AIMPLB उपाध्यक्ष का सरकार पर हमला, बोले-हमारे अधिकारों पर सीधा हमला हो रहा

आजमी ने कहा कि इतिहास गवाह है, जब शरीयत और अस्तित्व पर हमला होता है तो जनता की अदालत में जाना अनिवार्य हो जाता है.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के उपाध्यक्ष आजमी ने आरोप लगाते हुए कहा कि धार की ‘कमल मौला मस्जिद’ और अन्य ऐतिहासिक मस्जिदों और वक्फ संपत्तियों पर अतिक्रमण और उन्हें नष्ट करने का सिलसिला जारी है. दो-टूक शब्दों में यह कहना चाहता हूं कि अब केवल औपचारिकता, रस्मी बयानों और कागजी कार्यवाही का समय पूरी तरह खत्म हो चुका है.

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के उपाध्यक्ष उबेदुल्लाह आजमी ने बोर्ड अध्यक्ष को पत्र लिखकर कई मुद्दों पर अपनी बात रखी. आजमी ने कहा कि इतिहास गवाह है, जब शरीयत और अस्तित्व पर हमला होता है तो जनता की अदालत में जाना अनिवार्य हो जाता है. उन्होंने कहा कि सार्वजनिक स्तर पर उठाई गई संगठित आवाजों लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शनों और सड़कों पर दिखाई देने वाली एकता का सरकारों पर सीधा असर पड़ता है.

आजमी ने कहा कि बंगाल जैसे राज्यों के शिक्षा संस्थानों में मासूम मुस्लिम बच्चों पर वंदे मातरम गाने का दबाव डाला जा रहा है. वंदे मातरम हमारी एकेश्वरवाद की आस्था पर गंभीर आघात है, इसे किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं कर सकते.

शरीयत पर सीधा हमला
उन्होंने कहा कि उत्तराखंड जैसे राज्य में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करना और पूरे देश में इसकी तैयारी का चलना हमारे शरीयत पर सीधा हमला है. आजमी ने मांग की कि बिना किसी देरी के ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की आपात बैठक बुलाई जाए. दो-टूक शब्दों में यह कहना चाहता हूं कि अब केवल औपचारिकता, रस्मी बयानों और कागजी कार्यवाही का समय पूरी तरह खत्म हो चुका है.

न्यायिक और कानूनी लड़ाई
आजमी ने आरोप लगाते हुए कहा कि धार की ‘कमल मौला मस्जिद’ तथा अन्य ऐतिहासिक मस्जिदों और वक्फ संपत्तियों पर अतिक्रमण और उन्हें नष्ट करने का सिलसिला जारी है. यह संतोष की बात है और राष्ट्र भी इस बात की सराहना करता है कि बोर्ड इन मामलों में पूरी सतर्कता के साथ न्यायिक और कानूनी लड़ाई लड़ रहा है.

अदालतों पर निर्भर रहना लापरवाही होगी
लेकिन हमें इस कड़वी सच्चाई को स्वीकार करना होगा कि फासीवाद के इस तूफान को केवल बंद कमरों में होने वाली कानूनी कार्यवाहियों से नहीं रोका जा सकता. मौजूदा परिस्थितियों में, जब व्यवस्था के कई स्तंभ दबाव में प्रतीत होते हैं, तो केवल अदालतों पर निर्भर रहना एक आपराधिक लापरवाही होगी.

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