वंदे मातरम् पर घिरी बीजेपी सरकार, प्रियंका चतुर्वेदी का योगी को दिखाया आईना
महाराष्ट्र का सियासी पारा सातवें आसमान पर है। इसी बीच वंदे मातरम् पर देश भर में चर्चाओं का बाजार गर्म है। नेताओं की लगातार प्रतिक्रिया सामने आ रही है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: महाराष्ट्र का सियासी पारा सातवें आसमान पर है। इसी बीच वंदे मातरम् पर देश भर में चर्चाओं का बाजार गर्म है। नेताओं की लगातार प्रतिक्रिया सामने आ रही है।
पक्ष-विपक्ष आमने-सामने है। वहीं यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ऐसा बयान दिया जिसे लेकर सियासी बहस छिड़ गई। फिर शिवसेना UBT की सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने मुख्यमंत्री पर सीधा हमला बोला है और उनके बयान को राजनीतिक दिखावा बताया है. प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा, “यह योगी आदित्यनाथ के लिए केवल एक राजनीतिक दिखावा है. क्या कोई उनसे यह पूछ सकता है कि वे पहले ‘वंदे मातरम्’ के पूरे छह पद गाकर सुनाएं, उससे पहले कि वे तय करें कि कौन राष्ट्रविरोधी है, कौन देशभक्ति नहीं रखता और कौन देशद्रोह कर रहा है?”
उन्होंने आगे कहा, “सबसे पहले हमें उनसे ‘वंदे मातरम्’ गाते हुए सुनना चाहिए और यह देखना चाहिए कि उन्हें इसके बारे में क्या जानकारी है. यह केवल राष्ट्रीय गीत का निजी और राजनीतिक लाभ के लिए राजनीतिकरण करने की विभाजनकारी कोशिश है.” प्रियंका के इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में बहस छिड़ गई है. उन्होंने साफ तौर पर सवाल उठाया कि किसी को राष्ट्रविरोधी या देशद्रोही ठहराने से पहले खुद की समझ और जानकारी भी सामने आनी चाहिए. उनका कहना है कि राष्ट्रीय गीत जैसे संवेदनशील मुद्दे को राजनीति का हथियार नहीं बनाना चाहिए. वहीं भाजपा की ओर से अभी तक प्रियंका चतुर्वेदी के इस बयान पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है.
वहीं इससे पहले एनसीपी (एसपी) के नेता नसीम सिद्दीकी ने राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के नए नियमों पर जमीयत उलेमा-ए-हिंद के एतराज पर कहा कि वंदे मातरम् कहने के लिए मुसलमानों के साथ जबरदस्ती नहीं होनी चाहिए. यह एक जनतंत्र देश है. आप किसी भी नागरिक को जबरदस्ती कुछ पढ़ने के लिए मजबूर नहीं कर सकते.
राष्ट्रगान तो सभी पढ़ते हैं, लेकिन कुछ ऐसी चीज जो मुसलमानों के एक खुदा होने के वजूद से टकराए या उसे चुनौती दे, मुसलमान एक ही खुदा को मानता है और उसके सामने ही सिर झुकाता है.” उन्होंने कहा, “कोई इस तरह का वाक्य जो अल्लाह के अलावा किसी और के सामने झुकने के लिए प्रेरित करे, वह मुसलमान मंजूर नहीं करेगा. मैं मुसलमानों से यही अपील करूंगा कि इसे कोई बड़ा मुद्दा न बनाएं. जो गाना चाहता है वह गाए, लेकिन किसी के साथ जबरदस्ती नहीं होनी चाहिए. मुसलमान खड़े होकर सम्मान कर सकता है.”
दरअसल, हाल के दिनों में ‘वंदे मातरम्’ और राष्ट्रभक्ति को लेकर कई बयान सामने आए हैं, जिस पर अलग-अलग दलों की ओर से प्रतिक्रिया दी जा रही है. विपक्ष का आरोप है कि इस तरह के मुद्दों को जानबूझकर उछाला जाता है ताकि असली मुद्दों से ध्यान हटाया जा सके.
