Bollywood के सुपरस्टार विलेन का रेयर कैंसर से हुआ था निधन, सेट पर गंभीर हादसे में गई जान!

एक आवाज़…जो सुनते ही रोंगटे खड़े कर दे…। एक चेहरा…जिसे देखते ही डर और सम्मान दोनों पैदा हो जाए…। वो शख्स...जिससे पूरी फिल्म इंडस्ट्री डरती थी।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: एक आवाज़…जो सुनते ही रोंगटे खड़े कर दे…। एक चेहरा…जिसे देखते ही डर और सम्मान दोनों पैदा हो जाए…। वो शख्स…जिससे पूरी फिल्म इंडस्ट्री डरती थी। तो, असल ज़िंदगी में उन्हें बेहद गंभीर हादसे का शिकार होना पड़ा था। और, इसी हादसे में उस मशहूर विलेन को अपनी जान से हाथ तक गंवाना पड़ा था। जी हां, एक हादसा इस सुपरस्टार एक्टर की मौत की वजह बन गया।

4pmbollywood की सिनेमा स्पेशल रिपोर्ट में हम जिस मशहूर और मेगास्टार एक्टर की बात कर रहे हैं..वो हैं दिवंगत अमरीश पुरी। वही अमरीश..जिन्होंने इंडियन सिनेमा में ‘खलनायक’ शब्द को एक नई पहचान दी। उनकी गहरी आवाज़, दमदार आंखें और रौबदार एक्टिंग ने उन्हें ऐसा स्टार बना दिया..जिनसे दर्शक डरते भी थे और खूब प्यार भी देते थे।

थिएटर के रास्ते फिल्मों में आये अमरीश की कुछ दिनों पहले यानि कि 12 जनवरी को ही पुण्यतिथि थी। आज तक लोग उन्हें ‘विलेन मोगैम्बो’ के किरदार में ही याद करते हैं। तो, एक गंभीर बीमारी ने उनको दुनिया से दूर कर दिया।मायलोडिस्प्लास्टिक सिंड्रोम’ ने उनकी जान ले ली थी। यह एक दुर्लभ तरह का ब्लड कैंसर है। 27 दिसंबर 2004 को उन्‍हें हिंदुजा अस्पताल में भर्ती किया गया था, जहां उनकी ब्रेन सर्जरी हुई थी। उनके दिमाग के सेरेब्रल हिस्से में जमा खून को बार-बार निकालना पड़ता था। फिर, इलाज के कुछ समय बाद वो कोमा में चले गए।

अमरीश के बेटे राजीव पुरी ने उनके निधन के बाद एक इंटरव्‍यू में दिवंगत पिता की सेहत और उनकी रेयर बीमारी को लेकर एक चौंकाने वाला खुलासा किया था। राजीव ने बताया था कि, ”हिमाचल प्रदेश में गुड्डू धनोआ की फिल्म ‘जाल: द ट्रैप’ (2003) की शूटिंग के दौरान एक एक्सीडेंट हो गया था। पापा के चेहरे और आंखों में गंभीर चोटें आई थीं। बहुत खून बह गया था, जिसकी वजह से वहीं एक पास के अस्‍पताल में उन्हें बार-बार खून चढ़ाना पड़ता था। ये खून इन्‍फैक्टेड यानी संक्रमित था। पापा का बहुत खून बह गया था। इस कारण वहां उन्‍हें कई बार खून चढ़ाया गया। खून चढ़ाए जाने की इसी प्रक्रिया में कुछ गड़बड़ी हुई। शायद उन्‍हें इन्‍फैक्टेड खून चढ़ा दिया गया। इस वजह से कुछ महीनों बाद उन्‍हें ब्लड डिसॉर्डर हो गया, जिसे मेडिकल लैंग्वेज में मायलोडिस्पास्टिक सिंड्रोम कहा जाता है”।

वहीं, हिमाचल से लौटने के कुछ महीनों बाद ही अमरीश पुरी को बहुत कमजोरी महसूस होने लगी। उनकी भूख भी मरने लगी। वह कुछ भी खाने से कतराने लगे। जब डॉक्‍टरों ने जांच की, तो पता चला कि उन्हें ब्लड डिसॉर्डर हो गया है। इस बीमारी की खबर ने अमरीश पुरी को तोड़कर रख दिया। वह बहुत ही डिसिप्लिनड जिंदगी जीते थे। खान-पान का खास खयाल रखते थे। हालांकि, उन्होंने अपनी इस बीमारी के बारे में परिवार के अलावा बाहरी दुनिया में किसी से कोई जिक्र नहीं किया।

साल 2003 में अमरीश पुरी को यह बीमारी डाइग्नोस हुई थी और दिसंबर 2004 तक, उन्‍होंने अपनी सारी फिल्में पूरी कर लीं थीं। ये सब तब था, जब उनकी तबीयत बहुत अच्छी नहीं चल रही थी। वो उस समय अंदर ही अंदर खुद से लड़ रहे थे। कमजोरी महसूस करने लगे थे। जब काम खत्म हुआ, तो उन्‍होंने अपना ज्यादातर समय घर पर बिताने का ही फैसला किया। हालांकि, उन्हें बीमारी में बेड पर पड़े रहना कभी अच्छा नहीं लगता था।

