अमेरिका ने सीजफायर की 3 शर्तें तोड़ीं, ईरान बोला- अब बातचीत बेकार

ईरान ने आज कड़े लफ्ज़ों में ऐलान कर दिया है कि अब अमेरिका से बातचीत करना बेकार है, क्योंकि वाशिंगटन ने सीज़फायर की 3 बड़ी शर्तें तोड़ दी हैं।

4pm न्यूज नेटवर्क: दुनिया को लगा था कि कयामत टल गई है, लेकिन सच तो ये है कि सुपरपावर अमेरिका और इज़राइल ने मिलकर दुनिया की आँखों में धूल झोंकी है। सीज़फायर के ऐलान को अभी 48 घंटे भी नहीं बीते कि समझौते की धज्जियां उड़ चुकी हैं।

ईरान ने आज कड़े लफ्ज़ों में ऐलान कर दिया है कि अब अमेरिका से बातचीत करना बेकार है, क्योंकि वाशिंगटन ने सीज़फायर की 3 बड़ी शर्तें तोड़ दी हैं। एक तरफ ट्रंप शांति का राग अलाप रहे हैं और दूसरी तरफ लेबनान की सरज़मीं पर इज़राइली मिसाइलें बेगुनाहों का खून बहा रही हैं। तेहरान ने साफ कह दिया है कि सीज़फायर और लेबनान में कत्लेआम एक साथ नहीं चल सकते।

ईरान के तेवर अब सातवें आसमान पर हैं। तेहरान ने आधिकारिक तौर पर कहा है कि अमेरिका भरोसे के काबिल नहीं है। सीज़फायर की शर्तों के मुताबिक लेबनान और सीरिया में भी हमलों पर लगाम लगनी थी, लेकिन इज़राइल ने ट्रंप की शह पर लेबनान को ‘कब्रिस्तान’ बनाना शुरू कर दिया है। ईरान का सीधा आरोप है कि अमेरिका ने सीज़फायर की वो 3 बुनियादी शर्तें तोड़ दी हैं, जो समझौते की बुनियाद थीं। ईरान के विदेश मंत्रालय ने साफ कर दिया है कि अगर लेबनान में हिज़बुल्लाह और आम नागरिकों पर हमले नहीं रुके, तो ईरान इस सीज़फायर को अपनी जूतियों की नोक पर रखता है।

तेहरान का रुख अब आर-पार का है कि अगर इज़राइल को खुली छूट दी गई, तो ईरान ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ को हमेशा के लिए दफन कर देगा, जिससे पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था दम तोड़ देगी। ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि लेबनान में हमले जारी रहते हुए सीज़फायर की बात उसे कतई मंजूर नहीं है। ईरान के उप विदेश मंत्री सईद खातिबजादेह ने कहा कि अगर सीज़फायर में लेबनान शामिल है, तो वहां इज़राइल के हमले तुरंत रुकने चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि अमेरिका का करीबी सहयोगी इज़राइल, लेबनान में बड़े पैमाने पर हिंसा कर रहा है। खातिबजादेह ने इन हमलों को ‘जनसंहार’ करार दिया और कहा कि यह सीज़फायर की रूह (भावना) के खिलाफ है। हालांकि इज़राइल का अब भी यही दावा है कि वह लेबनान में सिर्फ हिज़बुल्लाह को निशाना बना रहा है।

ईरान ने अमेरिका पर सीज़फायर से जुड़ी तीन अहम शर्तों के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए कहा कि अब बातचीत का कोई मतलब नहीं रह गया है। ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाकेर गालिबाफ ने कहा कि अमेरिका पर उनका अविश्वास उसकी बार-बार प्रतिबद्धताएं तोड़ने की आदतों की वजह से है। इस बार भी वही पुराना पैटर्न दोहराया गया है। उन्होंने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने खुद ईरान के 10-पॉइंट प्रस्ताव को बातचीत का आधार माना था, लेकिन वार्ता शुरू होने से पहले ही उसकी शर्तों को तार-तार कर दिया गया।