वंदे मातरम् पर सियासत बहस देश भर में हो रही है। हाल के दिनों में, इस राष्ट्रगीत को लेकर बहुत बहस छिड़ गई। सरकार ने नए नियम बनाए हैं, विपक्ष ने इसका विरोध किया है, और कई नेता तीखे बयान दे रहे हैं। विपक्ष का मुख्य आरोप यही है कि सरकार जानबूझकर ऐसे भावनात्मक मुद्दे उठा रही है ताकि महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की परेशानी जैसे असली मुद्दों से लोगों का ध्यान हट जाए।
यह गाना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1875 में लिखा था। यह उनके उपन्यास ‘आनंदमठ’ में आया। गाने में भारत को मां के रूप में दिखाया गया है – सुजलां, सुफलां, मलयजशीतलाम यानी पानी, फसल और ठंडी हवा वाली मां। कुल छह छंद हैं। पहले दो छंद बहुत सरल और देशभक्ति से भरे हैं, जो प्रकृति और मातृभूमि की तारीफ करते हैं। बाद के छंदों में दुर्गा, लक्ष्मी जैसी देवियों का जिक्र है, जो कुछ लोगों को धार्मिक लगता है। स्वतंत्रता संग्राम में यह गाना बहुत बड़ा हथियार बना। लोग सड़कों पर गाते थे, अंग्रेज डरते थे। 1905 के बंगाल विभाजन के समय लाखों लोग इसे गाकर विरोध करते थे।
1937 में कांग्रेस की बैठक हुई। उस समय कुछ मुस्लिम नेताओं ने कहा कि बाद के छंद देवी-पूजा जैसे लगते हैं, जो उनके विश्वास से मेल नहीं खाते। इसलिए कांग्रेस ने फैसला किया कि सिर्फ पहले दो छंद ही सरकारी या राष्ट्रीय कार्यक्रमों में गाए जाएंगे। महात्मा गांधी, नेहरू, पटेल सबने इसे मंजूर किया। रवींद्रनाथ टैगोर ने भी कहा कि पूरा गाना गाने से कुछ लोग असहज हो सकते हैं, इसलिए शुरुआती हिस्सा काफी है। 1950 में संविधान सभा ने वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत का दर्जा दिया, लेकिन सिर्फ पहले दो छंदों वाला संस्करण। जन गण मन राष्ट्रगान बना। दोनों को बराबर सम्मान मिला।
अब बात करें हालिया घटना की जिसके बाद चर्चा और गंभीर हुई वंदे मातरम् के 150 साल पूरे हुए। दिसंबर 2025 में संसद में खास बहस हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि 1937 में कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के दबाव में गाने को काट दिया। इससे देश में विभाजन के बीज बोए गए। उन्होंने कहा कि पूरा गाना ही असली राष्ट्रभक्ति है।
अमित शाह ने भी राज्यसभा में यही बात कही। सरकार का कहना है कि अब पुरानी गलती सुधारनी है।फिर फरवरी 2026 में गृह मंत्रालय ने नया आदेश जारी किया। इसमें कहा गया कि सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों, राष्ट्रपति के कार्यक्रमों, पद्म अवॉर्ड समारोह, झंडा फहराने पर अब पूरा छह छंद वाला वंदे मातरम् गाना या बजाना जरूरी है। यह 3 मिनट 10 सेकंड लंबा होगा। जन गण मन से पहले बजाया जाएगा। सभी को खड़े होकर सम्मान देना होगा। स्कूलों में सुबह इसे गाने के बाद पढ़ाई शुरू हो सकती है। सिनेमा हॉल में बज सकता है, लेकिन खड़े होना जरूरी नहीं। प्राइवेट जगहों पर लागू नहीं। सरकार कह रही है कि इससे राष्ट्रगीत का पूरा सम्मान होगा और युवाओं को सही इतिहास पता चलेगा।
