व्हिप तोड़कर बीजेपी के खिलाफ वोटिंग, एक झटके में बिखर गया NDA?

बीजेपी के पास 14, कांग्रेस के पास 12, एनसीपी के पास 4 और एक सीट निर्दलीय के पास थी। बीजेपी ने सत्ता पाने के लिए कांग्रेस, एनसीपी और निर्दलीय के साथ मिलकर एक गठबंधन बनाया, जिसका नाम रखा गया अंबरनाथ विकास अघाड़ी।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: राजनीति में कुछ भी संभव है ये महाराष्ट्र के स्थानीय चुनावों में साबित हो गया है। इन चुनावों में ये भी साबित बो गया है कि कोई भी पार्टी किसी की सगी नहीं होती है। कब कौन सी पार्टी सत्ता के लालच में किससे हाथ मिला ले ये भी कहा नहीं जा सकता है।

सोचिये जिन चुनावों में भाजपा ने अपने पार्टनर्स का साथ छोड़कर कांग्रेस और ओवैसी से हाथ मिला लिया वहां उसकी और कितनी किरकिरी हो सकती है। ये चुनाव बीजेपी के लिए किसी हॉरर शो से कम साबित नहीं हुए हैं। पिछले 24 घंटों में ही देखें तो महाराष्ट्र की राजनीति में ऐसा भूचाल आया कि भारतीय जनता पार्टी को दो अलग-अलग मोर्चों पर जबरदस्त बेइज्जती झेलनी पड़ी। एक तरफ अंबरनाथ नगर परिषद चुनाव में बीजेपी की सारी चालें फेल हो गईं, तो दूसरी तरफ बदलापुर में एक यौन शोषण के सह-आरोपी को पार्षद बनाकर पार्टी ने खुद ही अपने ऊपर सवाल खड़े कर लिए। दोनों घटनाओं ने यह साफ कर दिया कि सत्ता की राजनीति में बीजेपी अब खुद उसी जाल में फंसती दिख रही है, जो उसने दूसरों के लिए बिछाया था।

सबसे पहले बात करते हैं अंबरनाथ नगर परिषद के चुनावों की। आप आज तक में छपी इस खबर को देखिए- “अंबरनाथ चुनाव में बड़ा खेल, व्हिप के खिलाफ जाकर अजित गुट ने BJP के विरोध में किया वोट, शिंदे गुट का किया सपोर्ट।” देखिए अंबरनाथ नगर परिषद का चुनाव बीजेपी के लिए सिर्फ एक स्थानीय चुनाव नहीं था। यह प्रतिष्ठा की लड़ाई थी। इसी के चलते बीजेपी ने यहां अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस से हाथ मिलाया था। वहीं एकनाथ शिंदे के बेटे श्रीकांत शिंदे और बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष की नाक दांव पर लगी हुई थी। इस परिषद में शिंदे गुट सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरा था। उनके पास 27 सीटें थीं।

बीजेपी के पास 14, कांग्रेस के पास 12, एनसीपी के पास 4 और एक सीट निर्दलीय के पास थी। बीजेपी ने सत्ता पाने के लिए कांग्रेस, एनसीपी और निर्दलीय के साथ मिलकर एक गठबंधन बनाया, जिसका नाम रखा गया अंबरनाथ विकास अघाड़ी। इस गठबंधन के पास कुल 31 पार्षदों का समर्थन था और इसे जिला कलेक्टर कार्यालय में आधिकारिक रूप से पंजीकृत भी किया गया।लेकिन राजनीति में स्थिरता सिर्फ कागजों पर होती है, जमीन पर नहीं। कांग्रेस ने अपने कुछ पार्षदों पर कार्रवाई की और उन्हें पार्टी से निकाल दिया। उनमें से 10 बीजेपी में शामिल हो गए। इस तरह बीजेपी के पास 24 पार्षद हो गए, फिर भी वह शिंदे गुट से कम ही थी। तभी एकनाथ शिंदे ने वही चाल चली, जो पहले बीजेपी ने उद्धव ठाकरे और फिर अजित पवार ने अपने चाचा शरद पवार के साथ खेली थी। शिंदे ने अपने 27 पार्षदों के साथ एनसीपी के 4 और एक निर्दलीय पार्षद को मिलाकर नया समीकरण बना लिया और सत्ता पर कब्जा जमाने की कोशिश शुरू कर दी।

