इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, यूपी में जातीय रैलियों पर रोक के आदेश का हो सख्ती से पालन

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने उत्तर प्रदेश में राजनीतिक जातीय रैलियों पर पूर्ण अंकुश लगाने के संबंध में एक ऐतिहासिक निर्देश जारी किया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि प्रदेश सरकार द्वारा जातीय रैलियों पर रोक के लिए जारी किए गए आदेशों और संबंधित नियमों का कड़ाई से प्रभावी पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
सामाजिक वैमनस्यता पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी
न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति अबधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने अधिवक्ता मोतीलाल यादव द्वारा वर्ष 2013 में दायर एक जनहित याचिका को निस्तारित करते हुए यह फैसला सुनाया। याचिका में तर्क दिया गया था कि चुनावों के दौरान होने वाली अंधाधुंध जातीय रैलियों से समाज में आपसी कटुता और वैमनस्यता बढ़ती है।
कोर्ट ने दूरगामी टिप्पणी करते हुए कहा कि, “बच्चों में अच्छे संस्कार डालना ही जातीयता की समस्या का स्थायी समाधान है।”
संवैधानिक नैतिकता और सरकार का रुख
सुनवाई के दौरान पिछले फैसलों का भी हवाला दिया गया, जिसमें ‘जातीय महिमा मंडन’ को संवैधानिक नैतिकता का उल्लंघन बताया गया था। इसी कड़ी में उत्तर प्रदेश सरकार ने सितंबर 2025 में एक शासनादेश जारी कर आपराधिक दस्तावेजों और अन्य सरकारी अभिलेखों में जाति दर्ज न किए जाने का निर्देश दिया था। हाईकोर्ट ने अब सरकार को इसी शासनादेश का अक्षरशः पालन सुनिश्चित करने का आदेश दिया है।
क्या होगा असर?
इस फैसले के बाद अब राजनीतिक दलों के लिए जाति विशेष को केंद्रित कर रैलियां करना और सरकारी दस्तावेजों में जाति का उल्लेख करना कानूनी रूप से और भी चुनौतीपूर्ण होगा। कोर्ट का मानना है कि इससे समाज में समानता आएगी और राजनीतिक लाभ के लिए होने वाले ध्रुवीकरण पर लगाम लगेगी।