इस आदेश के बाद विवाद भड़क गया। विपक्ष ने कहा कि सरकार इतिहास बदल रही है। कांग्रेस ने कहा कि 1937 का फैसला एकता के लिए था, तुष्टिकरण नहीं। प्रियंका गांधी, राहुल गांधी जैसे नेताओं ने आरोप लगाया कि बीजेपी बंगाल चुनाव 2026 को देखकर ऐसा कर रही है।
टीएमसी ने कहा कि बंगाल वंदे मातरम् का घर है, लेकिन हम सेकुलरिज्म से समझौता नहीं करेंगे। कुछ मुस्लिम संगठन, जैसे जामीयत उलेमा-ए-हिंद, मौलाना इमरान रशादी ने कहा कि बाद के छंद धार्मिक हैं, हम पहले दो छंदों का सम्मान करते हैं लेकिन पूरा गाना मजबूर नहीं किया जा सकता। यह हमारे एक ईश्वर के विश्वास से टकराता है।उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ ने विधानसभा में बहुत सख्त बयान दिया। उन्होंने कहा कि जो वंदे मातरम् का विरोध करेगा या अपमान करेगा, उसे कान पकड़कर पार्टी से बाहर फेंक देना चाहिए। यह देशद्रोह जैसा है। उन्होंने कहा कि बाबर की कब्र में सजदा करते हैं लेकिन वंदे मातरम् नहीं गाते, ऐसे लोगों को भारत में रहने का हक नहीं। बीजेपी के अन्य नेता भी कह रहे हैं कि राष्ट्रभक्ति में कोई समझौता नहीं।
विपक्ष का कहना है कि यह सब राजनीति है। असली मुद्दे जैसे महंगाई, बेरोजगारी, किसान आंदोलन, युवाओं की नौकरियां पीछे छूट गए हैं। सरकार ऐसे मुद्दों से ध्यान हटाना चाहती है। कांग्रेस ने कहा कि मोदी जी इतिहास को तोड़-मरोड़ रहे हैं। गांधी, नेहरू, बोस सबने मिलकर 1937 में फैसला लिया था। अब बीजेपी हिंदू-मुस्लिम विभाजन कर रही है।
असदुद्दीन ओवैसी जैसे नेताओं ने कहा कि संविधान अभिव्यक्ति की आजादी देता है, मजबूरी नहीं।यह विवाद सिर्फ राजनीतिक नहीं रहा। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो आए, जहां लोग बहस कर रहे हैं। कुछ स्कूलों में बच्चे कन्फ्यूज हो गए। इतिहासकार कहते हैं कि वंदे मातरम् आजादी का गाना है, लेकिन जब इसे मजबूरी बनाया जाता है तो भावनाएं आहत होती हैं। संविधान भारत को सेकुलर देश कहता है – सब धर्मों का सम्मान। कोई किसी को ऐसा गाना नहीं गा सकता जो उसके विश्वास के खिलाफ लगे। लेकिन सरकार कहती है कि यह सम्मान है, मजबूरी नहीं।
यह मुद्दा बताता है कि हमारे देश में इतिहास और प्रतीकों को लेकर कितनी संवेदनशीलता है। 1937 का फैसला एकता के लिए था। 1950 में संविधान ने इसे राष्ट्रगीत बनाया। अब 2026 में नया आदेश आया। हर दौर में नजरिया बदलता है। लेकिन सबसे जरूरी एक रहना है। वंदे मातरम् का मतलब मां को सलाम। सरकार ने सिनेमा और प्राइवेट जगहों पर छूट दी है। सिर्फ सरकारी जगहों पर नियम है। लेकिन कुछ नेता ज्यादा जोर दे रहे हैं। विपक्ष कह रहा है कि धीरे-धीरे इसे हर जगह थोप दिया जाएगा। कुछ जगहों पर कोर्ट में चुनौती भी देने की बात हो रही है। गौरतलब है कि वंदे मातरम् का यह मामला सियासी बहसबाजी विषय बना हुआ है। इसे लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है।



