गुजरात में हिंदुवादी पार्टी को बड़ा झटका, गोदी मीडिया ने छुपाई बड़ी खबर!
गुजरात से एक बेहद चौंकाने वाली और बड़ी खबर सामने आई है... जिसे मुख्यधारा की मीडिया या तथाकथित गोदी मीडिया पूरी तरह से दबाने...

4पीएम न्यूज नेटवर्कः पिछले महीने गुजराती साहित्य परिषद के लिए हुए चुनावों में जाने-माने कथाकार.. और आलोचक किरीट दूधात ने सरकारी मान्यता प्राप्त लेखिका उषा उपाध्याय को भारी बहुमत से हराकर परिषद के अध्यक्ष का पद जीत लिया है.. बुधवार को हुई वोटों की गिनती से यह स्पष्ट हो गया.. किरीट दूधात को 824 वोट मिले.. जबकि उषा उपाध्याय को लगभग 562 से 566 वोट मिले.. इस तरह किरीट दूधात 257 वोटों के बड़े अंतर से चुने गए.. परिषद की 40 सदस्यीय मध्यस्थता समिति में भी उनके पैनल को भारी बहुमत मिला.. यह नतीजा केवल एक व्यक्तिगत जीत नहीं.. बल्कि साहित्यिक संस्था की स्वायत्तता की रक्षा का प्रतीक बन गया है.. गुजरात सरकार के अधीन गुजराती साहित्य अकादमी अपनी स्वायत्तता खो चुकी है.. और कई लेखक डेढ़ दशक से इसके खिलाफ संघर्षरत हैं.. अकादमी के मौजूदा अध्यक्ष भाग्येश झा के आशीर्वाद के बावजूद उषा उपाध्याय हार गईं..
गुजराती साहित्य परिषद में पूरे गुजरात से लगभग 3500 सदस्य हैं.. और इस चुनाव में 1547 लोगों ने मतदान किया.. मतदाताओं की अप्रत्याशित संख्या को देखकर अटकलें लगाई जा रही थी.. कि भगवा खेमा परिषद पर नियंत्रण स्थापित कर लेगा.. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.. 1905 में स्थापित इस संस्था का गौरवशाली इतिहास रहा है.. 1936 में अहमदाबाद में हुए वार्षिक सम्मेलन में महात्मा गांधी स्वयं इसके अध्यक्ष रहे थे.. रणजीतराम मेहता द्वारा स्थापित इस परिषद ने गुजराती साहित्य को समाज के सभी वर्गों तक पहुंचाने.. और साहित्यिक चेतना जगाने का काम किया है.. कन्हैयालाल मुंशी, काकासाहेब कालेलकर, उमाशंकर जोशी.. जैसे दिग्गजों ने इसकी अध्यक्षता की है.. आज भी यह संस्था साहित्य की स्वतंत्र आवाज बनाए रखने का प्रयास कर रही है..
जानकारी के मुताबिक चुनाव में काफी विवाद हुआ.. उषा उपाध्याय का समर्थन करने वाले कुछ लेखकों.. और साहित्य प्रेमियों ने उनके ‘परिवर्तन मंच’ की जीत सुनिश्चित करने के लिए फेसबुक पर अनुचित भाषा का इस्तेमाल किया.. मुंबई के जाने-माने लेखक सौरभ शाह जिनके उपन्यास पर आधारित ‘महाराज’ फिल्म बनी थी.. उन्होंने धर्म के नाम पर सूरत के वैष्णव समुदाय में हो रहे यौन शोषण का मुद्दा उठाया.. और खुलकर उषा उपाध्याय का समर्थन किया.. नडियाद के पत्रकार जसवंत रावल, जिन्हें नरेंद्र मोदी का कट्टर समर्थक माना जाता है.. उनको भी पूरा यकीन था कि उषा उपाध्याय ही जीतेंगी.. जिसके चलते सौरभ शाह तो आतिशबाजी लेकर अहमदाबाद में परिषद परिसर तक पहुंच गए थे.. लेकिन गुजराती लेखकों.. और साहित्य प्रेमियों की समझदारी ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया..
आपको बता दें कि किरीट दूधात एक सेवानिवृत्त गुजरात प्रशासनिक सेवा अधिकारी हैं.. और उन्होंने साहित्य के प्रति समर्पण के लिए स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली.. वे परिषद की साहित्यिक पत्रिका ‘परब’ के संपादक भी हैं.. और कहानीकार-आलोचक के रूप में पहचाने जाते हैं.. उनका जन्म सौराष्ट्र के अमरेली जिले के गांव में हुआ.. वे गुजराती कहानी लेखन और आलोचना में सक्रिय रहे हैं.. उषा उपाध्याय गुजरात विद्यापीठ के गुजराती विभाग की पूर्व प्रमुख हैं.. और लेखिका-कवयित्री के रूप में जानी जाती हैं.. दोनों उम्मीदवारों के बीच मुकाबला साहित्यिक मूल्यों बनाम कथित सरकारी प्रभाव का प्रतीक बन गया..
वहीं छह साल पहले जब जाने-माने पत्रकार, लेखक और धर्मनिरपेक्ष कार्यकर्ता प्रकाश एन. शाह ने अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ा था.. तब किरीट दूधात ने उनका विरोध किया था.. तीन साल पहले हर्षद त्रिवेदी ने प्रकाश एन. शाह को हराकर पद हासिल किया.. और तब दूधात उनके साथ थे.. अब हर्षद त्रिवेदी से पदभार लेने वाले किरीट दूधात परिषद को सरकारी सत्ता की चापलूसी से दूर रखने का वादा करते नजर आते हैं.. नया अध्यक्ष 1 जनवरी 2027 को पदभार ग्रहण करेगा.. बता दें कि यह बदलाव परिषद की पहचान और मूल स्वरूप को बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है..



