UCC पर चैतर वसावा का बड़ा हमला! BJP-RSS पर सवाल, ‘एक कानून से नहीं चलेगा देश’

चैतर वसावा ने यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोला... उन्होंने आरोप लगाया कि... 

4पीएम न्यूज नेटवर्कः गुजरात विधानसभा में आम आदमी पार्टी के डेडियापाड़ा विधायक.. चैतर वसावा ने समान नागरिक संहिता बिल पर सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि.. भाजपा RSS के दबाव में आकर इस मुद्दे पर जल्दबाजी कर रही है.. उन्होंने मीडिया के सामने अपनी बात रखते हुए आरोप लगाया कि चुनावी फायदे के लिए.. आदिवासी समाज को इस कानून से बाहर रखा गया है.. लेकिन भविष्य में उन्हें भी शामिल करने की आशंका है.. वसावा ने कहा कि अल्पसंख्यक समुदायों को ठेस पहुंचाकर अपनी राष्ट्रवादिता साबित करने की कोशिश गुजरात सरकार कर रही है..

चैतर वसावा ने आगे कहा कि आजादी के बाद संविधान सभा में 23 नवंबर 1948 को UCC पर चर्चा हुई थी.. बाद में संविधान की धारा 44 में इसे रखा गया.. लेकिन राज्य को इसे लागू करने का फैसला खुद पर छोड़ दिया गया.. देश का संविधान हमें सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और भाषाई स्वतंत्रता देता है.. कुछ समुदायों के व्यक्तिगत कानून हैं.. और कुछ के सामाजिक कानून हैं.. विवाह, तलाक, विरासत, भरण-पोषण और दत्तक प्रथा जैसे कार्य इन कानूनों के तहत होते हैं.. जिसको लेकर वसावा का कहना था कि फौजदारी और दीवानी कानून तो पूरे देश में लागू हैं.. फिर सरकार क्यों कहती है कि एक डंडे से पूरा राज्य चलना चाहिए.. अगर समानता चाहिए तो संविधान की समानता वाली धाराएं क्यों नहीं लागू की जातीं..

विधायक चैतर वसावा ने स्पष्ट कहा कि अल्पसंख्यक समुदायों को ठेस पहुंचाकर.. राष्ट्रवाद साबित करने की कोशिश आज गुजरात सरकार कर रही है.. हम इसकी निंदा करते हैं.. और इसका विरोध भी करेंगे.. उन्होंने बताया कि बिल के अनुसार विवाह के 30 दिनों के अंदर पंजीकरण कराना जरूरी है.. अगर नहीं किया तो सजा का प्रावधान है.. आज बैंकों, मामलतदार कार्यालयों, तालुका कार्यालयों.. और यहां तक कि पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें लगी रहती हैं.. तो क्या लोग शादी करके अब पंजीकरण की कतारों में खड़े होंगे.. तलाक अब सिर्फ कोर्ट से ही होगा.. जबकि कोर्ट में तलाक के मामले 10-15 साल तक चलते हैं.. क्या सभी समुदायों के लोग कोर्ट के चक्कर काटेंगे..

वसावा ने लिव-इन रिलेशनशिप पर भी सवाल उठाया.. बिल में लिव-इन के लिए भी पंजीकरण अनिवार्य किया गया है.. अगर लिव-इन के दौरान बच्चा पैदा होता है.. तो उसके लिए क्या प्रावधान हैं.. सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए.. उन्होंने कहा कि गुजरात सरकार इस बिल को लेकर जल्दबाजी कर रही है.. समान नागरिक संहिता की समिति पूरे गुजरात में घूमी थी.. तब सभी वर्गों के लोगों ने विरोध दर्ज कराया था.. फिर भी बहुमत के बावजूद बिल पारित किया जा रहा है.. इसलिए यह जल्दबाजी का कदम लगता है..

