जलता नोएडा, बेकाबू गुस्सा असंतोष बना आक्रोश

  • प्रशासन, नीतियां या सिस्टम… आखिर जिम्मेदार कौन?
  • मजदूरों का फू टा गुस्सा
  • वेतन विवाद से भड़की आग, भीतर से दरकता विकास का मॉडल
  • नोएडा की फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूरों की वेतन बढ़ाने की मांग
  • कई स्थानों पर पथराव
  • दमकल विभाग और दंगा नियंत्रण वाहन भी तैयार रखे गए

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। नोएडा शहर जिसे प्लांड डेवलपमेंट हाईटेक इंफ्रास्ट्रक्चर और निवेश की राजधानी कहा जाता है। वहां आज उठती आग की लपटें एक खौफनाक मंजर बयान कर रही हंै। नोएडा की फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूर वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर पिछले कई दिनों से आंदोलन कर रहे थे। आज उनका गुस्सा फूटा है और उन्होंने आसपास खड़े वाहनों में आग लगा कर अपना विरोध प्रदर्शन किया है। कई स्थानों पर पथराव की घटनाएं भी हुई है जिसमें कुछ पुलिसकर्मी घायल हुए। पुलिस कार्रवाई में भी कुछ लोगों के घायल होने की सूचना है जबकि एक महिला के गंभीर रूप से घायल होने की चर्चा है जिसे अस्पताल में भर्ती कराया गया है। प्रशासन श्रम विभाग और पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी लगातार श्रमिकों और उद्योगपतियों से संवाद कर स्थिति को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने का प्रयास कर रहे हैं। अपर पुलिस आयुक्त (कानून-व्यवस्था) राजीव नारायण मिश्र ने बताया है कि स्थिति को नियंत्रित रखने के लिए बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया है। ड्रोन के जरिए निगरानी की जा रही है तथा दमकल विभाग और दंगा नियंत्रण वाहन भी तैयार रखे गए हैं। शनिवार को थाना फेस-2, फेस-3 और इकोटेक-3 क्षेत्रों में श्रमिकों ने उग्र प्रदर्शन किया था।

दबे हुए असंतुलन की अभिव्यक्ति

ऐसी स्थिति में कोई एक चिंगारी काफी होती है। और वही चिंगारी विस्फोट का रूप ले लेती है। सड़कों पर उतरता गुस्सा टूटती व्यवस्थाएं और बेकाबू हालात दरअसल उसी दबे हुए असंतुलन की अभिव्यक्ति होते हैं जिसे लंबे समय तक नजरअंदाज किया गया। नोएडा की मौजूदा स्थिति इसी सच्चाई की ओर इशारा करती है कि विकास की कहानी तब तक अधूरी है जब तक उसमें मजदूर की हिस्सेदारी न्यायपूर्ण नहीं होती। अगर इस असंतुलन को समय रहते नहीं संभाला गया तो यह आक्रोश सिर्फ एक घटना तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि एक पैटर्न बन सकता है जो किसी भी आधुनिक शहर के लिए सबसे बड़ा खतरा होता है।

नोएडा की घटना कैलिफोर्निया की घटना जैसी?

क्या नोएडा में फू टा मजदूरों का गुस्सा कैलेफोर्नियां की उस घटना की तरह है जहां एक मजबूर ने पूरे वियरहाउस में आग लगा कर कंपनी का अरबों रूपयों का नुकसान कर दिया था। वहां का मजबूर भी वेतन विसंगतियों से त्रस्त आ चुका था। सवाल बड़ा है और इसका उत्तर ढूंढना लाजमी है, आखिर नोएडा के यह हालात एक दो दिन में नहीं हुए हैं। मजदूर लंबे समय से वेतन को बड़ाने की मांग कर रहे हैं क्योंकि नोएडा एक महंगा शहर है। सवाल यही है कि समय रहते मजदूरों से बात क्यों नहीं कि गयी? सवाल यह भी है कि उनकी जायज मांगों को अभी तक क्यों नहीं सुना गया? उनके भीतर के गुस्से को क्यों पनपने दिया गया।

औद्योगिक शहर की ताकत ऊंची इमारतें नहीं मजदूर होते हैं

किसी भी औद्योगिक शहर की असली ताकत उसकी ऊंची इमारतें चमचमाते एक्सप्रेसवे या बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बोर्ड नहीं होते बल्कि उसकी असली रीढ़ वह मजदूर होते हैं जिनके पसीने से यह पूरी मशीनरी चलती है। नोएडा भी इसी सच पर खड़ा शहर है। यहां की हजारों फैक्ट्रियां निर्माणाधीन परियोजनाएं और तेजी से बढ़ता सर्विस सेक्टर सब कुछ मजदूरों की मेहनत पर टिका है। लेकिन जब यही मजदूर यह महसूस करने लगें कि उनके श्रम की कीमत लगातार घट रही है तो विकास का यह माडल भीतर से दरकने लगता है। पिछले कुछ समय में महंगाई ने जिस रफ्तार से आम आदमी की जेब पर हमला किया है उसका सबसे गहरा असर निचले तबके पर पड़ा है। रोजमर्रा की जरूरतें अब बोझ बनती जा रही हैं। रसोई का खर्च पहले से कहीं ज्यादा बढ़ चुका है। दाल, तेल, सब्जियां सब आम आदमी की पहुंच से धीरे धीरे दूर खिसकती नजर आ रही हैं। दूसरी तरफ शहर में रहने की कीमत भी लगातार बढ़ रही है। किराया जो कभी आय का एक हिस्सा होता था अब आधी कमाई निगलने लगा है। बच्चों की पढ़ाई दवाइयां बिजली पानी हर मोर्चे पर खर्च का दबाव बढ़ता जा रहा है।

कहानी का सबसे दर्दनाक पहलू

लेकिन इस पूरी कहानी का सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि जिस रफ्तार से खर्च बढ़ रहा है उसी रफ्तार से मजदूरी नहीं बढ़ी। ज्यादातर मजदूर आज भी उसी वेतन ढांचे में जकड़े हुए हैं जो वर्षों पहले तय हुआ था या उसमें सिर्फ नाममात्र की बढ़ोतरी हुई है। यह अंतर आमदनी और खर्च के बीच में गहरी खाई बनता जा रहा है। और यही खाई असंतोष को जन्म देती है। शुरुआत में यह असंतोष धीमा होता है शिकायतों बातचीत और उम्मीदों के रूप में। लेकिन जब बार बार आवाज उठाने के बाद भी कोई ठोस बदलाव नहीं होता तो यही असंतोष आक्रोश में बदलने लगता है। मजदूर के लिए यह केवल पैसों का सवाल नहीं रह जाता बल्कि सम्मान और अस्तित्व का मुद्दा बन जाता है। उसे लगता है कि वह शहर को खड़ा कर रहा है लेकिन खुद उसके हिस्से में असुरक्षा और संघर्ष ही आ रहा है।

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