वोटर लिस्ट और मैरिज सर्टिफिकेट दोनों मौजूद, फिर हाई कोर्ट ने शादी को क्यों ठहराया अवैध?
वोटर लिस्ट में पति का नाम दर्ज होने के बावजूद पटना हाईकोर्ट ने इसे वैध हिंदू विवाह का पक्का सबूत नहीं माना.इससे पहले गुजरात HC ने सिर्फ मैरिज सर्टिफिकेट को ही लीगल हिंदू मैरिज का प्रूफ नहीं माना था.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: वोटर लिस्ट में पति का नाम दर्ज होने के बावजूद पटना हाईकोर्ट ने इसे वैध हिंदू विवाह का पक्का सबूत नहीं माना.इससे पहले गुजरात HC ने सिर्फ मैरिज सर्टिफिकेट को ही लीगल हिंदू मैरिज का प्रूफ नहीं माना था.
वोटर लिस्ट में किसी महिला के नाम के आगे पति का नाम दर्ज होना अपने आप में वैध हिंदू विवाह का पक्का सबूत नहीं है. पटना हाईकोर्ट ने हाल ही में एक मामले की सुनवाई के दौरान यह फैसला दिया. कोर्ट ने कहा कि मतदाता सूची में किसी महिला को किसी व्यक्ति की पत्नी के रूप में दर्ज किए जाने से शादी साबित नहीं हो जाती. अगर विवाह की वैधता पर सवाल उठता है, तो महिला को यह साबित करना जरूरी है कि उसकी शादी संबंधित कानून और जरूरी रीति-रिवाजों के मुताबिक हुई थी.
अदालत का यह फैसला इसलिए भी अहम हो जाता है क्योंकि आमतौर परवोटर आईडी, आधार, राशन कार्ड या दूसरे सरकारी दस्तावेजों में पति-पत्नी के तौर पर दर्ज नामों को रिश्ते का सबूत माना जाता है. लेकिन अदालत ने इन दस्तावेजों और विवाह की कानूनी वैधता के बीच अंतर स्पष्ट किया है.पटना हाईकोर्ट ने कहा कि शादी की मान्यता के लिए सिंदूरदान और सात फेरे का होना जरूरी है.
किस मामले पर कोर्ट कर रहा था सुनवाई?
यह मामला मुजफ्फरपुर के रहने वाली दुर्गावती देवी की है. उनकी शादी 22 मई 1990 को सुरेश चौथरी से हुई. उनके दो बच्चे थे. 28 नवंबर 1997 को सुरेश की मृत्यु हो गई. दुर्गावती देवी का दावा है कि2002 में परिवार के दबाव में उसकी शादी मृत पति के छोटे भाई सचिता से करा दी गई.दुर्गावती देवी का कहना है कि ससुराल पक्ष इसके बाद उसे दहेज के लिए प्रताड़ित करने लगा. फिर घर से निकाल भी दिया. इसके बाद से ही वह अपने मायके रहने लगी. साल 2004 में सीवान फैमिली कोर्ट में दुर्गावती ने केस किया। फैमिली कोर्ट ने 21 सितंबर 2005 को महिला को भरण-पोषण के तौर पर एक हजार रुपये महीना देने का आदेश दिया
2005 में फैमिली कोर्ट के इस फैसले को सचिता ने पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी. 2007 को हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी. इसके बाद सचिता ने सीवान फैमिली कोर्ट में टाइटल सूट किया. इसमें उसने कहा कि कहा कि हम दोनों के बीच कोई विवाह नहीं हुआ था. दुर्गावती कानूनी रूप से उसकी पत्नी नहीं है.कोर्ट ने माना कि कथित विवाह हिंदू रीति-रिवाजों और परंपराओं के अनुसार नहीं हुआ था. दुर्गावती आधिकारिक तौर पर सचिता क. पत्नी नहीं है. फैमिली कोर्ट के इसी फैसले को दुर्गावती ने पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी, जिसे अब कोर्ट ने खारिज कर दिया.
कोर्ट ने वोटर लिस्ट में पति के नाम को शादी का सबूत क्यों नहीं माना?
महिला ने अपने दावे के समर्थन में वोटर लिस्ट में दर्ज उस एंट्री का भी सहारा लिया, जिसमें उसे संबंधित व्यक्ति की पत्नी बताया गया था. लेकिन पटना हाईकोर्ट ने कहा कि सिर्फ यह शादी का निर्णायक प्रमाण नहीं है.