गालिबाफ के मुताबिक, पहली शर्त लेबनान में सीज़फायर लागू करने की थी, लेकिन वहां इज़राइल के हमले बदस्तूर जारी हैं। उन्होंने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के उस बयान का भी ज़िक्र किया, जिसमें हर जगह, खासकर लेबनान में तुरंत सीज़फायर की बात कही गई थी। उन्होंने संगीन आरोप लगाया कि दूसरी शर्त के तहत ईरान के एयरस्पेस (वायुक्षेत्र) का उल्लंघन नहीं होना था, लेकिन फार्स प्रांत के लार शहर में एक घुसपैठिया ड्रोन भेजा गया, जिसे ईरानी सेना ने मार गिराया। तीसरी शर्त में ईरान के यूरेनियम संवर्धन (Enrichment) के अधिकार को मान्यता दी गई थी, लेकिन अब अमेरिका इस अधिकार को सिरे से नकार रहा है। गालिबाफ ने दो-टूक कहा कि जिस आधार पर बातचीत होनी थी, जब वही टूट चुका है, तो अब द्विपक्षीय सीज़फायर या वार्ता करना तर्कसंगत नहीं रह गया है।

अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित सीज़फायर समझौते को लेकर जबरदस्त भ्रम बना हुआ है। ट्रंप और अमेरिकी प्रशासन के दावों में भारी अंतर सामने आया है, जिससे समझौते की शर्तें स्पष्ट नहीं हो पा रही हैं। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि ईरान की ओर से दो अलग-अलग 10-पॉइंट प्लान दिए गए थे, जिनमें से एक को खारिज कर दिया गया और दूसरे को स्वीकार किया गया। हालांकि रिपोर्ट्स के मुताबिक, हकीकत में केवल एक ही प्लान था, जिस पर ट्रंप ने अपनी प्रतिक्रिया दी थी।

ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में 2 हफ्ते के सीज़फायर को स्वीकार करने की बात कही थी, ताकि बातचीत शुरू हो सके। उन्होंने यह भी कहा था कि अमेरिका और ईरान के बीच ज्यादातर मतभेद लगभग सुलझने के करीब हैं। लेकिन इसके महज़ 24 घंटे बाद ही प्रशासन की ओर से अलग बयान सामने आया, जिसमें कहा गया कि यह वह समझौता नहीं था जिस पर सहमति बनी थी। इस पूरे विवाद का केंद्र अब लेबनान बना हुआ है। अमेरिकी प्रशासन और उपराष्ट्रपति ने साफ कर दिया है कि लेबनान में इज़राइल की सैन्य कार्रवाई इस सीज़फायर समझौते का हिस्सा नहीं है। इस विरोधाभास के चलते यह साफ नहीं हो पा रहा है कि आखिर ट्रंप ने किस समझौते को स्वीकार किया था और वे दुनिया को क्या दिखाना चाह रहे थे।

अमेरिका के कुछ मीडिया संस्थानों ने इस बात को साफ तौर पर लिखा है, लेकिन ट्रंप और व्हाइट हाउस इस पर बुरी तरह आगबबूला हो गए हैं। ट्रंप ने न्यूयॉर्क टाइम्स और सीएनएन पर संगीन इल्ज़ाम लगाए हैं। ट्रंप का कहना है कि ये मीडिया संस्थान ‘फेक ईरान प्लान’ छाप रहे हैं ताकि उनकी साख खराब की जा सके। लेकिन ट्रंप साहब, दुनिया पूछ रही है कि अगर मीडिया झूठ बोल रहा है, तो आपका व्हाइट हाउस सच क्यों नहीं बोल रहा? एक दिन आप कहते हैं कि 10 सूत्रीय एजेंडा मिल गया, और अगले ही दिन आपका दफ्तर उसे ‘बकवास’ करार देता है। हकीकत तो ये है कि ट्रंप खुद नहीं जानते कि उन्हें करना क्या है।

