अमेरिका का खेल खत्म! चीन की तगड़ी घेराबंदी से ट्रंप हैरान
ईरान का कहना है कि जहाज़ के पास 'परमिशन' नहीं थी। अब आप कहेंगे कि पाकिस्तान तो ईरान का दोस्त है, फिर ऐसा क्यों? असल में यह ईरान का एक कूटनीतिक संदेश है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: एक तरफ ईरान ने होर्मुज में पाकिस्तानी जहाज़ों को रोककर अपनी ताकत दिखा दी है, तो दूसरी तरफ चीन ने तगड़ी चाल चलते हुए अमेरिकी जहाज़ों को घेर रखा है, जिसकी सूचना लीक होते ही व्हाइट हाउस तक हड़कंप मच गया है। ईरान ने साफ कह दिया है कि हमें ट्रंप के वादों पर ज़रा भी भरोसा नहीं है।
ईरान का कहना है कि जहाज़ के पास ‘परमिशन’ नहीं थी। अब आप कहेंगे कि पाकिस्तान तो ईरान का दोस्त है, फिर ऐसा क्यों? असल में यह ईरान का एक कूटनीतिक संदेश है। ईरान दुनिया को दिखाना चाहता है कि होर्मुज का ‘टोल नाका’ अब पूरी तरह उसके कब्ज़े में है। चाहे कोई दोस्त हो या दुश्मन, अगर अमेरिका की ‘हवा’ उस जहाज़ को छुई है, तो उसे ईरान की इजाज़त लेनी होगी।
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने साफ किया है कि “हमें इस्लामाबाद की मंशा पर शक नहीं है, हम उनके संपर्क में हैं, लेकिन सुरक्षा के प्रोटोकॉल सबके लिए बराबर हैं।” यह सीधा तमाचा है ट्रंप के मुँह पर, जो दावा कर रहे थे कि उन्होंने होर्मुज को ‘फ्री’ करा लिया है। ‘अल जज़ीरा’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान के ‘इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स’ ने पाकिस्तान के ‘सेलेन’ नाम के एक जहाज़ को होर्मुज स्ट्रेट पार करने से रोक दिया, क्योंकि उसके पास इसकी इजाज़त नहीं थी।
आईआरजीसी के नेवी कमांडर अलीरेज़ा तंगसीरी ने बताया कि जहाज़ ने नियमों का पालन नहीं किया, इसलिए उसे वापस भेज दिया गया। उन्होंने साफ कहा कि इस रास्ते से गुज़रने वाले हर जहाज़ को पहले ईरान के अधिकारियों से इजाज़त लेनी होगी।
पाकिस्तान इस समय ईरान और अमेरिका के बीच सुलह-समझौता कराने की कोशिश में है। ईरान इस्लामाबाद की मंशा को तो ठीक मान रहा है, लेकिन ट्रंप पर उसका भरोसा नहीं जम पा रहा है। ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बगाई ने कहा है कि “ट्रंप की बातचीत और कूटनीति के दावे पर भरोसा नहीं किया जा सकता।”
‘इंडिया टुडे’ से बातचीत में बगाई ने बताया कि कई देशों ने अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता की पेशकश की है। उन्होंने कहा, “पिछले कुछ दिनों से संदेश आ रहे हैं और हमने उनका जवाब भी दिया है। हमारा रुख साफ है—हम अपनी रक्षा जारी रखेंगे।”
बगाई ने कहा कि अमेरिका का बातचीत करने का दावा सच्चाई से मेल नहीं खाता। उन्होंने सवाल उठाया, “ईरान पर लगातार अमेरिका और इज़राइल की ओर से बमबारी और मिसाइल हमले हो रहे हैं। ऐसे में उनकी कूटनीति और मध्यस्थता की बात भरोसेमंद नहीं लगती। जिन्होंने युद्ध शुरू किया है और जो लगातार हमले कर रहे हैं, क्या कोई उनके दावे पर विश्वास कर सकता है?”
