ट्रंप की 15 शर्तें आई सामने, ईरान को “लीबिया” बनाने की कोशिश?

अमेरिका-इज़राइल और ईरान की जंग उस मोड़ पर पहुँच गई है जहाँ एक तरफ ट्रंप अपनी '15 शर्तों' का झुनझुना हिला रहे हैं,

4पीएम न्यूज नेटवर्क: अमेरिका-इज़राइल और ईरान की जंग उस मोड़ पर पहुँच गई है जहाँ एक तरफ ट्रंप अपनी ’15 शर्तों’ का झुनझुना हिला रहे हैं, तो दूसरी तरफ ईरान हर रोज़ 10 मिसाइलें और 100 किलो के बम बरसाकर तेल अवीव को गाजा बनाने पर आमादा हो गया है।

कूटनीति की बातें अपनी जगह हैं, लेकिन ज़मीन पर जो हो रहा है वो रूह कंपा देने वाला है। ईरान ने इज़राइल के रिहायशी और सैन्य ठिकानों पर अपनी ‘फतह’ मिसाइलों की बारिश कर दी है। ईरानी सेना के अनुसार, हर दिन कम से कम 10 ऐसी मिसाइलें दागी जा रही हैं जिनमें 100-100 किलो के ‘हाई-एक्सप्लोसिव’ बम लगे हैं। ऐसे में इज़राइल का ‘आयरन डोम’ अब हांफने लगा है। तेल अवीव और हाइफ़ा जैसे शहरों में लोग बंकरों से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं। ईरान ने साफ कर दिया है कि जब तक इज़राइल की ‘किलिंग मशीन’ नहीं रुकती, तब तक ये मिसाइलें बरसती रहेंगी।

नेतन्याहू, जो कल तक ‘टोटल विक्ट्री’ की बात कर रहे थे, आज वे खुद बंकर में बैठकर ट्रंप से गुहार लगा रहे हैं कि किसी तरह इस आग को थाम लो। लेकिन ट्रंप का तरीका शांति का नहीं, बल्कि ‘ब्लैकमेल’ का है। इज़राइली आर्मी रेडियो के मुताबिक, ईरान ने अभी-अभी 40 मिनट के भीतर इज़राइल की ओर चार मिसाइलें दागीं। रिपोर्ट के अनुसार, इस दौरान तेल अवीव और आसपास के इलाकों में कई धमाकों की आवाज़ सुनी गई।

असल में पूरा खेल यह है कि ट्रंप सोच रहे हैं कि सुलह के बहाने ईरान को दबा दें और उन पर ‘लीबिया मॉडल’ थोप दें। आपको याद होगा कि कैसे अमेरिका ने मुअम्मर गद्दाफी को झांसा देकर उनके सारे हथियार नष्ट करवाए और फिर लीबिया को बर्बाद कर दिया? ठीक वही खेल अब ईरान के साथ खेला जा रहा है।

ट्रंप की जो 15 शर्तें लीक हुई हैं, वे किसी समझौते का मसौदा नहीं, बल्कि किसी भी देश के लिए ‘डेथ वारंट’ जैसी ही हैं। ट्रंप चाहते हैं कि ईरान न सिर्फ अपने परमाणु ठिकानों को नष्ट करे बल्कि 450 किलो संवर्धित यूरेनियम भी अमेरिका को सौंप दे। सबसे खास बात यह कि अमेरिका चाहता है कि ईरान न सिर्फ अपनी लंबी मारक क्षमता वाली मिसाइलों को नष्ट करे, बल्कि उन पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दे। और सबसे खतरनाक शर्त यह है कि IRGC के ढांचे को पूरी तरह भंग कर दिया जाए, यानी सेना सिर्फ नाम मात्र की आत्मरक्षा के लिए हो, जंग के लिए नहीं।

साफ है कि ट्रंप चाहते हैं कि ईरान पहले अपने दांत और नाखून कटवा दे, ताकि बाद में अमेरिका आसानी से उसका शिकार कर सके। ये 15 सूत्रीय शर्तें ईरान कभी मानने को तैयार नहीं होगा। यही वजह है कि शर्तों को देखने के बाद ईरान ने किसी भी समझौते की बात को सिरे से खारिज कर दिया है। ईरान ने ट्रंप की इन 15 शर्तों को रद्दी की टोकरी में फेंकते हुए अपनी 6 शर्तें सामने रख दी हैं।