वोटर लिस्ट का मुख्य उद्देश्य किसी व्यक्ति की मतदाता के रूप में पहचान और पात्रता दर्ज करना है.
यह विवाह संपन्न कराने वाला दस्तावेज नहीं है.
हिंदू विवाह की वैधता का सवाल अलग कानून से तय होता है.
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 7 के तहत हिंदू विवाह संबंधित पक्षों के प्रचलित रीति-रिवाजों और आवश्यक वैवाहिक रस्मों के अनुसार पूरा होना चाहिए.
अगर संबंधित परंपरा में सप्तपदी यानी सात कदम शामिल हैं, तो सातवां कदम( सात फेरे) पूरा होने पर विवाह को पूरा माना जाता है.
वोटर लिस्ट में पति-पत्नी के रूप में नाम दर्ज होना एक परिस्थितिजन्य दस्तावेज हो सकता है
जब शादी खुद विवादित हो, तो ऐसे दस्तावेजों से अकेले वैध विवाह साबित नहीं हो जाता.
क्या पटना HC ने कहा कि वोटर लिस्ट में पति-पत्नी का नाम कोई मायने नहीं रखता?
कोर्ट ने यह नहीं कहा कि वोटर लिस्ट में दर्ज पति-पत्नी का नाम हमेशा के लिए बेकार है. अदालत के मुताबिक जब शादी की वैधता ही विवादित हो, तब ऐसे मामले में शादी के आयोजन, तारीख, स्थान, शामिल लोगों, पुरोहित और आवश्यक रस्मों जैसे दूसरे सबूत बहुत जरूरी हो जाते हैं. पटना हाईकोर्ट का कहना है कि इस मामले में महिला शादी की आवश्यक रस्मों को पर्याप्त रूप से साबित नहीं कर सकीं.
गुजरात हाईकोर्ट ने ऐसे ही मामले पर क्या फैसला दिया था?
पटना हाईकोर्ट के फैसले से पहले जून 2026 में गुजरात हाईकोर्ट भी इसी तरह के सवाल पर महत्वपूर्ण फैसला दे चुका है. रपायलट कौशल प्रमोदभाई सोनार और खुशी संजय भाई शाह मामले में गुजरात हाईकोर्ट ने 23 जून 2026 को कहा कि केवल मैरिज सर्टिफिकेट या रजिस्ट्रेशन से हिंदू विवाह वैध नहीं हो जाता, अगर शादी की आवश्यक रस्में ही नहीं हुई हों. उस दौरान महिला के पास विवाह का रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट था, लेकिन उसने अदालत में स्वीकार किया कि दोनों के बीच विवाह की रस्में नहीं हुई थीं.
गुजरात हाईकोर्ट ने तब अपने फैसले में कहा था कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 7 के तहत शादी का विधि-विधान के अनुसार होना जरूरी है. रजिस्ट्रेशन ऐसी शादी का रिकॉर्ड और प्रमाण उपलब्ध कराने के लिए है जो पहले ही वैध तरीके से हुई है. कोर्ट ने संविधान के आर्टिकल-142 का हवाला देते हुए कहा कि दोनों पायलट्स कानून के मुताबिक शादीशुदा नहीं हैं. कोर्ट ने उनके मैरिज सर्टिफिकेट को भी रद्द कर दिया.
इन फैसलों का कोर्ट मैरिज पर क्या असर पड़ेगा?
पटना और गुजरात हाईकोर्ट के ये फैसले हिंदू विवाह अधिनियम के तहत होने वाली शादी से जुड़े हैं. इन्हें हर तरह की शादी या कोर्ट मैरिज पर लागू नहीं किया जा सकता.भारत में दरअसल, स्पेशल मैरिज एक्ट , 1954 के तहत होने वाली शादी अलग कानूनी व्यवस्था है.
इस कानून में मैरिज ऑफिसर के सामने निर्धारित प्रक्रिया के तहत विवाह पूरा कराया जाता है. इसमें विवाह की शर्तें, नोटिस, आपत्तियां, मैरिज ऑफिसर के सामने घोषणा और विवाह प्रमाणपत्र शामिल हैं. समस्या तब सामने आती है जब कोई व्यक्ति हिंदू विवाह अधिनियम के तहत शादी का दावा करता है, लेकिन शादी की आवश्यक रस्में हुई ही नहीं थीं. बाद में केवल रजिस्ट्रेशन, वोटर लिस्ट या किसी अन्य दस्तावेज के आधार पर विवाह साबित करने की कोशिश की जाती है.