वे नेतन्याहू की ज़िद और ईरान के अडिग हौसले के बीच ऐसे फंस गए हैं कि अब उन्हें हर तरफ ‘फेक न्यूज़’ नज़र आ रही है। यह ट्रंप की कूटनीतिक नाकामी का सबसे बड़ा सबूत है।  इस पूरे ड्रामे में पाकिस्तान की भूमिका बहुत अहम थी। ट्रंप ने शहबाज़ शरीफ और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के ज़रिए ईरान को बातचीत की मेज़ पर लाने की कोशिश की थी। लेकिन अब खबर आ रही है कि सीज़फायर की बारीकियों को लेकर अमेरिका और पाकिस्तान में गहरे मतभेद पैदा हो गए हैं।

पाकिस्तान चाहता है कि सीज़फायर मुकम्मल हो और इसमें लेबनान को भी शामिल किया जाए, लेकिन ट्रंप प्रशासन इज़राइल को ‘लाडला’ बनाए रखना चाहता है। इस्लामाबाद को अब ये डर सता रहा है कि अगर यह समझौता नाकाम हुआ, तो ईरान का गुस्सा पाकिस्तान पर भी फूट सकता है। अमेरिका की दोहरी नीति ने पाकिस्तान को भी एक मुश्किल कगार पर खड़ा कर दिया है। शुक्रवार को होने वाली जेडी वांस की पाकिस्तान यात्रा से पहले ये मतभेद किसी बड़े धमाके की ओर इशारा कर रहे हैं।

हालांकि बेंजामिन नेतन्याहू इस वक्त दुनिया के सबसे बड़े विलेन (Villain) बनकर उभरे हैं। उन्होंने सरेआम कह दिया है कि लेबनान समझौते का हिस्सा नहीं है। सीज़फायर के नाम पर इज़राइल ने लेबनान में हमलों की रफ्तार और तेज़ कर दी है। पिछले 24 घंटों में सैकड़ों मासूम मारे जा चुके हैं। इज़राइल की ये ज़िद ट्रंप की कमज़ोरी को ज़ाहिर करती है। ऐसा लगता है कि ट्रंप सिर्फ नाम के राष्ट्रपति हैं, असली हुकूमत तो नेतन्याहू चला रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया जैसे मुल्कों ने भी अमेरिका को फटकार लगाते हुए कहा है कि यह ‘आधा-अधूरा’ सीज़फायर एक मज़ाक है। आप एक मुल्क को बचाएंगे और दूसरे को मिटा देंगे, ये इंसाफ नहीं बल्कि इज़राइली आतंकवाद को अमेरिका की सरपरस्ती है।

इस बीच ईरान से जो तस्वीरें आ रही हैं, वो व्हाइट हाउस की नींद उड़ाने के लिए काफी हैं। ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई की मौत को 40 दिन पूरे हो चुके हैं। इस मौके पर ईरान की सड़कों पर लाखों का मजमा उतरा है। ईरानी अवाम का ये जज़्बा बता रहा है कि वे झुकने वाले नहीं हैं। मोजतबा खामेनेई के नेतृत्व में ईरान अब उस इंतकाम की तैयारी कर रहा है, जिसकी कल्पना भी ट्रंप ने नहीं की होगी। सड़कों पर गूँजते ‘मर्ग बर अमेरिका’ (अमेरिका मुर्दाबाद) और ‘मर्ग बर इज़राइल’ के नारे बता रहे हैं कि सीज़फायर का नाटक अब खत्म होने वाला है।

ऐसे में साफ है कि ट्रंप की बिछाई बिसात अब पूरी तरह उलझ चुकी है। उन्होंने वादा तोड़ा, इज़राइल ने बमबारी बढ़ाई और ईरान ने बातचीत से हाथ खींच लिए। व्हाइट हाउस की पलटी और पाकिस्तान के साथ मतभेद ने ये साफ कर दिया है कि यह सीज़फायर महज़ एक सियासी चाल थी, जो बुरी तरह नाकाम हो चुकी है।

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