इसी बीच एनसीपी के अजित पवार गुट ने अपने चारों पार्षदों को सख्त व्हिप जारी किया। साफ चेतावनी दी गई कि अगर किसी ने बीजेपी उम्मीदवार के खिलाफ वोट किया तो उसकी सदस्यता रद्द कर दी जाएगी। मतलब यह कि चारों पार्षदों को बीजेपी के समर्थन में वोट देना था। लेकिन जब मतदान हुआ तो कहानी पूरी तरह पलट गई। एनसीपी के वही चार पार्षद शिंदे गुट के साथ खड़े हो गए। नतीजा यह हुआ कि शिंदे गुट ने बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया और सदाशिव उर्फ सदा मामा पाटिल को अंबरनाथ म्युनिसिपल काउंसिल का वाइस चेयरमैन चुन लिया गया। यह बीजेपी के लिए खुली हार थी। पार्टी ने सवाल उठाया कि चुनाव प्रक्रिया गलत है, नियमों का उल्लंघन हुआ है और वो इसे अदालत में चुनौती देंगे। लेकिन सच्चाई यह है कि बीजेपी की असली परेशानी प्रक्रिया नहीं, नतीजा था। क्योंकि जब कांग्रेस के साथ गठबंधन किया गया था, तब बीजेपी ने कोई कार्रवाई नहीं की। तब पार्टी ने कहा था कि यह स्थानीय स्तर पर हुआ फैसला है। जबकि महाराष्ट्र में बिना देवेंद्र फडणवीस की मंजूरी के ग्राम पंचायत का सरपंच भी बीजेपी की टिकट पर नहीं लड़ सकता।

चुनाव के दिन माहौल बेहद तनावपूर्ण रहा। परिषद भवन के अंदर और बाहर भारी हंगामा हुआ। नारेबाजी, धक्का-मुक्की और यहां तक कि एक महिला द्वारा चप्पल दिखाने जैसी घटनाएं भी हुईं। पुलिस को हालात संभालने के लिए बीच में आना पड़ा। मतदान में शिंदे गुट को 32 वोट मिले और अंबरनाथ विकास अघाड़ी को 28। नतीजे के बाद कांग्रेस समर्थकों ने “चोर मामा, गद्दार मामा” जैसे नारे लगाए। जब सांसद श्रीकांत शिंदे वहां पहुंचे तो बीजेपी और शिवसेना कार्यकर्ताओं के बीच फिर से तीखी बहस शुरू हो गई।

इस पूरे घटनाक्रम ने बीजेपी को उसी दर्द का एहसास करा दिया, जो कभी उद्धव ठाकरे की शिवसेना टूटने पर हुआ था। तब बीजेपी कानूनी बातें कर रही थी, संविधान की दुहाई दे रही थी। अब वही कानूनी सवाल उसके सामने खड़े हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि अब नुकसान बीजेपी को हो रहा है। अब पूरे राजनीतिक गलियारे की नजर इस सवाल पर टिकी है कि अंबरनाथ म्युनिसिपल काउंसिल का यह सत्ता समीकरण आगे कानूनी और राजनीतिक रूप से कौन सा मोड़ लेता है. क्या देवेंद्र फडणवीस और शिंदे एक दूसरे के खिलाफ कोर्ट में ओक दूसरो के खिलाफ केस लड़ते पाए जाएंगे? और अगर ऐसा होता है तो क्या राज्य सरकार में बड़ा फेरबदल देखने को मिल सकता है? क्या इस चुनाव की चिंगारी पूरे एनडीए को राख कर सकती है?