लेकिन फिर, एक दिन वो भी आया जब अमरीश पुरी लड़खड़ाकर गिर पड़े। आनन-फानन में अस्‍पताल पहुंचाया गया, तो पता चला कि उन्‍हें ‘ब्रेन हैमरेज’ हुआ था। उन्हें बचाने की काफी कोशिश की गई। ब्रेन की सर्जरी भी हुई। लेकिन लाख कोशिशों के बाद भी उनकी जान नहीं बच सकी। अमरीश तो चले गए लेकिन बॉलीवुड में एक अजीब सा खालीपन छोड़ गए, जिसकी भरपाई आज तक नहीं हो सकी। वो बॉलीवुड के आख‍िरी सुपरस्‍टार ‘विलेन’ थे। हालांकि, उनके बाद कई स्टार्स ने विलेन के रोल में खुद को उभारने की कोश‍िश की, लेकिन कोई भी उन जैसा नहीं बन सका।

बात अमरीश पुरी की करें तो, दिवंगत एक्टर का जन्म 22 जून 1932 को नवांशहर, पंजाब (ब्रिटिश इंडिया) में हुआ था। उनका परिवार पढ़ा-लिखा था। उनके बड़े भाई मदन पुरी और चमन पुरी पहले से ही फिल्म इंडस्ट्री में काम कर रहे थे, हालांकि इसके बावजूद भी अमरीश पुरी का सफर आसान नहीं था।

उन्होंने एफटीआईआई (FTII) में एडमिशन के लिए ऑडिशन दिया, लेकिन उन्हें रिजेक्ट कर दिया गया। ये रिजेक्शन उनकी लाइफ का बड़ा मोड़ था। इसके बाद उन्होंने एलआईसी (LIC) में नौकरी की और साथ-साथ थिएटर भी करते रहे। अमरीश पुरी ने मशहूर थिएटर डायरेक्टर सत्यदेव दुबे और इब्राहिम अल्काज़ी के साथ काम किया। थिएटर ने उनके काम को गहराई दी। फिर, 1970 के दशक में मशहूर डायरेक्टर श्याम बेनेगल ने उनके टैलेंट को पहचाना।

इसके बाद, अमरीश पुरी ने फिल्मों में कदम रखा, साल 1971 में फिल्म ‘रेशमा और शेरा’ से। शुरुआत में उन्हें छोटे और सपोर्टिंग रोल मिले, लेकिन उनकी मौजूदगी सबको इम्प्रेस जरूर कर गई। उनकी पर्सनालिटी छा जाती थी। 80 के दशक में उनके करियर ने असली स्पीड पकड़ी। साल 1987 में आई फिल्म ‘मिस्टर इंडिया’ ने अमरीश पुरी को महान स्टार बना दिया। फिल्म का ”मोगैम्बो खुश हुआ!”— डायलॉग आज भी लोगों की ज़ुबान पर है।

इसके बाद उन्होंने कई यादगार फिल्मों में विलेन के किरदार निभाए। जिसमें ‘शक्तिमान’, ‘नगीना’, ‘करण अर्जुन’, ‘घायल’, ‘दामिनी’, ‘कोयला’, ‘बाजीगर’ जैसी फ़िल्में शामिल थीं। खास बात तो ये थी कि उन्होंने सिर्फ खलनायक ही नहीं, बल्कि पॉजिटिव और ग्रे शेड रोल भी किए। तो, जब वे स्क्रीन पर आते थे, तो कोई भी उनसे नज़र हटा ही नहीं पाता था। अमरीश सिर्फ बॉलीवुड तक ही पॉपुलर नहीं थे..बल्कि, वो हिंदी सिनेमा को हॉलीवुड तक भी लेकर गए। उन्होंने ‘Indiana Jones and the Temple of Doom’ (1984) में ‘विलेन मोलाराम’ का किरदार निभाया था।

अपने करियर में अमरीश पुरी ने लगभग 400 से ज़्यादा फिल्मों में काम किया, जिनमें- हिंदी, तमिल, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़, अंग्रेज़ी फिल्में शामिल रहीं। तो, अपनी एक फिल्म के लिए अमरीश ₹50–70 लाख फीस लेते थे जो कि 90s के समय में बहुत बड़ी रकम होती थी। उनकी नेटवर्थ- ₹50–60 करोड़ मानी जाती है। हालांकि, इसके बावजूद वो बहुत सिंपल लाइफ जीते थे। उन्हें अपने करियर में, 3 बार फिल्मफेयर बेस्ट विलेन अवॉर्ड, 2 बार फिल्मफेयर बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर और कई लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड मिले थे।

निजी ज़िंदगी की बात करें तो, अमरीश पुरी ने साल 1979 में उर्मिला दिवेकर से शादी की थी। उनकी शादी मीडिया से दूर, बेहद निजी रही। उनके दो बच्चे हुए- राजीव और नम्रता पुरी। राजीव जहां पिता की तरह बॉलीवुड एक्टर बने..वहीं, नम्रता ने कॉस्ट्यूम डिज़ाइनर के तौर पर करियर बनाया।

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