आखिर क्यों अब हर बार मुंह की खानी पड़ती है चीन को, जानिए क्या है वह वजह

नई दिल्ली। एलएसी यानी लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल को लेकर चीन की थेथरई कोई नई बात नहीं है. चीन, जिसका 40 फीसदी से ज्यादा हिस्सा हथियाया हुआ है, वो भारत की जमीन पर टेढ़ी नजर रखता है. भारत और चीन के बीच यह सीमा रेखा 3488 किमी लंबी है. इस सीमा रेखा पर करीब 25 ऐसे पॉइंट्स हैं, जहां भारत के साथ चीन का विवाद है और इनको लेकर दोनों देशों के बीच कई बार झड़पें हो चुकी हैं.
पूर्व सेना प्रमुख मनोज मुकुंद नरवणे के अनुसार चीन हर साल 3-4 बार ऐसी कोशिशें करता है और हर बार मुंह की खाता है. बीते 9 दिसंबर को भी वही हुआ. इसके बाद से सीमा पर तनाव एक बार फिर बढ़ गया है. जानकारों का मानना है कि भारत युद्ध की बजाय बातचीत से मसले का हल चाहता है. हालांकि चीन के नापाक मंसूबे को देखते हुए भारतीय सेना ने भी तैयारी कर रखी है.
जानकार मानते हैं, चीन सीमा पर तैयारी दिखाकर भले ही हावी होने की कोशिश कर ले, लेकिन युद्ध चीन के लिए भी ठीक विकल्प नहीं है. यह भी संभव है कि जीरो कोविड नीति पर फेल जिनपिंग सरकार राष्ट्रवाद के सहारे अपने नागरिकों का ध्यान भटकाने के लिए ऐसा कर रही हो.
चीन इस बात को समझता है कि यह 1962 का हिंदुस्तान नहीं है, बल्कि 2022 का हिंदुस्तान है, जिसने उसे ग्लोबली हर मोर्चे पर घेर रखा है. विदेश मामलों के जानकार भी बताते हैं कि भारत की कूटनीति और विदेश नीति चीन की हालत पस्त करने के लिए काफी है. इसे चार पॉइंट में समझने की कोशिश करते हैं.
2019 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अरुणाचल दौरे के दौरान 4 हजार करोड़ रुपये की परियोजनाओं का शिलान्यास किया तो चीन बौखला गया था. चीन की बौखलाहट का भारत पर कोई असर नहीं रहा और अपने लक्ष्य पर भारत अडिग है. सरकार ने भारत-चीन सीमा पर इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत करने की दिशा में कई कदम उठाए हैं. खासकर हिमालयन बॉर्डर पर.
बेहतर कनेक्टिविटी से भारतीय सेना जल्द से जल्द पहुंचने में सक्षम होगी. भारत-चीन सीमा पर 61 सडक़ें हैं जो स्ट्रेजिक तौर महत्वपूर्ण हैं. इनमें से 1530 किलोमीटर की 42 सडक़ें पिछले साल तक कंप्लीट हो चुकी हैं, जबकि 7000 किमी की 130 सडक़ों पर निर्माण कार्य चल रहा है. चीन सीमाई इलाकों को विवादित बताते हुए कहता है कि निर्माण गतिविधियों से सीमा पर तनाव की स्थिति बन सकती है. इधर, चीन की गीदड़भभकी का भारत पर कोई असर नहीं पड़ता.
भारतीय सेना की ताकत पिछले कुछ वर्षों में कई गुना बढ़ी है. ग्लोबल फायरपावर (त्रस्नक्क) एनुअल डिफेंस रिव्यू के अनुसार, रिजर्व अर्धसैनिक बलों को जोडक़र भारत के पास 51 लाख से ज्यादा सैनिक है, जबकि चीन का आंकड़ा 31.34 लाख है. सरकार भारतीय सेना के हथियारों को भी मॉडर्नाइज कर रही हैं.