आपको बता दें कि चैतर वसावा ने भाजपा की राजनीति पर भी प्रहार किया.. उन्होंने कहा कि भाजपा की जड़ें जनसंघ से हैं.. जनसंघ के घोषणापत्र से लेकर 1984, 1989 से 2019 तक के हर घोषणापत्र में समान नागरिक संहिता की बात रही है.. अब RSS दबाव बना रहा है कि देश में UCC लागू किया जाए.. इसलिए भाजपा जल्दबाजी कर रही है.. उन्होंने आदिवासी समाज का मुद्दा उठाया.. सरकार कह रही है कि UCC आदिवासी समाज पर लागू नहीं होगा.. तो फिर इस UCC का क्या मतलब.. पिछली बार आदिवासी संगठनों ने इसका विरोध किया था.. इसलिए चुनाव को ध्यान में रखकर आदिवासियों को बाहर रखा गया है.. लेकिन आने वाले दिनों में संशोधन करके उन्हें शामिल कर लिया जाएगा.. ऐसी आशंका है.. अगर ऐसा हुआ तो हम इस कानून का कड़ा विरोध करेंगे.. और इसे रद्द करने की मांग करेंगे..

बता दें कि यह बिल गुजरात विधानसभा में 24 मार्च को पेश किया गया.. गुजरात कैबिनेट ने UCC बिल 2026 को मंजूरी दे दी है.. यह उत्तराखंड के UCC एक्ट पर आधारित है.. उच्चस्तरीय समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त जज जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई ने की थी.. समिति ने 17 मार्च को मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी.. रिपोर्ट में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने के लिए एक समान कानूनी ढांचा सुझाया गया है.. इसमें महिलाओं के समान अधिकार.. और राज्य की भौगोलिक-सांस्कृतिक विविधता को ध्यान में रखा गया है..

बिल के मुख्य प्रावधानों में विवाह समारोह धार्मिक रीति-रिवाजों से हो सकते हैं.. लेकिन पंजीकरण अनिवार्य है.. नए विवाह के लिए 60 दिनों के अंदर रजिस्ट्रार के पास पंजीकरण कराना होगा.. पुराने विवाहों को एक साल के अंदर पंजीकृत करना जरूरी है.. देरी होने पर 10,000 रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है.. बहुविवाह पूरी तरह प्रतिबंधित है.. ऐसा करने पर 7 साल तक की सजा हो सकती है.. विवाह की न्यूनतम उम्र पुरुष के लिए 21 वर्ष और महिला के लिए 18 वर्ष तय की गई है.. दोनों पक्षों को मानसिक रूप से स्वस्थ.. और सहमति देने योग्य होना चाहिए.. निकाह, सप्तपदी, आनंद कारज जैसी रीतियां मान्य हैं.. लेकिन निकट रिश्तेदारों में विवाह सामान्यतः वर्जित है..

तलाक के मामले में बड़ा बदलाव किया गया है.. तलाक अब सिर्फ कोर्ट से ही होगा.. व्यभिचार, क्रूरता, दो साल से अलग रहना, धर्म परिवर्तन.. और लाइलाज बीमारी जैसी वजहें वैध होंगी.. कोर्ट के बाहर तलाक देने पर 3 साल की सजा.. और 1 लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है.. बच्चों की कस्टडी में 5 साल से कम उम्र के बच्चों को आमतौर पर मां के पास रखा जाएगा.. रखरखाव (मेंटेनेंस) और स्थायी गुजारा भत्ता तय करते समय दोनों पक्षों की आय, संपत्ति.. और व्यवहार को देखा जाएगा.. वहीं दहेज महिलाओं की अपनी संपत्ति मानी जाएगी..

जानकारी के अनुसार लिव-इन रिलेशनशिप पर भी सख्ती की गई है.. पार्टनरों को एक महीने के अंदर रजिस्ट्रार के पास रिलेशनशिप स्टेटमेंट जमा करना होगा.. देरी होने पर 3 महीने तक की जेल हो सकती है.. नाबालिग, पहले से विवाहित या निकट रिश्तेदारों के साथ लिव-इन रजिस्ट्रेशन नहीं होगा.. पुलिस को सूचना दी जाएगी.. अगर पार्टनर 21 साल से कम उम्र का है.. तो माता-पिता को भी जानकारी दी जाएगी.. वहीं छोड़ दिए जाने पर महिला मेंटेनेंस का दावा कर सकेगी.. लिव-इन से जन्मे बच्चे वैध माने जाएंगे.. और उन्हें विरासत का अधिकार मिलेगा.. रिश्ता खत्म करने पर टर्मिनेशन स्टेटमेंट जमा करना भी जरूरी होगा..

 

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