अब देखिए जैसे ही यह मामला शांत होने की ओर बढ़ा, वैसे ही एक और विवाद ने बीजेपी की मुश्किलें बढ़ा दीं। इस बार मामला बदलापुर का था, जहां बीजेपी ने यौन शोषण के एक सह-आरोपी को मनोनीत पार्षद बना दिया। इस शख्स का नाम तुषार आप्टे है। तुषार आप्टे एक स्कूल के प्रबंधन में सचिव था, जहां दो नाबालिग लड़कियों के साथ यौन शोषण का मामला सामने आया था। मुख्य आरोपी अक्षय शिंदे था, लेकिन स्कूल प्रबंधन पर भी आरोप लगे कि उन्होंने समय पर पुलिस को जानकारी नहीं दी। POCSO कानून की धारा 21(2) के तहत यह गंभीर अपराध माना जाता है। इसके बावजूद बीजेपी ने तुषार आप्टे को नगर परिषद में मनोनीत पार्षद बना दिया। जैसे ही यह खबर सामने आई, पूरे बदलापुर में गुस्सा फैल गया। लोगों ने सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किए। विपक्षी दलों ने बीजेपी पर जमकर हमला बोला। एनसीपी नेता सुप्रिया सुले ने कहा कि बीजेपी ने असंवेदनशीलता की सारी हदें पार कर दी हैं।

आखिरकार भारी दबाव के बाद तुषार आप्टे को इस्तीफा देना पड़ा। उन्होंने कहा कि वो पार्टी की छवि और स्कूल की प्रतिष्ठा बचाने के लिए पद छोड़ रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि ऐसे व्यक्ति को नियुक्त ही क्यों किया गया। क्या बीजेपी को उसके खिलाफ चल रहे मामले की जानकारी नहीं थी? या फिर सत्ता की राजनीति में नैतिकता अब पूरी तरह गायब हो चुकी है? इस मामले की पृष्ठभूमि और भी डरावनी है। स्कूल परिसर में अक्षय शिंदे नाम के युवक ने दो नाबालिग लड़कियों का यौन शोषण किया था। अगस्त 2024 में उसे गिरफ्तार किया गया। बाद में उसे पूछताछ के लिए तलोजा जेल से ले जाया जा रहा था, तभी पुलिस मुठभेड़ में उसकी मौत हो गई। पुलिस का कहना है कि उसने एक पुलिसकर्मी की पिस्तौल छीनकर गोली चलाई, जिसके जवाब में उसे मार गिराया गया। यह मामला भी अपने आप में कई सवाल खड़े करता है।

इन दोनों घटनाओं को जोड़कर देखा जाए तो तस्वीर साफ है। एक तरफ सत्ता के लिए जोड़-तोड़, व्हिप का उल्लंघन, राजनीतिक सौदेबाजी और दूसरी तरफ गंभीर आरोपों से जुड़े लोगों को पद देना। बीजेपी खुद उसी राजनीति का शिकार होती दिख रही है, जिसे वह सालों से बढ़ावा देती आई है।अंबरनाथ में बीजेपी ने कांग्रेस और एनसीपी के साथ गठबंधन किया, लेकिन जब शिंदे गुट ने उससे बड़ा खेल कर दिया, तो पार्टी को समझ आ गया कि राजनीति में कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता। जो चाल आज आप चलते हैं, वही कल आपके खिलाफ इस्तेमाल हो सकती है। बदलापुर का मामला बीजेपी की नैतिक छवि पर सीधा हमला है। एक ऐसी पार्टी जो खुद को “चाल, चरित्र और चेहरा” वाली पार्टी कहती है, उसी पार्टी ने एक यौन शोषण के सह-आरोपी को पार्षद बना दिया। यह सिर्फ राजनीतिक गलती नहीं, बल्कि नैतिक चूक भी है।

इन 24 घंटों में महाराष्ट्र की राजनीति ने यह दिखा दिया कि सत्ता की लड़ाई में सिद्धांत सबसे पहले कुर्बान होते हैं। बीजेपी की दोहरी बेइज्जती सिर्फ विरोधियों की वजह से नहीं हुई, बल्कि उसकी अपनी गलत नीतियों और फैसलों की वजह से हुई। आज सवाल यह नहीं है कि कौन जीता और कौन हारा। सवाल यह है कि राजनीति किस दिशा में जा रही है। जब सत्ता पाने के लिए हर तरह के समझौते किए जाएंगे, तो आम जनता का भरोसा धीरे-धीरे खत्म हो जाएगा। महाराष्ट्र की इन घटनाओं ने यही संदेश दिया है कि लोकतंत्र सिर्फ चुनाव जीतने का खेल नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का नाम है। और जब जिम्मेदारी गायब हो जाती है, तो राजनीति सिर्फ सत्ता का सौदा बनकर रह जाती है।

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