हरतालिका तीज पर पढ़ें ये पावन व्रत कथा, मां पार्वती की कृपा से मिलेगा अखंड सौभाग्य

हरतालिका तीज के पूजा-पाठ करने और व्रत रखने के साथ ही कथा का पाठ जरूर करना चाहिए. 

4पीएम न्यूज नेटवर्क: हरतालिका तीज के पूजा-पाठ करने और व्रत रखने के साथ ही कथा का पाठ जरूर करना चाहिए.

हरतालिका तीज का पर्व 14 सितंबर, सोमवार को मनाया जा रहा है. ये व्रत भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को रखा जाता है. इस दिन प्रदोष काल में भगवान शिव और माता पार्वती की बालू (मिट्टी) की मूर्तियां बनाकर विधिवत पूजा की जाती है. ये कठिन व्रत बिना जल के (निर्जला) 24 घंटे तक रखा जाता है. इस व्रत को हिंदू धर्म के सबसे मुश्किल व्रत में से एक माना जाता है. इस व्रत का पारण अगले दिन सूर्योदय के बाद किया जाता है.

हरतालिका तीज पर जितना महत्व पूजा-पाठ का होता है, उतना ही महत्न कथा सुनने या पढ़ने का होता है. इस शुभ अवसर पर रात में सोने के बजाय मंत्र जाप करना और व्रत कथा को पढ़ना बहुत ही शुभ माना गया है. धार्मिक मान्यता है कि हरतालिका तीज की कथा का पाठ करने से अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है और सभी मनोकामनाएं पूरी होती है.

हरतालिका तीज मुहूर्त (Hartalika Teej 2026 Puja Muhurat)
तृतीया तिथि प्रारंभ:- 13 सितंबर 2026 को सुबह 07:08 बजे
तृतीया तिथि समाप्त:- 14 सितंबर 2026 को सुबह 07:06 बजे
सुबह पूजा मुहूर्त:- सुबह 06:05 बजे से 07:06 बजे तक (1 घंटा 1 मिनट)
प्रदोष काल पूजा मुहूर्त:- शाम 06:24 बजे से 08:48 बजे तक (अगर सुबह का समय छूट जाए)

हरतालिका तीज की कथा क्या है? (Hartalika Teej Katha)
हरतालिका तीज की कथा माता पार्वती और भगवान शिव के विवाह तथा माता पार्वती द्वारा की गई कठोर तपस्या से जुड़ी है. हरत का अर्थ है ‘हरण’ (अपहरण) और आलिका का अर्थ है ‘सखी’ (फ्रेंड). माता पार्वती की सखी उन्हें बिना बाधा के तपस्या करने के लिए घनघोर जंगल में ले गई थीं, इसलिए इस व्रत का नाम हरतालिका पड़ा.

हरतालिका तीज व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, माता पार्वती बचपन से ही भगवान शिव को पति रूप में पाना चाहती थीं. माता पार्वती ने मन ही मन भगवान शिव को अपने पति के रूप में मान लिया था. इसके लिए उन्होंने हिमालय पर गंगा तट पर अन्न-जल त्यागकर कठोर तपस्या की थी. माता पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर नारद मुनि ने पर्वतराज हिमालय के पास भगवान विष्णु का विवाह प्रस्ताव रखा. पिता हिमालय ने इसे स्वीकार भी कर लिया. जब माता पार्वती को इस बात का पता चला, तो वह बहुत दुखी हुईं. उन्होंने अपनी सखी को अपनी पीड़ा बताई. तब सखी माता पार्वती को उनके घर से निकालकर एक घने जंगल और गुफा में ले गई, जहां किसी को उनके ठिकाने का पता न चले.

भाद्रपद शुक्ल तृतीया के दिन माता पार्वती ने रेत और मिट्टी से शिवलिंग बनाकर बिना अन्न-जल ग्रहण किए घोर तपस्या की. माता की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार करने का वरदान दिया. बाद में पर्वतराज हिमालय को जब सच्चाई का पता चला, तो उन्होंने शिव-पार्वती का विधि-विधान से विवाह संपन्न कराया. धार्मिक मान्यता है कि जो स्त्रियां इस दिन विधि-विधान से निर्जला व्रत रखती हैं, उन्हें माता पार्वती की तरह अखंड सौभाग्य और मनवांछित फल की प्राप्ति होती है.

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