल बाद, 7 सितंबर 2026 को बॉम्बे हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला पलट दिया और उसे बरी करते हुए रिहाई का आदेश दिया.

बरी क्यों किया?

पूरा मामला काफी हद तक परिस्थितिजन्य सबूतों पर आधारित था.

आरोपी के वकील ने कोर्ट में दलील दी कि उसे सिर्फ शक के आधार पर फंसाया गया

आरोपी को अपराध से जोड़ने वाला कोई निर्णायक सबूत नहीं है.

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