ईरान की डिमांड है कि मिडिल ईस्ट से अमेरिकी सेना की मुकम्मल विदाई हो और इज़राइल के परमाणु हथियारों की अंतरराष्ट्रीय निगरानी की जाए। अमेरिका जंग में हुए अरबों डॉलर के नुकसान की भरपाई करे और ईरान पर लगे सभी प्रतिबंध हमेशा के लिए खत्म हों। इसके अलावा, होर्मुज के लिए ईरान नया रूल बनाए, वहां से गुज़रने वालों का टोल टैक्स निर्धारित किया जाए और आखिरी सबसे बड़ी बात—नेतन्याहू पर ‘युद्ध अपराधी’ का मुकदमा चले। अब ज़ाहिर है कि न अमेरिका ईरान की शर्तें मानेगा और न ही ईरान अमेरिका की; इसीलिए सुलह और समझौते के आसार अब ना के बराबर हैं।

ईरान की सबसे बड़ी चिंता यही है कि अगर अमेरिका के इन प्रस्तावों को मान लिया गया, तो उसका हाल ‘लीबिया’ जैसा हो सकता है। वर्ष 2003 में मुअम्मर गद्दाफी ने अपना परमाणु कार्यक्रम छोड़ दिया था, लेकिन 2011 में नाटो (NATO) के हस्तक्षेप के बाद उनकी सत्ता गिर गई और उन्हें बेरहमी से मार दिया गया। इसी वजह से ईरान में यह धारणा मजबूत है कि अगर आपने अपनी ताकत छोड़ी, तो आपकी सुरक्षा भी खत्म हो जाएगी। इसके अलावा, इस बात का कोई भरोसा नहीं है कि कुछ साल बाद इज़राइल और अमेरिका फिर से हमला नहीं करेंगे। ईरान पर कभी भी शर्तों के उल्लंघन का आरोप लगाकर नई जंग शुरू की जा सकती है।

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब ईरान की ‘रिवोल्यूशनरी गार्ड्स’ के आला अफसरों ने तेहरान में एक हाई-लेवल मीटिंग की। सूत्रों के मुताबिक, IRGC नहीं चाहती कि कोई भी ‘बुज़दिल’ समझौता हो। उनका मानना है कि ट्रंप सिर्फ वक्त हासिल करने के लिए बातचीत का नाटक कर रहे हैं ताकि फारस की खाड़ी में तैनात अमेरिकी मरीन अपनी पोजीशन ले सकें। पाकिस्तान में ईरान के राजदूत रज़ा अमीरी मोगद्दाम ने भी कहा है कि ईरान और अमेरिका के बीच अब तक कोई बातचीत नहीं हुई है। उन्होंने साफ कहा कि ट्रंप के दावों के उलट दोनों देशों के बीच न तो सीधी और न ही परोक्ष बातचीत हुई है।

वहीं दूसरी ओर, इज़राइली वित्त मंत्री निर बरकात ने कहा है कि ट्रंप और नेतन्याहू मिलकर ईरान की स्थिति को संभाल रहे हैं। बरकात के मुताबिक, कोई भी समझौता ऐसा होना चाहिए जिससे तेहरान के पास कोई सैन्य क्षमता बाकी न रहे। उन्होंने यह भी माना कि ट्रंप एक तरफ बातचीत का दांव खेल रहे हैं, तो दूसरी तरफ खाड़ी क्षेत्र में सैन्य ताकत बढ़ा रहे हैं। ऐसे में ईरान का सोचना पूरी तरह सही है कि ये 15 सूत्रीय प्रपोजल बस एक प्रोपेगैंडा है।

लिहाज़ा, IRGC का रुख साफ है कि जंग ही इसका फाइनल नतीजा निकालेगी। उन्होंने होर्मुज को पूरी तरह बंद करने की धमकी दी है और कहा है कि अगर अमेरिका ने एक भी कदम आगे बढ़ाया, तो पूरा मिडिल ईस्ट ‘कब्रिस्तान’ बन जाएगा। ट्रंप की शांति वार्ता असल में एक ‘कूटनीतिक ट्रैप’ है, जिसे ईरान के जनरलों ने पहचान लिया है। दोस्तों, ऐसे में साफ है कि ट्रंप और नेतन्याहू इस जंग में बुरी तरह फंस चुके हैं। इज़राइल के अंदर मंदी है, अमेरिका में तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं और ईरान झुकने का नाम नहीं ले रहा। ट्रंप की 15 शर्तें उनकी हताशा दिखा रही हैं,

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