आजादी के बाद कैसे बदले चुनाव चिन्ह? कांग्रेस के ‘हाथ’ से लेकर हाथी तक की पूरी कहानी

चुनाव आयोग (ECI) ने TMC के चुनाव चिन्ह पर रोक लगाकर सियासी हलचल मचा दी है.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: चुनाव आयोग (ECI) ने TMC के चुनाव चिन्ह पर रोक लगाकर सियासी हलचल मचा दी है. चुनाव चिन्ह न सिर्फ पार्टियों की पहचान रहे हैं, बल्कि ये वोटरों को उम्मीदवार चुनने में मदद करता रहा है.

चुनाव आयोग (ECI) ने एक अंतरिम आदेश जारी करते हुए तृणमूल कांग्रेस के चुनाव चिन्ह के इस्तेमाल पर रोक लगा दी, जिसके बाद सियासी बवाल खड़ा हो गया. विपक्षी पार्टियों की ओर से इस आदेश को लेकर सवाल खड़े किए जा रहे हैं. कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि बीजेपी और चुनाव आयोग मिलकर चुनाव चिन्ह छीनने का काम कर रहे हैं.

दरअसल, चुनाव चिन्ह किसी भी पार्टी के लिए न सिर्फ एक वोट डालने की फोटो होती है बल्कि वह पहचान बन जाता है. वोटर जब वोट डालने जाता है तो उसके दिमाग से भले ही उम्मीदवार का नाम निकल जाए, लेकिन चुनाव चिन्ह हमेशा याद रहता है. यही वजह है कि आजाद भारत की राजनीति में चुनाव चिन्हों की अपनी एक अलग कहानी रही है.

अगर आपसे कोई सवाल करता है कि हाथ और हाथी किसका चुनाव चिन्ह है तो आप उसका जवाब तुरंत दे देंगे. आपका जवाब होगा कि “हाथ” कांग्रेस का और “हाथी” बहुजन समाज पार्टी यानी BSP का चुनाव चिन्ह है, लेकिन आजाद भारत के पहले आम चुनाव में कांग्रेस का चुनाव चिन्ह हाथ नहीं था और न ही हाथी को BSP के चुनाव चिन्ह के तौर पर पहचाना जाता था.

हालांकि हाथी दलितों के साथ हमेशा से रहा है. देश के पहले आम चुनाव में ऑल इंडिया शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन को हाथी चुनाव चिन्ह मिला था. ये पार्टी डॉ. भीमराव आंबेडकर से जुड़ी हुई थी और अनुसूचित जातियों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए काम करती थी.

देश में पहली बार 1951-52 में आम चुनाव

देश के आजाद होने के बाद पहला आम चुनाव 1951-52 में हुआ. इस दौरान उन लोगों की संख्या ज्यादा थी जो बिना पढ़े-लिखे थे. चुनाव आयोग ने इस बड़ी चुनौती से पार पाने के लिए आसान तरीका खोजा. उसने जिन पार्टियों को मान्यता मिली हुई थी उनके लिए अलग-अलग चिन्ह तय कर दिए, जिसका उद्देश्य ये था कि बिना पढ़े-लिखे लोग अपने पसंदीदा उम्मीदवार और पार्टियां चुनाव आसानी से कर सकें.

आयोग ने आम आदमी से जुड़ी चीजों को चुनाव चिन्ह बनाया, जिसमें बैल, पेड़, शेर, हाथ, घोड़ा और सवार, झोपड़ी, उगता सूरज, हाथी, हंसिया और अनाज की बालियां, फावड़ा, मशाल, तारा, अनाज फटकता किसान और दीपक शामिल थे. पहले चुनाव के रिकॉर्ड के मुताबिक, 14 चुनाव चिन्ह राष्ट्रीय दलों के लिए आरक्षित किए गए थे.

किस पार्टा को कौन सा दिया गया चुनाव चिन्ह

अखिल भारतीय हिंदू महासभा- घोड़ा और सवार

ऑल इंडिया शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन- हाथी

बोल्शेविक पार्टी ऑफ इंडिया- स्टार

ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक (मार्क्सिस्ट ग्रुप)- खड़ा हुआ शेर

सोशलिस्ट पार्टी- पेड़

ऑल इंडिया भारतीय जन संघ- दीपक

रिवोल्यूशनरी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया- मशाल

अखिल भारतीय राम राज्य परिषद- उगता हुआ सूरज

रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी- फावड़ा और स्टोकर

कृषिकार-लोक पार्टी- अनाज फटकता हुआ किसान

इंडियन नेशनल कांग्रेस- जुए के नीचे बैल की जोड़ी

कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया- अनाज की बालियां और हंसिया

ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक (रुइकर ग्रुप)- हाथ

किसान मजदूर प्रजा पार्टी- झोपड़ी

क्या है TMC के चुनाव चिन्ह का विवाद?

अब आपको बताते हैं कि टीएमसी के चुनाव चिन्ह को लेकर क्या विवाद है? इस साल पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में टीएमसी की बुरी तरह हार हुई थी, जिसके बाद पार्टी के अंदर घमासान मच गया और दो गुटों में टूट गई.

एक का नेतृत्व पार्टी की संस्थापक ममता बनर्जी कर रही थीं और दूसरे बागी गुट में ऋतब्रत बनर्जी और अरूप रॉय जैसे नेता शामिल हैं. दोनों ही गुट ने असली पहचान पर अपना-अपना दावा ठोका है. उन्होंने 6 अक्टूबर को होने वाले नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा उपचुनाव के लिए उम्मीदवार उतारे थे.

पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और अरूप रॉय के नेतृत्व वाले इन दोनों गुटों को नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा क्षेत्रों के उपचुनाव के लिए अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न चुनने का निर्देश दिया गया है.

आयोग ने दोनों गुटों को पार्टी का नाम “ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस” इस्तेमाल करने और उसके आरक्षित चुनाव चिह्न “फूल और घास” का उपयोग करने से रोका है. आयोग ने आगामी चुनाव लड़ने के लिए वैकल्पिक नाम दिए और उसकी ‘फ्री सिंबल’ की लिस्ट में से नए अस्थायी चुनाव चिह्न आवंटित किए हैं.

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