कॉम्बैट टैंक फ्लीट साइज, टोड आर्टिलरी, स्पेशल एयरक्राफ्ट, युद्धपोत, पनडुब्बी, वॉरफेयर शिप, एयरक्राफ्ट कैरियर जैसे अत्याधुनिक तकनीकों से लैस हथियारों के साथ भारतीय सेना दुनिया की टॉप आर्मीज में शामिल है. मॉडर्नाइजेशन के 93 प्रोजेक्ट्स पर काम चल रहा है और इसमें से कई प्रोजेक्ट्स में बातचीत खरीद के स्तर पर पहुंच गई है.
चीन को तोडऩे के लिए उसे इकोनॉमिक चोट देना बहुत कारगर साबित हुई है. यह भारत की असरदार नीति साबित हुई है. क्वाड की पार्टनरशिप से भारत चीन को जवाब दे रहा है. इससे चीन के इकोनॉमिक एक्सपेंशन को रोकने के प्रयास किए गए हैं. 2017 में हुए आसियान शिखर सम्मेलन के दौरान ‘भारत-ऑस्ट्रेलिया-जापान-अमेरिका’ संवाद के साथ क्वाड अस्तित्व में आया था.
चीन के लिए क्वाड उसके चार विरोधी देशों का समूह है. क्वाड के तहत भारत की नीति ये है कि चारों देश मिलकर आपस में सप्लाई चेन बनाएंगे और ग्रीन टेक्नोलॉजी साझा करेंगे. चीन पर निर्भरता कम करने की दिशा में यह एक बड़ा कदम साबित होगा.
कुछ महीने पहले आर्थिक विशेषज्ञों की एक रिपोर्ट आई थी, जिसके अनुसार यूरोपीय कंपनियां चीन छोड़ भारत का रुख कर रही हैं. ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई 2022 तक 23 फीसदी यूरोपीय कंपनियां चीन से बाहर निकल चुकी हैं. ये कंपनियां एशिया में वियतनाम, इंडोनेशिया और भारत आ रही हैं. भारत चूंकि एक बड़ा बाजार है और यहां उत्पादों की खपत भी ज्यादा है, इसलिए विदेशी कंपनियों के भारत आने का सिलसिला भी हाल के महीनों में बढऩे लगा है.
भारत अपने पड़ोसी देशों के साथ अच्छे रिश्ते बना रहा है. कई देशों को संकट से उबारने में भारत ने आगे आकर मदद की है. चीन को मात देने के लिए पीएम नरेंद्र मोदी की विदेश नीति में ‘अपने पड़ोसियों के साथ अच्छे रिश्ते बनाने की कोशिश’ भी शामिल है. ध्यान देनेवाली बात ये भी है कि भारत के पड़ोसी देशों पर चीन की भी नजर है. श्रीलंका, मालदीव और नेपाल चीन के ट्रैप में फंसते दिख रहे हैं, जबकि बांग्लादेश के लिए भी चीन नंबर वन डिफेंस स्पलायर बन गया है.
ऐसे में भारत के लिए यह महत्वपूर्ण भी है कि वो अपने पड़ोसियों के साथ संबंध और बेहतर करे. भारत इसमें चीन से बीस साबित हो रहा है. श्रीलंका को अंधेरे से निकालने में भारत की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता. भारत ने शायद ही किसी और देश की ऐसी मदद की होगी. पीएम मोदी के इस कदम की आलोचना भी हुई, लेकिन आलोचकों को भी बाद में समझ आया कि इसके पीछे भारत की कारगर विदेश नीति शामिल है.
भारत की विदेश नीति खासकर चीन को लेकर आक्रामक रही है. हालांकि जानकार मानते हैं कि आयात के मामले में चीन पर अभी और चोट करने की जरूरत है. साल 2020-21 में चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा करीब 48 अरब अमेरिकी डॉलर का रहा था. जानकार, आयात और निर्यात के अनुपात को संतुलित करने की जरूरत पर बल देते हैं.

 

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