पाकिस्तान की भूमिका पर बगाई ने कहा कि ईरान को इस्लामाबाद की नीयत अच्छी लगती है। उन्होंने बताया कि ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची अपने पाकिस्तानी समकक्ष और अन्य देशों के राजनयिकों के संपर्क में हैं। ऐसे में साफ है कि ईरान कहीं न कहीं इस्लामाबाद की ओर से शुरू की गई बातचीत पर भरोसा कर रहा है, लेकिन ट्रंप के दावों से वह संतुष्ट नहीं है।
इस बीच असली खेल तो बीजिंग में खेला जा रहा है। ट्रंप साहब दुनिया को बता रहे हैं कि वे ईरान से बात कर रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि ईरान अब चीन के ‘सुरक्षा कवच’ में आ गया है। चीन ने ईरान को वो तकनीक और खुफिया जानकारी दे दी है, जिससे अमेरिका के ‘स्टील्थ’ विमान भी अब ईरान के रडार पर नज़र आ रहे हैं।
ट्रंप जो कल तक ‘बुलिंग’ कर रहे थे, आज वे चीन की इस घेरेबंदी से घबराए हुए हैं। चीन ने ईरान को ‘युआन’ में पेमेंट करने का रास्ता दे दिया है, जिससे डॉलर की बादशाहत खत्म हो रही है। ट्रंप ने जिस ईरान को कमज़ोर समझा था, आज वही ईरान चीन के कंधे पर बंदूक रखकर अमेरिका की साख पर निशाना साध रहा है।
गुआम से लेकर हवाई तक में चीनी पोत और सबमरीन (पनडुब्बियों) की मौजूदगी के प्रमाण मिले हैं। यह मामला उस वक्त सामने आया जब अमेरिकी नौसेना ने श्रीलंका के तट से कुछ ही दूरी पर इंटरनेशनल वाटर्स में ईरानी वॉरशिप ‘IRIS डेना’ को सबमरीन अटैक में ध्वस्त कर दिया। इसके जवाब में चीन ने ‘रिसर्च’ के नाम पर हिंद महासागर से लेकर प्रशांत महासागर तक में 42 या उससे ज़्यादा पोत भेज दिए हैं।
इसके अलावा चीनी पनडुब्बियां भी लगातार अपने अभियान पर हैं। नेवल एक्सपर्ट्स का मानना है कि चीन के इस कैंपेन का सैन्य महत्व काफी ज़्यादा है, क्योंकि इसके ज़रिए वह ‘सी-बेड’ यानी समुद्र की सतह का नक्शा तैयार कर रहा है। यह इसलिए किया जा रहा है ताकि युद्ध के समय पनडुब्बियों को ‘हाइड’ किया जा सके और घात लगाकर दुश्मन पर अटैक किया जा सके।
डोनाल्ड ट्रंप ईरान वॉर में लगातार ‘इंटरनेशनल को-ऑपरेशन’ की बात कर रहे हैं और भारत से भी संवाद जारी है। लेकिन चाइनीज नेवी के इस कैंपेन को देखते हुए अमेरिका के लिए अब यह ज़रूरी हो गया है कि वह अपने क्षेत्र पर विशेष ध्यान दे। इस अभियान का एक प्रमुख उदाहरण ‘डोंग फांग होंग-3’ नामक शोध पोत है, जिसे चीन की ओशन यूनिवर्सिटी संचालित करती है। यह पोत वर्ष 2024 और 2025 के दौरान ताइवान, गुआम और हिंद महासागर के रणनीतिक क्षेत्रों में सक्रिय रहा।
शिप ट्रैकिंग डेटा के मुताबिक, इसने जापान के आसपास समुद्री सेंसरों की निगरानी की और मलक्का जलडमरूमध्य के पास व्यापक सर्वेक्षण किया। हालांकि, चीन का दावा है कि ये गतिविधियाँ वैज्ञानिक उद्देश्यों के लिए हैं, लेकिन रक्षा विशेषज्ञ इसे ‘पनडुब्बी संचालन’ की तैयारी मान रहे हैं। हिंद महासागर से लेकर होर्मुज तक चीन की यह सक्रियता संकेत है कि वह ईरान को पूरा सपोर्ट कर रहा है। अगर अमेरिका होर्मुज को जीतने या अपनी सेना उतारने की कोशिश करता है, तो चीन वहां बड़ा खतरा पैदा कर सकता है।
हालांकि ट्रंप ने दावा किया कि उनकी ईरान के टॉप लीडर्स से बात हो रही है, लेकिन अब्बास अराघची ने तेहरान में विदेशी मीडिया के सामने कहा कि “ट्रंप एक ऐसे डीलर हैं जो अपनी हार को जीत बताकर बेचना चाहते हैं।” ईरान को याद है कि कैसे ट्रंप ने पिछले कार्यकाल में परमाणु समझौते को रद्दी की टोकरी में फेंका था। इसीलिए ईरान अब ट्रंप के ’15 पॉइंट’ वाले झांसे में नहीं आ रहा। ईरान का कहना है कि ट्रंप सिर्फ अपनी इकोनॉमी बचाने के लिए तेल की कीमतें गिराना चाहते हैं, उन्हें शांति से कोई मतलब नहीं है। ट्रंप की साख का ये हाल है कि उनके अपने सहयोगी देश भी अब उन पर हंस रहे हैं।
ईरान का बदला अब सिर्फ मिसाइलों से नहीं, बल्कि कूटनीति से पूरा हो रहा है। अमेरिका को मिडिल ईस्ट से बाहर खदेड़ने का जो सपना ईरान ने देखा था, वो अब हकीकत बनता दिख रहा है। होर्मुज पर ईरान का कब्ज़ा पत्थर की लकीर बन चुका है और जिस तरह से हिंद महासागर से लेकर रेड सी और होर्मुज पर चीन एक्टिव हुआ है, यह अमेरिका के लिए कतई शुभ संकेत नहीं है।



