अष्टमी-नवमी पर कन्या पूजन की तैयारी? कन्या और बटुक की उम्र जानना न भूलें
नवरात्रि के दौरान अष्टमी और नवमी तिथि पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु छोटी बच्चियों को देवी का स्वरूप मानकर उनकी पूजा करते हैं। इस परंपरा में कन्याओं का स्वागत किया जाता है, उनके पैर धोए जाते हैं,

4पीएम न्यूज नेटवर्क: शारदीय नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना के साथ कन्या पूजन का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है।
नवरात्रि के दौरान अष्टमी और नवमी तिथि पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु छोटी बच्चियों को देवी का स्वरूप मानकर उनकी पूजा करते हैं। इस परंपरा में कन्याओं का स्वागत किया जाता है, उनके पैर धोए जाते हैं, तिलक लगाया जाता है और उन्हें हलवा, पूरी, चने समेत अन्य पकवानों का भोग कराया जाता है। कन्या पूजन के साथ एक बालक को भोजन कराने की भी परंपरा है, जिसे कई जगह बटुक या लंगूर कहा जाता है।
नवरात्रि के दौरान कन्या पूजन करने वाले श्रद्धालुओं के मन में अक्सर यह सवाल रहता है कि पूजा के लिए कितनी उम्र की बच्चियों को आमंत्रित करना चाहिए। क्या दो साल से कम उम्र की बच्चियों का पूजन किया जा सकता है? क्या दस साल से बड़ी कन्याओं को कन्या पूजन में शामिल करना उचित माना जाता है? इसके अलावा बटुक यानी लंगूर की उम्र को लेकर भी कई लोगों के मन में जिज्ञासा रहती है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कन्या पूजन के लिए सामान्यतः दो से दस वर्ष तक की कन्याओं को विशेष महत्व दिया जाता है। हालांकि, अलग-अलग धार्मिक परंपराओं और पूजा पद्धतियों में कुछ अंतर हो सकता है। आइए जानते हैं कन्या पूजन के लिए कन्याओं की उम्र, बटुक पूजन की परंपरा और इससे जुड़े जरूरी नियम।
कन्या पूजन के लिए कितनी होनी चाहिए कन्याओं की उम्र?
धार्मिक परंपराओं में 2 से 10 साल तक की बच्चियों को कन्या पूजन के लिए सही माना जाता है. इस उम्र की कन्याओं को मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों का प्रतीक मानकर उनका पूजन किया जाता है.
उम्र के अनुसार कन्याओं को किस देवी का स्वरूप माना जाता है?
- दो साल की कन्या: कुमारी स्वरूप से जोड़ा जाता है.
- तीन साल की कन्या: त्रिमूर्ति स्वरूप का प्रतीक माना जाता है.
- चार साल की कन्या: कल्याणी स्वरूप से जोड़ा जाता है.
- पांच साल की कन्या: रोहिणी स्वरूप का प्रतीक माना जाता है.
- छह साल की कन्या: कालिका स्वरूप से जोड़ा जाता है.
- सात साल की कन्या: चंडिका स्वरूप का प्रतीक माना जाता है.
- आठ साल की कन्या: शाम्भवी स्वरूप से जोड़ा जाता है.
- नौ साल की कन्या: दुर्गा स्वरूप का प्रतीक माना जाता है.
- दस साल की कन्या: सुभद्रा स्वरूप से जोड़ा जाता है.
कन्या पूजन में बटुक भैरव को क्यों बैठाया जाता है?
नवरात्रि में कन्या पूजन के दौरान कन्याओं के साथ एक बालक को भोजन कराने की परंपरा है. इस बालक को बटुक, बटुक भैरव या लंगूर कहा जाता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, बटुक भैरव भगवान भैरव के बाल स्वरूप हैं. भगवान भैरव को देवी दुर्गा से जुड़ी उपासना परंपराओं में विशेष स्थान दिया गया है. इसी वजह से कन्या पूजन के दौरान नौ कन्याओं के साथ एक बालक को भी आमंत्रित किया जाता है. उसे भी कन्याओं की तरह सम्मानपूर्वक आसन पर बैठाया जाता है और भोजन कराया जाता है.
बटुक भैरव की उम्र कितनी होनी चाहिए?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बटुक भैरव भगवान शिव का बाल स्वरूप हैं. कन्या पूजन के दौरान उनके प्रतीक के रूप में जिस बालक को बैठाया जाता है, उसे लंगूर या लांगुरिया भी कहते हैं. मान्यता के अनुसार, बटुक के रूप में बैठाए जाने वाले बालक की उम्र 5 से 8 साल के बीच होनी चाहिए.
- https://youtu.be/is2KHVgTTXA?si=jiQIoyprzLBF9awh



