तिरंगे से डरती सत्ता, दुनिया तक पहुंचता जंतर-मंतर का शोर

- राहुल के वोट वाले सवाल से मार्को रूबियो की मेज तक पहुंचा लोकतंत्र का मुद्दा
- अमेरिकी सांसदों की चिट्ठी ने बढ़ाई दिल्ली की बेचैनी
- दीपके की गिरफ्तारी और सौरव दास-आशुतोष रांका की जेल ने खड़े किए तीखे सवाल
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। दिल्ली में बैरिकेड खड़े किए गए रास्तों पर पहरे बिठाए गए प्रदर्शन की जगह को लेकर पाबंदियां लगाई गईं और विरोध की आवाज उठाने वालों को हिरासत में लिया गया। सत्ता शायद सोच रही थी कि राजधानी की सड़कों पर सन्नाटा छा जाएगा तो सवाल भी दम तोड़ देंगे। लेकिन राजनीति में कई बार जिस आवाज को दबाने की कोशिश होती है वही आवाज दीवारों के पार निकल जाती है।
जंतर-मंतर के विरोध की गूंज अब अमेरिकी सांसदों के पत्र और संयुक्त राष्ट्र की शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार संबंधी अपील के संदर्भ में अंतरराष्ट्रीय चर्चा का हिस्सा बन गये हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो को छह सांसदों ने पत्र लिखकर भारत यात्रा के दौरान अभिव्यक्ति की आजादी मानवाधिकार और विरोध प्रदर्शनों से जुड़े मुद्दे उठाने को कहा है। दूसरी ओर भारत सरकार अमेरिकी सांसदों की टिप्पणियों को आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप मानती रही है। यहां कहानी सिर्फ अमेरिकन सांसदों द्वारा लिखी गयी की चिट्ठी की नहीं है। सवाल है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में चुनावी प्रक्रिया पर उठते सवालों का जवाब बहस से मिलेगा या बैरिकेड से। तिरंगा लेकर निकले युवाओं की गिरफ्तारी जेल में बंद कार्यकर्ताओं और विदेशी सांसदों की चिट्ठी ने इस बहस को नया मोड़ दे दिया है। सत्ता के लिए असली चुनौती आलोचना को रोकना नहीं बल्कि आलोचना के बीच अपने लोकतांत्रिक दावों पर भरोसा कायम रखना होता है।
तिरंगा हाथ में हो तो सवाल और भी बड़ा हो जाता है
कॉकरोच जनता पार्टी से जुड़े अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका के प्रकरण ने इस बहस को प्रतीकात्मक ताकत दी है। सौरव दास और आशुतोष रांका को पुलिस बैरिकेड पार कर प्रदर्शन करने के मामले में पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है। इसके बाद दीपके ने दोबारा प्रदर्शन का आह्वान किया और 16 अक्टूबर को उन्हें भी हिरासत में लिया गया फिर औपचारिक गिरफ्तारी की खबर सामने आई। ब्रिटेन के अखबार द गार्जियन ने इस घटनाक्रम को अंतरराष्ट्रीय पाठकों के सामने रखा। उसकी रिपोर्ट के अनुसार दीपके तिरंगा लेकर प्रदर्शन में शामिल होने की अपील कर रहे थे। दिल्ली पुलिस की ओर से कानून-व्यवस्था और शांति भंग होने की आशंका जैसे कारण सामने आए हैं।
दिल्ली का सन्नाटा वाशिंगटन की चिट्ठी और लोकतंत्र की परीक्षा
जंतर मंतर की कहानी अब दिल्ली की सड़कों तक सीमित नहीं रही। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो की भारत यात्रा से पहले छह अमेरिकी डेमोक्रेटिक सांसदों ने उन्हें पत्र लिखकर भारतीय अधिकारियों के सामने विरोध प्रदर्शनों मानवाधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े मुद्दे उठाने का आग्रह किया है। पत्र लिखने वालों में प्रमिला जयपाल, इल्हान उमर, जिम मैकगवर्न, रशीदा तलैब, एलिनॉर होम्स नॉर्टन और जीसस गार्सिया शामिल हैं। सांसदों ने अमेरिका में भारतीय राजनयिक मिशनों से जुड़े लोगों द्वारा प्रदर्शनकारियों की तस्वीरें लेने और निगरानी के आरोपों की स्वतंत्र जांच की मांग भी की है। इन पत्रों के सामने आने के बाद साफ हो गया है कि भारतीय विरोध प्रदर्शनों का मुद्दा अब अमेरिकी राजनीतिक गलियारों में भी चर्चा का विषय बन चुका है।
राहुल गांधी के सवाल और मतदाता सूची का महाविवाद
इस पूरे घटनाक्रम के पीछे मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण का विवाद भी है। राहुल गांधी और विपक्ष चुनावी पारदर्शिता पर सवाल उठा रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर नाम हटने से वास्तविक मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हुए हैं। हालांकि चुनाव आयोग ने किसी भी राजनीतिक दल के पक्ष में काम करने के आरोपों को खारिज कर दिया है। आयोग के आंकड़ों के अनुसार पुनरीक्षण प्रक्रिया में करीब 13 करोड़ नाम हटाए गए जिनमें मृत और दूसरी जगह जा चुके लोगों के नाम भी शामिल हैं। इसलिए नाम हटने की कुल संख्या अपने आप में यह साबित नहीं करती कि सभी नाम गलत तरीके से हटाए गए। असली प्रश्न यह है कि कितने वास्तविक मतदाता प्रभावित हुए उन्हें सूचना मिली या नहीं और सुधार की प्रक्रिया कितनी सुलभ रही।
आलोचना से भागिए मत जवाब दीजिए सरकार
भारतीय लोकतंत्र की प्रतिष्ठा केवल इस बात से नहीं बनती कि यहां चुनाव होते हैं। उसकी असली ताकत इस बात में है कि चुनाव पर सवाल उठाने वाले को जवाब मिलता है या रास्ता रोक दिया जाता है। असहमति रखने वाले को तर्क सुनने को मिलता है या हिरासत का डर। और नागरिक को शिकायत करने का अधिकार मिलता है या चुप रहने की सलाह। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि किसी एक चिट्ठी से न बनती है न बिगड़ती है। लेकिन ऐसी घटनाएं लगातार चर्चा में रहें तो लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर सवाल जरूर उठते हैं। अमेरिकी सांसदों की चिट्ठी को भारत की ओर से खारिज किया जा सकता है। संयुक्त राष्ट्र की टिप्पणी पर सरकार आपत्ति जता सकती है। मगर इन प्रतिक्रियाओं से जंतर-मंतर के सवाल समाप्त नहीं होंगे। उनका जवाब भारतीय नागरिकों को चाहिए चुनाव आयोग की पारदर्शिता से पुलिस कार्रवाई की जवाबदेही से और विरोध के अधिकार की स्पष्ट सुरक्षा से।




